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Monday, September 28, 2026

पूर्वजों को स्मरण करने का पर्व : कितनी श्रद्धा कितना विज्ञान?

**श्राद्ध : श्रद्धा, स्मृति और विज्ञान के बीच
**अजामिल 
पितृपक्ष आते ही हमारे घरों में पूर्वजों की स्मृतियाँ फिर जीवित हो उठती हैं। कहीं तर्पण होता है, कहीं पिंडदान, कहीं ब्राह्मण भोजन और कहीं जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र देकर दिवंगत परिजनों को याद किया जाता है। इन कर्मकांडों को लेकर समाज में अलग-अलग धारणाएँ हैं। कुछ लोग इन्हें गहरी श्रद्धा और पारिवारिक कृतज्ञता का माध्यम मानते हैं, तो कुछ इन्हें महज धार्मिक अनुष्ठान या अंधविश्वास मानकर प्रश्न उठाते हैं।
शायद इस प्रश्न को केवल विश्वास और अविश्वास के बीच खड़ा करना उचित नहीं होगा।
श्राद्ध का एक अर्थ ही है—श्रद्धा के साथ स्मरण। हमारे जीवन को बनाने में जिन लोगों का योगदान रहा, वे भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनका दिया हुआ बहुत कुछ हमारे भीतर और हमारे जीवन में मौजूद रहता है। उन्हें याद करना, उनके प्रति कृतज्ञ होना और उनके नाम पर किसी जरूरतमंद की सहायता करना—इन सबका एक स्पष्ट मानवीय अर्थ है।
विज्ञान की कसौटी पर देखें तो अभी हमारे पास ऐसा प्रमाण नहीं है कि किसी धार्मिक अनुष्ठान से उत्पन्न कोई विशेष 'कंपन' भौतिक संसार को पार करके दिवंगत आत्मा तक पहुँचता है। आत्मा, परलोक या सार्वभौमिक चेतना के बारे में धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में अनेक धारणाएँ हैं, लेकिन उन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए जिस प्रकार के परीक्षण योग्य प्रमाण चाहिए, वे उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए आस्था को विज्ञान का प्रमाणपत्र देना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों का कोई अर्थ ही नहीं है।
मनोविज्ञान में हुए शोध बताते हैं कि शोक और मृत्यु से जुड़े अनुष्ठान मनुष्य को अपने दुःख को स्वीकार करने, स्मृतियों को व्यवस्थित करने और जीवन में फिर से अर्थ खोजने में सहायता कर सकते हैं। एक प्रयोगात्मक अध्ययन में पाया गया कि शोक के बाद किए गए अनुष्ठानों से दुःख की तीव्रता कम होने और नियंत्रण की भावना लौटने में मदद मिल सकती है।  दूसरे अध्ययनों में भी स्मरण और शोक-संबंधी अनुष्ठानों का संबंध पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक सहयोग और मृत्यु को स्वीकार करने की प्रक्रिया से पाया गया है।
इसलिए श्राद्ध को देखने का एक रास्ता यह भी हो सकता है कि हम उसके आध्यात्मिक दावों को अपनी आस्था के क्षेत्र में रखें और उसके मानवीय प्रभावों को विज्ञान तथा मनोविज्ञान के क्षेत्र में समझें।
आस्था यह कह सकती है कि पूर्वज हमारी श्रद्धा को किसी सूक्ष्म स्तर पर ग्रहण करते हैं। विज्ञान फिलहाल इसकी पुष्टि नहीं करता। लेकिन विज्ञान यह जरूर समझने लगा है कि किसी प्रिय व्यक्ति को प्रेम और कृतज्ञता के साथ याद करना जीवित व्यक्ति के मन के लिए अर्थपूर्ण हो सकता है।
शायद श्राद्ध का सबसे सुंदर अर्थ यहीं दिखाई देता है—हम मृतकों के लिए कुछ करते हुए वास्तव में अपने भीतर की स्मृति, कृतज्ञता और मानवीयता को जीवित रखते हैं।
और यदि किसी की श्रद्धा उसे यह विश्वास देती है कि उसके पूर्वज उस क्षण उसके पास हैं, तो उस विश्वास का सम्मान किया जाना चाहिए। विश्वास न करने वाले को भी इतना समझना चाहिए कि हर आस्था का खंडन करना विवेक नहीं है, जैसे हर आस्था को वैज्ञानिक सत्य घोषित कर देना भी विज्ञान नहीं है।
श्राद्ध शायद इसी बीच की उस जगह का नाम है—जहाँ स्मृति है, भावना है, संस्कृति है, कृतज्ञता है और कुछ ऐसे प्रश्न भी हैं जिनका अंतिम उत्तर अभी विज्ञान के पास नहीं है।
**अजामिल 
चित्र :अजामिल

आस्था का विसर्जन /अजामिल


**जब आस्था का विसर्जन होने लगे
**अजामिल
मूर्ति-विसर्जन हमारे धार्मिक जीवन की एक पुरानी और अर्थपूर्ण परंपरा है। मिट्टी से बनी प्रतिमा को श्रद्धा के साथ स्थापित करना, कुछ दिनों तक उसकी पूजा करना और फिर उसे जल में विसर्जित कर देना—इसके भीतर जीवन के सृजन और विलय का एक सुंदर दर्शन छिपा है। प्रतिमा आती है, पूजी जाती है और अंततः उसी प्रकृति में लौट जाती है, जिससे उसका निर्माण हुआ था।
लेकिन क्या आज हम केवल मूर्ति का विसर्जन कर रहे हैं, या कहीं हमारी आस्था भी उसी के साथ विसर्जित होती जा रही है?
यह सवाल इसलिए जरूरी है कि पिछले कुछ वर्षों में मूर्ति-विसर्जन से जुड़े ऐसे दृश्य लगातार सामने आते रहे हैं, जो किसी भी आस्थावान व्यक्ति को भीतर तक दुखी कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो दिखाई देते हैं—कहीं देवी-देवताओं की प्रतिमाएं सड़क किनारे उपेक्षित पड़ी हैं, कहीं विसर्जन के बाद नदी या तालाब के किनारे टूटी हुई मूर्तियां हैं, कहीं प्रतिमाओं के साथ प्लास्टिक, कपड़े और दूसरे सामान का ढेर पड़ा है।
इन दृश्यों को देखकर सवाल उठता है कि जिस प्रतिमा के सामने कुछ दिन पहले हम सिर झुका रहे थे, विसर्जन के बाद उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी अचानक समाप्त कैसे हो जाती है?
पूजा में श्रद्धा, विसर्जन में उपेक्षा क्यों?
हम देवी को मां कहते हैं। गणेश को विघ्नहर्ता कहते हैं। कृष्ण, राम, शिव, दुर्गा और दूसरे देवी-देवताओं के प्रति हमारी गहरी आस्था है। पूजा के समय हम उनके सामने हाथ जोड़ते हैं, आरती करते हैं, भोग लगाते हैं और उनसे अपने जीवन की मंगलकामना करते हैं।
लेकिन वही प्रतिमा जब विसर्जन के लिए जाती है, तो कई बार हमारा व्यवहार बदल जाता है।
तेज डीजे, नशे में झूमती भीड़, यातायात रोकती शोभायात्राएं, पटाखों और शोर का प्रदर्शन—क्या यही हमारी धार्मिकता का परिचय है?
भक्ति में उत्सव होना स्वाभाविक है। उत्सव में उल्लास भी होना चाहिए। लेकिन जब उल्लास अनुशासन को निगल जाए और प्रदर्शन श्रद्धा से बड़ा हो जाए, तब हमें रुककर सोचना चाहिए।
नदी को मां कहकर उसी में प्रदूषण?
इस पूरी परंपरा का एक दूसरा पक्ष और भी गंभीर है—पर्यावरण।
हम गंगा को मां कहते हैं। नदियों को पवित्र मानते हैं। जल को जीवन का आधार मानते हैं। फिर ऐसी प्रतिमाओं और सजावटी सामग्री को नदियों में डालना, जो लंबे समय तक जल को नुकसान पहुंचा सकती हैं, हमारी धार्मिक चेतना के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है।
प्रश्न मूर्ति बनाने या विसर्जित करने का नहीं है। प्रश्न यह है कि हमने मूर्ति के साथ अपनी जिम्मेदारी का भी विसर्जन क्यों कर दिया?
यदि प्रतिमा प्राकृतिक मिट्टी से बनी हो, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग हुआ हो और विसर्जन ऐसी व्यवस्था में हो जिससे नदी और जलस्रोत सुरक्षित रहें, तो परंपरा और पर्यावरण के बीच कोई संघर्ष नहीं होना चाहिए।
कहीं बाहरी आडंबर ने भीतर की आस्था को तो नहीं ढक लिया?
धर्म का संबंध केवल बड़े आयोजन, विशाल प्रतिमाओं और भारी-भरकम सजावट से नहीं है। धर्म हमारे व्यवहार में दिखाई देता है।
हम मंदिर में सिर झुकाते हैं, लेकिन क्या मनुष्य के प्रति भी उतने ही संवेदनशील हैं?
हम देवी की आरती करते हैं, लेकिन क्या अपने आसपास की स्त्री का सम्मान करते हैं?
हम गंगा की पूजा करते हैं, लेकिन क्या उसके किनारे कूड़ा न डालने की जिम्मेदारी निभाते हैं?
हम प्रकृति को देवता मानते हैं, लेकिन क्या प्रकृति की रक्षा को अपनी धार्मिक जिम्मेदारी समझते हैं?
शायद इन सवालों का सामना करना आज पहले से अधिक जरूरी है।
विसर्जन मूर्ति का हो, आस्था का नहीं
मूर्ति-विसर्जन की परंपरा को समाप्त करने की बात नहीं है। बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि उसे उसके मूल अर्थ और गरिमा के साथ निभाया जाए।
विसर्जन से पहले प्रतिमा के प्रति वही सम्मान रहे जो स्थापना के समय था। प्राकृतिक सामग्री का उपयोग हो। जलस्रोतों को प्रदूषित न किया जाए। अनावश्यक शोर और प्रदर्शन से बचा जाए। और सबसे महत्वपूर्ण—देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को विसर्जन के बाद इस तरह न छोड़ा जाए कि वे हमारी अपनी आस्था के सामने प्रश्न बनकर खड़ी हो जाएं।
धर्म हमें जोड़ने, संयम सिखाने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बनाने के लिए है। यदि हमारी धार्मिक गतिविधि से नदी दुखी हो, प्रकृति घायल हो और स्वयं हमारी आस्था आहत हो, तो हमें अपने तरीके पर विचार करना ही चाहिए।
मूर्ति का विसर्जन एक परंपरा है।
लेकिन आस्था का विसर्जन हमारी जिम्मेदारी नहीं, हमारी भूल है.
**अजामिल 

Saturday, September 26, 2026

भारत में बालसहित्य / अजामिल


​भारत में बाल साहित्य: कल, आज और कल

**अजामिल


​ विदेश में लगभग सभी लेखक गंभीर लेखन के साथ-साथ बाल साहित्य लिखना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और उनका सूचना यह भी है की कोई लेखक अपनी बात को खाने में कितना समर्थ है यह तब पता चलता है जब वह बाल साहित्य लिखता है लेकिन हमारे देश भारत में पहले तो बाल साहित्यकार ही बहुत कम है दूसरा यह की बड़ों के लिए यानी गंभीर साहित्य लिखने वाले यह महसूस ही नहीं करते कि उन्हें बच्चों के लिए भी लिखना चाहिए भर साहित्य लिखना भारत में दूसरे दर्जे का लेखन माना जाता है जबकि सच यह है कि बाल साहित्य पूरी दुनिया में कहीं भी बचकाना साहित्य नहीं माना जाता यह महसूस किया जाता है की गंभीर साहित्य लेखन से ज्यादा मुश्किल काम है बाल साहित्य का लेखन लोग यह भी मानते हैं कि अच्छा बल सहित सभी लिखा जा सकता है जब लेखकों के भीतर एक बच्चा मौजूद हो जापान चीन रूस ब्रिटेन आदि देशों में बाल साहित्यकारों का बहुत ज्यादा सम्मान है उन्हें पुरस्कार और अवार्ड से नवादा जाता है और उनकी किताबें लाखों की संख्या में प्रकाशित की जाती है यह किताबें इतनी खूबसूरत छापी जाती है कि इन्हें देखकर लगता है जैसे यह कोई खिलौना हो हमारे देश में इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाता है प्रकाशक भी बच्चों का साहित्य छापने में बहुत रुचि नहीं दिखाई उन्हें लगता है कि यह सौदा घाटे का है भारत में इस बात को सोने वाला कोई नहीं है की बच्चों में पढ़ने की रुचि इसीलिए कम होती जा रही है कि उनके पढ़ने के लिए अच्छे बल सहित की बहुत ज्यादा कमी है और जो कुछ लिखा जाता है वह बस काम चलाओ होता है ।बाल साहित्य किसी भी समाज की वह नींव है जिस पर आने वाली पीढ़ियों का मानसिक और चारित्रिक निर्माण टिका होता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहाँ लोककथाओं और मौखिक कहानियों की सदियों पुरानी परंपरा रही है, बाल साहित्य का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। वर्तमान समय में यह विधा एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है, जहाँ इसके सामने असीम संभावनाएँ भी हैं और गंभीर चुनौतियाँ भी।

​ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: पंचतंत्र से 'बालसखा' तक

​भारत में बाल साहित्य की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं। 'पंचतंत्र', 'जातक कथाएँ' और 'हितोपदेश' जैसी कृतियाँ न केवल भारत बल्कि विश्व के बाल साहित्य का आधार मानी जाती हैं। आधुनिक काल में, भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग से हिंदी बाल साहित्य ने एक निश्चित आकार लेना शुरू किया। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में 'बालसखा', 'चंदामामा', 'पराग' और 'नंदन' जैसी पत्रिकाओं ने बच्चों के मानसिक विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया।

​वर्तमान परिदृश्य: बदलाव और आधुनिकता

​आज के दौर में बाल साहित्य केवल नैतिकता और परियों की कहानियों तक सीमित नहीं है। समकालीन लेखक अब बाल मनोविज्ञान, विज्ञान, पर्यावरण, सामाजिक समानता और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर भी सक्रिय रूप से लिख रहे हैं। सुधा मूर्ति, रस्किन बॉन्ड और प्रकाश मनु जैसे लेखकों ने भारतीय परिवेश को ध्यान में रखते हुए वैश्विक स्तर का साहित्य रचा है।

​वर्तमान स्थिति की कुछ मुख्य विशेषताएँ:

  1. ​विषय वैविध्य: अब कहानियों में केवल "राजा-रानी" नहीं, बल्कि रोबोट, जलवायु परिवर्तन और अंतरिक्ष जैसे विषय भी शामिल हैं।

  2. ​दृश्य प्रस्तुतीकरण: ग्राफिक नोवेल्स और रंगीन चित्रों वाली पुस्तकों (Picture Books) का प्रचलन बढ़ा है, जो बच्चों को आकर्षित करती हैं।

  3. ​डिजिटल परिवर्तन: ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स के माध्यम से साहित्य अब बच्चों के मोबाइल और टैबलेट तक पहुँच गया है।

​चुनौतियाँ और संकट

​इतने विकास के बावजूद, भारतीय बाल साहित्य आज भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है:

  • ​अंग्रेजी का प्रभुत्व: शहरी क्षेत्रों में अंग्रेजी भाषा के बाल साहित्य का दबदबा है, जिसके कारण क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी का साहित्य पिछड़ रहा है।

  • ​तकनीकी प्रतिस्पर्धा: स्मार्टफोन, वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया ने बच्चों की पढ़ने की आदत (Reading Habit) को काफी हद तक कम कर दिया है।

  • ​लेखन का स्तर: कई बार बाल साहित्य के नाम पर केवल उपदेशात्मक या अरुचिकर सामग्री परोसी जाती है, जो आज के तार्किक बच्चों को प्रभावित नहीं कर पाती।

  • ​विपणन और वितरण: छोटे शहरों और गाँवों तक गुणवत्तापूर्ण बाल साहित्य की पहुँच आज भी एक बड़ी समस्या है।

​भविष्य की राह

​भारत में बाल साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि लेखकों को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ हो। साहित्य ऐसा होना चाहिए जो बच्चों को डराए या केवल उपदेश न दे, बल्कि उनकी कल्पनाशीलता को पंख दे। प्रकाशकों को भी पुस्तकों के मूल्य और उनकी गुणवत्ता के बीच संतुलन बिठाना होगा।

​निष्कर्ष

अंततः, बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बच्चों के संस्कारों की पाठशाला है। यदि हम चाहते हैं कि भविष्य की पीढ़ी संवेदनशील और जिज्ञासु बने, तो हमें उन्हें श्रेष्ठ साहित्य उपलब्ध कराना ही होगा। सरकार, समाज और अभिभावकों के साझा प्रयासों से ही भारतीय बाल साहित्य अपनी खोई हुई चमक वापस पा सकता है।

प्रकाशकों द्वारा बाल साहित्य (विशेषकर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में) में कम रुचि लेने के पीछे कई ठोस व्यावसायिक और सामाजिक कारण हैं। आजकल प्रकाशक जोखिम लेने के बजाय सुरक्षित विकल्पों की ओर अधिक झुक रहे हैं।

​इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

​1. व्यावसायिक लाभ (Profit Margin) की कमी

​बाल साहित्य के प्रकाशन में लागत अधिक आती है और मुनाफा कम होता है।

  • ​महंगी छपाई: बच्चों की किताबों के लिए अच्छी गुणवत्ता वाला कागज, रंगीन चित्र (Illustrations) और आकर्षक कवर जरूरी होते हैं। इससे उत्पादन लागत (Production Cost) बढ़ जाती है।

  • ​कम कीमत: अभिभावक अक्सर बाल साहित्य की अधिक कीमत देने को तैयार नहीं होते। वे एक महंगी कॉमिक्स या कहानी की किताब के बजाय उतने ही पैसों में खिलौना खरीदना बेहतर समझते हैं।

​2. वितरण तंत्र और बाजार का अभाव

  • ​पुस्तकालयों पर निर्भरता: भारत में बाल साहित्य का बाजार मुख्य रूप से सरकारी और स्कूल पुस्तकालयों (Libraries) की खरीद पर टिका है। सीधे ग्राहकों (Retail Buyers) तक पहुँच बहुत कम है।

  • ​प्रदर्शनी और बुक स्टोर्स की कमी: बुक स्टोर्स में बाल साहित्य के लिए बहुत कम जगह आवंटित की जाती है। वहाँ अक्सर विदेशी लेखकों (जैसे जे.के. रॉलिंग या जेफ किन्नी) की किताबों को प्राथमिकता दी जाती है।

​3. अंग्रेजी भाषा का बढ़ता प्रभाव

​शहरी मध्यम वर्ग के अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषा की किताबें पढ़ाना स्टेटस सिंबल मानते हैं।

  • ​प्रकाशक जानते हैं कि Scholastic या Penguin जैसे बड़े वैश्विक ब्रांड्स की अंग्रेजी किताबों से मुकाबला करना मुश्किल है।

  • ​हिंदी या आंचलिक भाषाओं के प्रकाशकों को लगता है कि उनके पास इस वर्ग के लिए 'पहुँच' (Reach) नहीं है।

​4. सामग्री और लेखकों का संकट

  • ​पुराना ढर्रा: आज भी कई लेखक वही पुराने राजा-रानी या उपदेशात्मक कहानियाँ लिख रहे हैं। प्रकाशकों को लगता है कि आज के 'स्मार्टफोन युग' के बच्चों को यह सामग्री बोरिंग लगती है।

  • ​प्रोफेशनल राइटिंग की कमी: बाल साहित्य लिखना सबसे कठिन काम है, लेकिन इसे अक्सर उपेक्षित माना जाता है। अच्छे लेखकों की कमी के कारण प्रकाशक निवेश करने से डरते हैं।

​5. डिजिटल माध्यमों की चुनौती

  • ​यूट्यूब, वीडियो गेम्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने बच्चों का सारा समय छीन लिया है। प्रकाशकों को लगता है कि "स्क्रीन टाइम" के इस दौर में प्रिंट किताबों का भविष्य अनिश्चित है, इसलिए वे बड़े निवेश से बचते हैं।

​संक्षिप्त तुलना: चुनौतियाँ बनाम समाधान


व्यवसायिक चुनौतियों और बाजार के दबावों के बावजूद, भारत में कुछ ऐसे समर्पित प्रकाशक और संस्थाएं हैं जो बाल साहित्य को नया जीवन देने का जोखिम उठा रहे हैं। ये प्रकाशक केवल 'मुनाफे' के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की कल्पनाशीलता और भाषाई समझ को बेहतर बनाने के उद्देश्य से काम कर रहे हैं।

​यहाँ उन प्रमुख प्रकाशकों के बारे में जानकारी दी गई है जो इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं:

​1. एकलव्य (Eklavya) - भोपाल

​यह संस्था दशकों से बाल साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर रही है।

  • ​विशेषता: एकलव्य की पुस्तकें बहुत सस्ती होती हैं और ग्रामीण परिवेश से जुड़ी होती हैं। ये विज्ञान, पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों को बहुत सरल और मजेदार ढंग से पेश करते हैं।

  • ​उल्लेखनीय कार्य: इनकी प्रसिद्ध बाल पत्रिका 'चकमक' आज भी हजारों बच्चों की पसंदीदा है।

​2. जुगनू प्रकाशन (Jugnoo Prakashan)

​यह 'एकतारा' ट्रस्ट का एक उपक्रम है जो हिंदी बाल साहित्य में 'कलात्मकता' और 'कविता' को प्राथमिकता देता है।

  • ​विशेषता: ये विश्व प्रसिद्ध लेखकों (जैसे गुलज़ार, विनोद कुमार शुक्ल) और चित्रकारों के साथ मिलकर ऐसी किताबें निकालते हैं जो देखने में किसी पेंटिंग जैसी सुंदर होती हैं।

  • ​जोखिम: जहाँ अन्य प्रकाशक चित्रों पर खर्च करने से डरते हैं, जुगनू प्रकाशन बेहतरीन चित्रों और उच्च गुणवत्ता वाले कागज़ पर निवेश करता है ताकि बच्चों को सौंदर्यबोध (Aesthetics) की समझ हो।

​3. प्रथम बुक्स (Pratham Books)

​यह एक 'नॉट-फॉर-प्रॉफिट' प्रकाशक है, जिसका लक्ष्य है—"हर बच्चे के हाथ में एक किताब"।

  • ​विशेषता: ये एक ही कहानी को 20 से अधिक भारतीय भाषाओं में प्रकाशित करते हैं। इनकी किताबें बहुत रंगीन और सस्ती होती हैं।

  • ​नवाचार: इन्होंने 'स्टोरीवीवर' (StoryWeaver) नाम का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया है, जहाँ हजारों कहानियाँ मुफ्त में पढ़ी जा सकती हैं।

​4. तूलिका पब्लिशर्स (Tulika Publishers)

​चेन्नई स्थित यह स्वतंत्र प्रकाशक बहुभाषी (Multilingual) और द्विभाषी (Bilingual) पुस्तकों के लिए जाना जाता है।

  • ​विशेषता: तूलिका अक्सर एक ही पन्ने पर अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा (जैसे हिंदी या तमिल) की कहानी छापता है। इससे बच्चे को दूसरी भाषा सीखने में आसानी होती है।

  • ​विषय: ये लोककथाओं और समकालीन सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित पुस्तकें अधिक छापते हैं।

​5. नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) - भारत सरकार

​सरकारी संस्थान होने के नाते, NBT भारत में बाल साहित्य का सबसे बड़ा आधार है।

  • ​विशेषता: इनका 'राष्ट्रीय बाल साहित्य केंद्र' (NCCL) देश भर के बाल लेखकों को मंच देता है।

  • ​पहुँच: NBT की मोबाइल वैन (Pustak Parikrama) सुदूर गाँवों तक पहुँचकर बहुत ही कम कीमतों पर किताबें उपलब्ध कराती है।

​6. अन्य महत्वपूर्ण नाम:

  • ​कराडी टेल्स (Karadi Tales): ये विशेष रूप से ऑडियो-बुक्स और भारतीय लोककथाओं को संगीत के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं।

  • ​तारा बुक्स (Tara Books): ये अपनी हस्तनिर्मित (Handmade) और स्क्रीन-प्रिंटेड पुस्तकों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।

​ये प्रकाशक जोखिम क्यों ले रहे हैं?

​ये सभी प्रकाशक एक बात पर विश्वास करते हैं: "यदि बच्चों को अच्छी सामग्री नहीं दी गई, तो वे कभी अच्छे पाठक नहीं बनेंगे।" इनका उद्देश्य केवल किताबें बेचना नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक आंदोलन' चलाना है।

​बाल साहित्यकारों की गंभीरता को लेकर आज दो अलग-अलग धाराएं देखने को मिलती हैं। जहाँ एक ओर कुछ लेखक केवल 'खानापूर्ति' कर रहे हैं, वहीं समर्पित लेखकों का एक बड़ा वर्ग इस विधा को लेकर अत्यंत गंभीर है और इसे वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए नए प्रयोग कर रहा है।

​बाल साहित्यकारों की गंभीरता और उनके कार्यों को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:

​1. बाल मनोविज्ञान का गहरा अध्ययन

​आज के गंभीर लेखक केवल उपदेश देने के लिए नहीं लिख रहे हैं। वे जानते हैं कि आज का बच्चा 'ज्ञान' से ज्यादा 'अनुभव' और 'तर्क' को महत्व देता है।

  • ​कार्य: लेखक अब बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, उनके डर, अकेलेपन और जिज्ञासाओं पर लिख रहे हैं। वे बच्चों की आँखों से दुनिया को देखने की कोशिश कर रहे हैं, न कि बड़ों के नजरिए से उन्हें सुधारने की।

​2. विषयों का आधुनिकरण (Modernization of Themes)

​गंभीर बाल साहित्यकार पुरानी घिसी-पिटी कहानियों से बाहर निकलकर समकालीन विषयों पर काम कर रहे हैं।

  • ​विज्ञान और पर्यावरण: प्रकाश मनु, देवेंद्र मेवाड़ी और क्षमा शर्मा जैसे लेखक बच्चों को विज्ञान और प्रकृति से जोड़ने के लिए रोचक कहानियाँ और कविताएँ लिख रहे हैं।

  • ​सामाजिक मुद्दे: अब कहानियों में लिंग भेद (Gender Equality), दिव्यांगता (Disability) और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को बहुत संवेदनशीलता के साथ पिरोया जा रहा है।

​3. भाषा प्रयोग में नवाचार

​लेखक अब ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जो बच्चों की बोलचाल के करीब हो। भारी-भरकम और क्लिष्ट शब्दों के बजाय सहज और प्रवाहमयी भाषा को प्राथमिकता दी जा रही है।

  • ​बहुभाषी प्रयोग: कई लेखक अपनी कहानियों में स्थानीय शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं ताकि बच्चा अपनी जड़ों से जुड़ा महसूस करे।

​4. सक्रियता और मंचों का निर्माण

​साहित्यकार केवल लिखने तक सीमित नहीं हैं, वे साहित्य को बच्चों तक पहुँचाने के लिए नए रास्ते भी खोज रहे हैं:

  • ​कार्यशालाएँ (Workshops): लेखक स्कूलों में जाकर कहानी सुनाने (Storytelling) के सत्र आयोजित कर रहे हैं।

  • ​सोशल मीडिया और पॉडकास्ट: कई साहित्यकार यूट्यूब और पॉडकास्ट के माध्यम से बच्चों को अपनी कहानियाँ सुना रहे हैं ताकि डिजिटल माध्यम का सही उपयोग हो सके।

  • ​बाल पत्रिकाओं का संपादन: 'चकमक', 'प्लूटो' और 'साइकिल' जैसी पत्रिकाओं के पीछे गंभीर लेखकों की ही मेहनत है जो बच्चों के लिए उच्च स्तरीय सामग्री का चयन करते हैं।

​गंभीरता में कमी कहाँ है? (चुनौतियां)

​गंभीर प्रयासों के बावजूद, कुछ चिंताजनक बातें भी हैं:

  • ​दोहराव: कुछ लेखक आज भी 50 साल पुरानी शैली में लिख रहे हैं, जिससे बच्चा जुड़ाव महसूस नहीं करता।

  • ​अनुवाद पर निर्भरता: मौलिक लेखन के बजाय अंग्रेजी की प्रसिद्ध किताबों का अनुवाद करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे भारतीय परिवेश की कहानियाँ कम हो रही हैं।

  • ​पुरस्कारों की होड़: कभी-कभी लेखक बच्चों के लिए लिखने के बजाय पुरस्कारों और अकादमियों को ध्यान में रखकर लिखते हैं, जिससे लेखन का मूल उद्देश्य (बच्चों का मनोरंजन और विकास) पीछे छूट जाता है।

​निष्कर्ष

​कुल मिलाकर, भारतीय बाल साहित्यकार आज पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। वे जानते हैं कि उनके सामने चुनौती केवल दूसरे लेखकों से नहीं, बल्कि वीडियो गेम्स और इंटरनेट से भी है। इसलिए, वे साहित्य को अधिक दृश्यपरक (Visual), तार्किक और मनोरंजक बनाने में जुटे हैं।

​भारतीय बाल साहित्य को समृद्ध करने वाले लेखकों की सूची काफी लंबी है, लेकिन यहाँ कुछ ऐसे चुनिंदा साहित्यकारों के नाम दिए जा रहे हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से बच्चों की दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया है:

​1. प्रकाश मनु (Prakash Manu)

​इन्हें आधुनिक हिंदी बाल साहित्य का 'स्तंभ' माना जाता है। इन्होंने बाल साहित्य के आलोचनात्मक पक्ष पर भी बहुत काम किया है।

  • ​प्रमुख कार्य: 'एक था ठुनठुनिया', 'लालचू और गोलू मोलू', और 'हिंदुस्तानी बाल साहित्य का इतिहास'।

  • ​विशेषता: इनकी कहानियों में बच्चों की मासूमियत और भारतीय परिवेश की खुशबू रची-बसी होती है।

​2. सुधा मूर्ति (Sudha Murty)

​यद्यपि वे मूल रूप से अंग्रेजी में लिखती हैं, लेकिन उनकी पुस्तकों का लगभग सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

  • ​प्रमुख कार्य: 'दादी माँ के नुस्खे' (Grandma's Bag of Stories), 'हाउ आई टॉट माय ग्रैंडमदर टू रीड'।

  • ​विशेषता: वे बहुत ही सरल भाषा में नैतिक मूल्यों और जीवन के अनुभवों को कहानियों के माध्यम से पिरोती हैं। उनकी कहानियाँ आज के बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।

​3. रस्किन बॉन्ड (Ruskin Bond)

​भारत के सबसे प्रिय लेखकों में से एक, जो मसूरी की पहाड़ियों में रहकर दशकों से बच्चों के लिए लिख रहे हैं।

  • ​प्रमुख कार्य: 'द ब्लू अम्ब्रेला' (नीली छतरी), 'नाइट ट्रेन एट देवली', 'रस्टी' सीरीज।

  • ​विशेषता: बॉन्ड की कहानियाँ प्रकृति, मासूमियत और छोटे शहरों के सरल जीवन पर आधारित होती हैं, जो बच्चों में प्रकृति के प्रति प्रेम जगाती हैं।

​4. डॉ. देवेंद्र मेवाड़ी (Dr. Devendra Mewari)

​इन्होंने बाल साहित्य को 'विज्ञान' से जोड़ने का कठिन कार्य किया है।

  • ​प्रमुख कार्य: 'विज्ञान की विभूतियाँ', 'भविष्य', 'जीव जगत की कहानियाँ'।

  • ​विशेषता: वे विज्ञान जैसे जटिल विषय को कहानी और किस्सागोई के अंदाज में पेश करते हैं, जिससे बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा होता है।

​5. क्षमा शर्मा (Kshama Sharma)

​समकालीन बाल साहित्य में क्षमा शर्मा एक बहुत ही सशक्त नाम हैं।

  • ​प्रमुख कार्य: 'नीले चश्मे वाला जिन्न', 'बचपन की कहानियाँ'।

  • ​विशेषता: वे बाल मनोविज्ञान और खासकर बालिकाओं के जीवन और उनकी चुनौतियों पर बहुत बारीकी से लिखती हैं।

​6. विनोद कुमार शुक्ल (Vinod Kumar Shukla)

​हिंदी के बहुत बड़े कवि और उपन्यासकार, जिन्होंने बच्चों के लिए बहुत ही मौलिक और जादुई साहित्य रचा है।

  • ​प्रमुख कार्य: 'पेड़ पर कमरा', 'घोड़ा और घास'।

  • ​विशेषता: इनकी शैली 'मैजिकल रियलिज्म' (जादुई यथार्थवाद) जैसी है, जो बच्चों की कल्पनाशीलता को असीम विस्तार देती है।

​7. गुलज़ार (Gulzar)

​प्रसिद्ध गीतकार और लेखक गुलज़ार साहब ने बच्चों के लिए बहुत ही प्यारी नज़्में और कहानियाँ लिखी हैं।

  • ​प्रमुख कार्य: 'पोटली वाली दादी', 'बोस्की का पंचतंत्र'।

  • ​विशेषता: उनकी रचनाओं में लय और संगीत होता है, जो बच्चों को सुनने और याद करने में बहुत आनंद देता है।


इन लेखकों ने सिद्ध किया है कि बाल साहित्य केवल 'चुटकुले' या 'शिक्षा' नहीं है, बल्कि यह एक ज़िम्मेदारी से भरा काम है.

*अजामिल 






शिक्षा का अधिकार: कितनी बदली सूरत


 आज़ादी के बाद से शिक्षा के अधिकार से जुड़े कानूनों ने आम और ख़ास लोगों के भीतर भले ही सर्वांगीण विकास की कितनी ही उम्मीद क्यों न जगाई हो, लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी देश में कई करोड़ गरीब परिवारों के बच्चे ऐसे हैं जो प्राथिमिक शिक्षा से वंचित हैं | वित्तीय कठिनाईयों के मद्देनज़र केंद्र और राज्य सरकारें शिक्षा के अधिकार को माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा पर लागू नहीं कर पा रही है | गरीबी उन्मूलन पर भारत में हुए अनेक सर्वेक्षणों में समय-समय पर यह संकेत दिए हैं कि गरीबों, दलितों और वंचितों के वर्गों से आने वाले असंख्य परिवार बुनियादी शिक्षा का अधिकार न पाने के कारण अपनी गरीबी से मुक्त नहीं हो सके | जब कि इन वर्गों के जिन परिवारों को शिक्षा का अधिकार मिला, ऐसे परिवार किसी न किसी सरकारी अथवा प्राईवेट नौकरी में आ गए | ऐसे वर्गों को शिक्षा का समुचित अधिकार मिलने पर यह देखा गया कि उनका चयन अच्छे सिक्षा संस्थानों में आसानी से हो गया | इसके विपरीत आज भी बड़ी संख्या में ऐसे युवा और बच्चे हैं जिन्हें सिक्षा का अधिकार अब तक नहीं मिल पाया है | 18 वर्ष से 24 वर्ष के युवाओं में जिन्हें उच्च सिक्षा का अधिकार मिला उनमे केवल 18 प्रतिशत युवा भी शामिल हैं | भारत के 18 प्रतिशत सकल नामांकन दर की तुलना में यह दर थाईलैंड में 40 प्रतिशत, मलेशिया में 40 प्रतिशत चीन में 30 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया में 100 प्रतिशत, न्यूज़ीलैंड में 83 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया में 80 प्रतिशत और समूचे विकसित देशों में 50 प्रतिशत के आस पास है | यूनेस्को के सर्वेक्षण के अनुसार पूरे विश्व में सिक्षा की सकल नामांकन दर तकरीबन 30 प्रतिशत के करीब है |

          आज विश्व में 7.5 प्रतिशत बच्चे बुनियादी सिक्षा के अधिकार से वंचित हैं इसमें भारत का हिस्सा सबसे ज्यादा है | बच्चों को उनका बुनियादी सिक्षा का अधिकार अभी तक क्यों नहीं मिल पाया इसका ज़वाब आज किसी के पास नहीं है और न कभी गहराई में जाकर इसे जानने की कोशिश की गई | सिक्षा के अधिकार के मुद्दे को लगातार सरकारें नज़रंदाज़ करती रहीं | राजनीति के काली छाया के तहत सिक्षा का अधिकार दबा रहा और यह उन गरीब वंचितों तक नहीं पहुँच पाया जिन्हें कि इसकी विशेष रूप से आवश्यकता थी | वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार शून्य से छः वर्ष आयु वर्ग के 15 करोड़ 80 लाख बच्चे आज सिक्षा के अधिकार से वंचित हैं | आज़ादी के बाद सिक्षा के अधिकार के मुद्दे को प्राथमिकता के आधार पर जांच परख कर वंचित गरीबों तक ले जाना चाहिए था लेकिन हमारे देश में नीतिकारों ने यह ज़िम्मेदारी नहीं उठाई | सिक्षा के अधिकार के मुद्दे को हमेशा सतही तौर पर देखा गया इसका नतीजा यह रहा कि सिक्षा से वंचित समाज, समाज की मुख्य धारा में न आ कर संपन्न समाज के लिए संसाधन बनके रह गया | आज सबसे खराब स्थिति देश में सिक्षा व्यवस्था की है | यह आश्चर्यजनक है कि सिक्षा पाने के अधिकार को खुला आकाश देने की जगह सरकारों ने जनता पर 2 प्रतिशत सिक्षा अधिकार कर लगा दिया | जबकि सिक्षा प्राप्त करना आज़ाद देश में सबका बुनियादी अधिकार होना चाहिए था और जिसे देने की ज़िम्मेदारी सरकारों को निभानी चाहिए थी |
          आज़ादी के बाद से सरकारें कई अरब रूपए सिक्षा के नाम पर खर्च कर चुकी हैं, लेकिन सिक्षा के क्षेत्र में कोई गति या रेखांकित किया जाने वाला विकास नहीं देखी देता | हालात सिक्षा को प्राईवेट सेक्टर में दाल देने के कारण और भी ज्यादा बिगड़ गए हैं | निजी हाथों मिएँ सिक्षा की सूरत एक बड़े व्यापार में बदल गई है | प्राईवेट सेक्टर में सिक्षा को नफा और नुकसान की नज़र से देखा जा रहा है | इस सेक्टर में सिक्षा एक ऐसे सौदे में तब्दील हो गई है जिसे पाने के लिए केवल अर्थ ही आधार बन गया है | प्रतिभा और योग्यता हाशिए पर चली गई है | संपन्न वर्ग से आने वाले बच्चे ही निजी हाथों में खेल रही सिक्षा को हासिल कर पा रहे हैं जबकि करोड़ों बच्चे ऐसी सिक्षा से वंचित हैं | देश के पहले सिक्षा मंत्री डॉ अबुल कलाम आज़ाद ने साफ़ तौर पर कहा था कि सिक्षा के अधिकार को लेकर किसी तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए | उनका कहना था कि देश के हर बच्चे और हर युवा को शिक्षा पाने का अधिकार मिले और इसकी ज़िम्मेदारी केंद्र तथा राज्य सरकारें क़ुबूल करें | उनका ये भी मानना था कि जब सिक्षा के विस्तार की ज़िम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों के पास होगी तो उसका विकास भी आसानी से होगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया | इसके पीछे एक सोची समझी राजनैतिक साजिश का होना बताया जाता है | सरकारें मानती हैं कि शिक्षा का विकास होने पर सरकारों को काम करने में बाधाएं उत्पन्न होंगी | लोग पढ़े लिखे होंगे तो नियमों और कानूनों के पालन से पहले विचार विमर्श करेंगे | उनका सोचना सरकार के लिए खतरा भी उत्पन्न कर सकता है | ज़ाहिर है कि इस सोच के चलते शिक्षा का विकास संभव ही नहीं है |
          आज समवर्ती सूची में होने के बावजूद शिक्षा जगत से जुड़ा सारा काम काज आम तौर पर राज्य सरकारों के भरोसे चल रहा है | यही वजह है कि देश में शिक्षा का सामान विकास नहीं हो पाया और नाहि शिक्षा को सामान विस्तार मिल सका | यह आश्चर्यजनक है कि आज़ादी के 66 वर्ष बीत जाने के बावजूद पूरे देश के लिए अभी तक कोई सर्वमान्य शिक्षा नीति नहीं बने जा सकी है और न कोई सर्वमान्य पाठ्यक्रम ही तैयार कर पाए हैं | करोड़ों बच्चों ने अभी तक स्कूल का मोह नहीं देखा है | जो पढ़ रहे हैं उन्हें दी जाने वाली शिक्षा अलग-अलग मानकों की हैं | जो जितना पैसा खर्च करके शिक्षा को खरीद पा रहा है उसे उतना ही फायदा हो रहा है और जो पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं है वह शिक्षा से अभी तक बहुत दूर है | स्कूलों से तथाकथित पढ़ लिख कर जो बच्चे आ रहे हैं उनका स्तर बहुत अच्छा नहीं है | केंद्र सरकार शिक्षा के नाम पर राज्यों को जो अनुदान दिया करती थी उसे बंद कर दिया गया है | यह बहुत दुखद है कि शिक्षा के क्षेत्र में आज जितनी भी योजनाएं चलाई जा रही हैं वह सब विश्व बैंक से मिलने वाले अनुदान के भरोसे चल रही है | इतना ही नहीं लगभग 80 फ़ीसदी स्कूलों को विश्व बैंक की गाईड लाइन पर चलाया जा रहा है | सहज ही समझा जा सकता है कि भारत की शिक्षा के विकास को लेकर विश्व बैंक की उदारता का क्या मतलब है |
          विश्व बैंक की गाइड लाइंस पर ही सरकारें प्राथिमिक शिक्षा की साड़ी ज़िम्मेदारी को ग्राम पंचायतों को सौंपने की तैयारी में है | ग्राम पंचायतों को प्रथिमिक शिक्षा के संचालन का कितना अनुभव है और उनके संचालन से कैसा विकास होगा ये आसानी से सोचा जा सकता है | रही बात माध्यमिक शिक्षा की, तो यह आज पूरी तरह से प्राईवेट सेक्टर में जा चुकी है | प्राईवेट सेक्टर के स्कूलों ने माध्यमिक शिक्षा को एक सबसे ज्यादा मुनाफ़ा कमाने वाला व्यवसाय बना दिया है | प्रश्न उठता है कि इन हालातों में हम ऐसी शिक्षा बच्चों को देने की कैसे आशा कर सकते हैं जो लोकतंत्र की रक्षा कर सकें | उच्च शिक्षा की स्थिति और भी ज्यादा ख़राब है | उच्च शिक्षा में पूंजीपतियों ने करोड़ों रुपया निवेश कर दिया है | उच्च शिक्षा का क्षेत्र अब ज्ञान और सेवा का क्षेत्र नहीं रह गया है | यह क्ष्टर शिक्षा की बड़ी इंडस्ट्री बन चूका है | बड़े मुनाफे की संभावनाओं को देखते हुए अब तमाम विदेशी शिक्षा संस्थाओं ने भी भारत में इस पर पूंजी निवेश करना आरम्भ कर दिया है | विदेशी पूँजी से संचालित होने वाली शिक्षा संस्थाएं देश में सर्वोत्तम शिक्षा की दावेदारी में प्रतिस्पर्धा करेंगी या अधिक से अधिक पूँजी कमाने के लिए तिकड़में चलाएंगी |
                        आज देश भर में 10 हज़ार 200 लाख स्कूल अपनी अच्छी बुरी हालत में संचालित हो रहे हैं | इनमे 40 लाख माध्यमिक विद्यालय हैं | देश की आबादी आज 1 अरब से ज्यादा हो चुकी है | शिक्षा के अधिकार की बात करें तो क्या जितनी संख्या में आज प्राथिमिक और माध्यमिक विद्यालय हैं उनसे सभी को शिक्षा दी जा सकती है | दुःख इस बात का है की मज़बूत इक्षा शक्ति के अभाव में हम आज तक अच्छी शिक्षा के लिए समुचित साधन तक नहीं जुटा सके | हालांत ये हैं कि विद्यालयों में प्रवेश के लिए ही जितनी मारा मारी होती है, उसमे शिक्षा के अधिकार के पैरों का टिकना ही संभव नहीं होता | भ्रष्टाचार को पनपने का अलग मौका मिल जाता है | शिक्षा का अधिकार सबको मिले इसके लिए हम आज तक कोई नीति नहीं बना सके | इस समय देश में 1.4 लाख सरकारी और गैर सरकारी सहायता प्रापर माध्यमिक स्कूलों में आईसीटी सुविधाएँ उपलब्ध हैं | आश्चर्य इस बात का है की इन स्कूलों में भी शिक्षकों की कमी बनी हुई है | देश के दूर दराज़ इलाकों में 28 ह़जार के लगभग ऐसे स्कूल हैं जहाँ बिना किसी सनसंसाधन की तथाकथित कागजों पर स्कूल चलाए जा रहे हैं | सरकारें बालिकाओं की शिक्षा के लिए करोड़ों रूपए का विज्ञापन प्रति वर्ष जन संचार माध्यमों को देती हैं लेकिन देश में पर्याप्त स्कूल कॉलेज खोलने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाते |
          आज देश में कॉलेजों की संख्या 30 हज़ार के आस पास है और विश्विद्यालय 600 के लगभग हैं | सोचने वाली बात ये है की जिस देश की जिन संख्या का 50 करोड़ 18 वर्ष या उससे ऊपर की आयु का युवा हो, ये थोड़े से कॉलेज और विश्विद्यालयों के माध्यम से उन्हें उच्च शिक्षा कैसे दी जा सकती है | आज जो कॉलेज और विश्विद्यालय हैं, उनमे केवल 15 लाख क्षत्रों को ही शिक्षा मिल रही है | हम सभी जानते हैं की सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक बदलाव के लिए विकासशील देशों में शिक्षा का अधिकार सभी को दिया जाना बहुत ज़रूरी है, लेकिन देश के भविष्य का निर्माण करने वाले इस अधिकार को देने के लिए सरकारें अभी तक मूल भोत सुविधाएं ही नहीं जुटा पायी हैं | इसके पीछे जो भी कारण है उसके आधार में एक ऐसा नज़रिया अपनी जड़े जमाए हुए है जो शिक्षा के विकास और विस्तार में बाधा बना है | शिक्षा को राजनीति से बचाना होगा तभी उच्च शिक्षा के अधिकार को भी बचाया जा सकेगा |
          सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार क़ानून के लागू किये  जाने के बाद भी प्राथिमिक शिक्षा के स्तर में कहीं कोई सुधार नहीं हुआ है | शिक्षा का अधिकार कानून लागु किये जाने के बाद स्कूलों में बच्चों के नामांकन की संख्या में तो वृद्धि हुई है लेकिन इतनी बड़ी संख्या में छात्रों को शिक्षा देने के लिए संसाधनों का जो प्रबंध किया जाना था, सरकारों ने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया नतीजा यह रहा की शिक्षा की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई | सर्वेक्षण बताता है की सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चों का नामांकन कर लिया गया लेकिन उन बच्चों को पढ़ने के लिए शिक्षकों का समुचित प्रबंध नहीं किया जा सका | नतीजा यह हुआ की प्राईवेट स्कूलों में बच्चों के नामांकन और भी ज्यादा हुए | व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा में प्राइवेट स्कूलों की शिक्षा लगातार महंगी होती चली गई | ग्रामीण क्षेत्रों में भी अभिभावकों ने सरकारी स्कूलों की जगह निजी स्कूलों को ज्यादा महत्व दिया | आज हालात ये हैं की सरकारी स्कूल किसी प्रकार रो धो कर शिक्षा के अधिकार और सर्व शिक्षा अभियान जैसे नियमों का पालन कर रहे हैं लेकिन इनकी हालत दिन पर दिन बाद से बत्तर होती चली जा रही है | वहीँ निजी स्कूलों में नामांकन के लिए जहाँ खासी मारा मरी चल रही है वहीँ इन स्कूलों में शिक्षा सेवा से ज्यादा व्यापार हो गई है | विशेषज्ञों का मनना है की राज्यों में शिक्षकों के लाखों लाख पद खाली पड़े हैं | सरकार प्राथिमिक शिक्षा की गुणवत्ता को मानकों के अनुरूप लाने के लिए अनुमानित बजट का प्रावधान नहीं कर पा रही है | वहीँ दूसरी ओर मैकाले शिक्षा पद्धति से जुड़ी अंग्रजी शिक्षा का बाज़ार इन दिनों कुछ इस तरह से गरम हो गया है की हर अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ना चाहता है | इस विचार ने और भी सरकारी स्कूलों को नाकारा बना दिया है | बिना योग्यता परखे ही ऐसी शिक्षकों की भारती कर ली गई है जिन्हें अभी स्वयं शिक्षित होने की ज़रूरत है | समाज और सरकार ने शिक्षा के अधिकार के तहत बुनियादी परिवर्तन की बात नहीं की बल्कि मिड डे मेल, यूनिफौर्म, किताबें. साईकिल, लैपटॉप और छात्र वृत्तियाँ का लालच देकर छात्रों को स्कूलों तक लाने की कोशिश तो की लेकिन इन प्रलोभनों से न कोई बड़ा परिवर्तन होना था और न हुआ |
          आज हमारे देश में लाखों लाख बच्चे शिक्षा के अधिकार के तहत स्कूल जाते हैं लेकिन स्कूलों में कुछ भी ऐसा नहीं है जो बच्चों को स्थायी रूप से स्कूलों से जुदा रख सके | अभिनव शिक्षा प्रयोगों की बात तो छोड़ ही दीजिये सब मानते हैं की शिक्षा की गुणवत्ता को अगर बढ़ाना है तो शिक्षा प्रबंध को प्रभावी बनाना होगा | सरकारें इस काम को अकेले नहीं कर सकती इसमें समाज का सोच और भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी | बच्चों की शिक्षा के लिए जिन स्थानों पर समाज ने रूचि दिखाई वहां शिक्षा का स्तर अपने आप ऊपर चला गया | अध्यापकों की नियुक्ति स्कूलों में तत्काल की जानी चाहिए | शिक्षा पाने वाले छात्र को प्रलोभन नहीं, उसके अच्छे काम के लिए पारितोषित दिया जाना चाहिए | छात्रों को मुफ्तखोरी की आदत अगर एक बार लग गई तो वे अपने जीवन में भी सारा कुछ मुफ्त में हांसिल करना चाहेंगे | छात्रों के लिए रोचक और नवीनतम पाठ्यक्रम तैयार करने का प्रयास भी होना चाहिए | पाठ्यक्रम में ऐसी सामग्री होनी चाहिए जो आज के दौर में बच्चों को संघर्ष के लिए तैयार करती हों नैतिक रूप से सबल बनाती हों और देश प्रेम सिखाती हों | शिक्षा का अधिकार कानून बना देने मात्र से शिक्षा सब के लिए सुलभ नहीं हो जाती | शिक्षा के अधिकार की रक्षा तभी हो सकेगी जब बच्चों और शिक्षकों को समुचित  संसाधन उपलब्ध काराए जाएँ और अगर ऐसा नहीं होता तो शिक्षा का अधिकार, कानून एक राजनैतिक ढकोसला ही साबित होगा |
                                                     -अजामिल

Thursday, September 24, 2026

आखिर बच्चे जाएँ तों कहाँ जाएँ?/ अजामिल

ज़रूरी मुद्दा:
बच्चे आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ?
**अजामिल
स्कूल, माता-पिता और व्यवस्था के बीच पिसता बचपन
आज का बच्चा केवल स्कूल और माता-पिता के बीच नहीं फँसा है; वह एक ऐसी शिक्षा-व्यवस्था के बीच फँसा है, जहाँ उससे लगातार बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उसके लिए बेहतर वातावरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी अक्सर पीछे छूट जाती है।
एक ओर निजी स्कूलों की फीस, प्रतियोगिता और अभिभावकों की महत्वाकांक्षाएँ हैं, दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की अपनी चुनौतियाँ हैं। और इन दोनों के बीच खड़ा है वह बच्चा, जिसके हाथ में किताब तो है, लेकिन मन में अनेक सवाल हैं—क्या मैं अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरा उतर पाऊँगा? क्या मैं अपने शिक्षक को संतुष्ट कर पाऊँगा? अगर मैं असफल हुआ तो मेरा क्या होगा? और अगर मेरा स्कूल ही मेरे लिए पर्याप्त नहीं है तो मैं कहाँ जाऊँ?
सरकारी स्कूलों का संकट केवल स्कूलों का संकट नहीं है
उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों के विलय और pairing की नीति ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है। सरकार का कहना है कि कम नामांकन वाले विद्यालयों को आसपास के बेहतर संसाधन वाले विद्यालयों से जोड़ा जा रहा है, ताकि शिक्षक, भवन और अन्य संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके। 2025 में सरकार ने 50 से कम विद्यार्थियों वाले विद्यालयों को नजदीकी विद्यालयों के साथ जोड़ने की नीति अपनाई थी और इसे शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में कदम बताया था।
सरकार की अपनी दलील में एक तर्क है—बहुत छोटे विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक और संसाधन उपलब्ध कराना कठिन है। लेकिन यहीं से एक दूसरा और अधिक असुविधाजनक सवाल पैदा होता है:
अगर किसी सरकारी स्कूल में बच्चे कम हो गए हैं, तो क्या समाधान स्कूल को बच्चे से दूर करना है या स्कूल को बच्चे के लिए बेहतर बनाना?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्कूलों में कम नामांकन का कारण हमेशा यह नहीं हो सकता कि गाँव या मोहल्ले के माता-पिता शिक्षा नहीं चाहते। विद्यालय में शिक्षक नहीं हैं, भवन जर्जर है, शौचालय खराब है, बिजली-पानी की व्यवस्था नहीं है, पढ़ाई का वातावरण कमजोर है—तो स्वाभाविक है कि सक्षम परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने लगेंगे। इसके बाद सरकारी स्कूल में बच्चों की संख्या और घटेगी और फिर कम नामांकन को स्कूल के विलय का आधार बनाया जाएगा।
यह एक ऐसा चक्र बन सकता है जिसमें व्यवस्था की कमजोरी को बच्चे की गलती मान लिया जाता है।
एक शिक्षक और पूरा स्कूल
भारत की शिक्षा-व्यवस्था के सामने सबसे गंभीर प्रश्नों में से एक शिक्षक की उपलब्धता है। UDISE+ के 2023-24 के आँकड़ों के हवाले से सामने आया कि देश में 1,10,971 स्कूल ऐसे थे जहाँ केवल एक शिक्षक था।
उत्तर प्रदेश में भी शिक्षक पदों की बड़ी संख्या खाली होने का प्रश्न लगातार उठता रहा है। अगस्त 2025 में विधानसभा में सरकार की ओर से बताया गया कि प्राथमिक विद्यालयों में 4,17,886 स्वीकृत शिक्षकीय पदों में 3,38,590 पद भरे हुए थे; उच्च प्राथमिक स्तर पर भी स्वीकृत और कार्यरत शिक्षकों के बीच अंतर था।
कल्पना कीजिए उस शिक्षक की स्थिति की, जिसे एक ही विद्यालय में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को संभालना हो। और कल्पना कीजिए उन बच्चों की, जिन्हें एक साथ अलग-अलग स्तरों पर पढ़ना हो।
क्या हम ऐसे वातावरण में बच्चों से वही शैक्षिक परिणाम माँग सकते हैं जो अत्याधुनिक सुविधाओं वाले विद्यालयों से अपेक्षित हैं?
स्कूल का भवन भी शिक्षा का हिस्सा है
शिक्षा केवल किताब और शिक्षक से नहीं होती। साफ-सुथरा कमरा, पर्याप्त रोशनी, हवा, बैठने की उचित व्यवस्था, ब्लैकबोर्ड, शौचालय, पीने का पानी और सुरक्षित भवन—ये सब शिक्षा की बुनियादी शर्तें हैं।
यदि बच्चे को फर्श पर बैठना पड़े, कक्षा में गर्मी हो, पंखा न हो, दीवारें गंदी हों, ब्लैकबोर्ड तक ठीक न हो और विद्यालय में केवल एक-दो शिक्षक हों, तो हमें यह पूछना चाहिए कि बच्चे को दोष किस बात का दिया जा रहा है?
बच्चा पढ़ना चाहता है, लेकिन क्या हमने उसके लिए पढ़ने योग्य वातावरण बनाया है?
यही वह प्रश्न है जिसे शिक्षा पर होने वाली बड़ी बहसों में अक्सर भुला दिया जाता है।
स्कूल बंद नहीं हुए—लेकिन बच्चे कहाँ गए?
सरकार का कहना है कि स्कूल स्थायी रूप से बंद नहीं किए गए, बल्कि उन्हें दूसरे विद्यालयों के साथ जोड़ा गया है। जुलाई 2025 में बेसिक शिक्षा मंत्री ने भी कहा था कि कोई विद्यालय स्थायी रूप से बंद नहीं किया गया और आवश्यकता होने पर वहाँ फिर से कक्षाएँ शुरू की जा सकती हैं।
लेकिन किसी अभिभावक के लिए प्रशासनिक शब्दावली से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उसका बच्चा अब पढ़ने कहाँ जाएगा?
यदि पहले स्कूल घर से कुछ कदम की दूरी पर था और अब दूसरे विद्यालय तक जाने के लिए उसे अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, तो खासकर छोटे बच्चों और लड़कियों के लिए यह केवल सुविधा का प्रश्न नहीं रह जाता। सुरक्षा, परिवहन और परिवार की आर्थिक स्थिति भी इससे जुड़ जाती है।
ऐसी ही चिंताएँ उत्तर प्रदेश में विद्यालयों की pairing के बाद सामने आई रिपोर्टों में भी दिखाई दीं, जहाँ कुछ बच्चों के लिए दूरी और सुरक्षा चिंता का विषय बनी।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “स्कूल बंद हुआ या मर्ज हुआ?”
सवाल यह होना चाहिए—
क्या बच्चे की शिक्षा पहले से अधिक आसान हुई या कठिन?
मीडिया और समाज की भूमिका
यदि किसी सरकारी विद्यालय की वास्तविक स्थिति खराब है, तो उसे सामने लाना व्यवस्था के खिलाफ साजिश नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा होना चाहिए।
मीडिया का काम केवल उद्घाटन समारोह, नई योजनाओं और सरकारी घोषणाओं को दिखाना नहीं है। उसे यह भी देखना चाहिए कि उन योजनाओं का जमीन पर क्या हुआ।
जिस विद्यालय में बच्चे पढ़ते हैं, वहाँ जाकर देखना चाहिए कि उनके पास बैठने की जगह है या नहीं। शिक्षक कितने हैं। शौचालय की स्थिति क्या है। पीने का पानी है या नहीं। कक्षा में पंखा चलता है या नहीं। ब्लैकबोर्ड है या नहीं। बच्चों को वास्तव में पढ़ाया जा रहा है या शिक्षक प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कामों में उलझे हैं।
हालाँकि किसी विशेष विद्यालय में मीडिया को प्रवेश से रोके जाने के दावे को प्रमाण के बिना सामान्य तथ्य की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए। लेकिन यदि कहीं ऐसा होता है तो यह निश्चित रूप से गंभीर सार्वजनिक प्रश्न है, क्योंकि सरकारी विद्यालय जनता के पैसे से चलते हैं और वहाँ पढ़ने वाले बच्चे समाज की जिम्मेदारी हैं।
कम नामांकन का असली इलाज क्या है?
यहाँ शिक्षा नीति के सामने सबसे कठिन प्रश्न है।
अगर किसी स्कूल में बच्चे कम हैं तो उसे बंद या मर्ज करना सबसे आसान प्रशासनिक रास्ता हो सकता है। लेकिन उससे पहले यह पूछना चाहिए कि वहाँ बच्चे कम क्यों हैं?
क्या वहाँ शिक्षक पर्याप्त हैं?
क्या भवन ठीक है?
क्या विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है?
क्या अभिभावकों को विद्यालय पर विश्वास है?
क्या निजी विद्यालयों की ओर बच्चों के जाने का कारण सरकारी विद्यालय की कमजोरी है?
यदि उत्तर हाँ है, तो समस्या स्कूल में बच्चों की संख्या नहीं, स्कूल की गुणवत्ता है।
और गुणवत्ता सुधारने के बजाय स्कूल को ही समाप्त कर देना बीमारी का इलाज नहीं है।
गरीब बच्चे के पास विकल्प कम हैं
सरकारी शिक्षा-व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन बच्चों के प्रति है जिनके परिवार महँगे निजी स्कूलों का खर्च नहीं उठा सकते।
समाज का संपन्न वर्ग खराब सरकारी स्कूल से अपने बच्चे को निकालकर दूसरे स्कूल में भेज सकता है। गरीब परिवार के पास यह विकल्प सीमित होता है।
इसलिए सरकारी स्कूल का कमजोर होना केवल शिक्षा का संकट नहीं है; यह सामाजिक समानता का संकट भी है।
अगर एक बच्चे को अच्छी शिक्षा इसलिए मिलती है क्योंकि उसके माता-पिता उसके लिए महँगा स्कूल खरीद सकते हैं और दूसरे बच्चे को केवल इसलिए खराब शिक्षा मिलती है क्योंकि उसके परिवार के पास पैसा नहीं है, तो हम शिक्षा के माध्यम से असमानता को कम नहीं कर रहे, बल्कि उसे और गहरा कर रहे हैं।
बच्चे पर पहले से ही बहुत दबाव है
और यहीं से यह प्रश्न हमारे मूल विषय से जुड़ता है।
जिस बच्चे को घर में माता-पिता की अपेक्षाओं का दबाव झेलना पड़ रहा है, स्कूल में परीक्षा और प्रदर्शन का दबाव झेलना पड़ रहा है, वह अगर सरकारी विद्यालय में पढ़ता है तो उसे कभी-कभी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से भी जूझना पड़ता है।
एक तरफ बच्चे से कहा जाता है—“तुम्हें भविष्य में बहुत आगे जाना है।”
दूसरी तरफ उसे वह वर्तमान नहीं दिया जाता जिसमें वह अच्छी तरह पढ़ सके।
हम उससे कहते हैं—“प्रतियोगिता बहुत कठिन है।”
लेकिन क्या हमने उसे प्रतियोगिता के लिए समान मैदान दिया है?
हम कहते हैं—“तुम्हें मेहनत करनी होगी।”
लेकिन क्या हमने उसके हाथ में पर्याप्त किताब, पर्याप्त शिक्षक और पर्याप्त सुविधाएँ दी हैं?
शिक्षा सरकार की कृपा नहीं, बच्चे का अधिकार है
शिक्षा किसी सरकार की दया नहीं है। यह बच्चे का अधिकार है और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
इसलिए स्कूलों के विलय पर बहस केवल प्रशासनिक दक्षता की बहस नहीं होनी चाहिए। हमें देखना होगा कि इस प्रक्रिया का असर बच्चे के अधिकार, उसकी सुरक्षा, उसकी पहुँच और उसकी शिक्षा की गुणवत्ता पर क्या पड़ रहा है।
सरकार यदि कहती है कि विलय से शिक्षा बेहतर होगी, तो उसे आँकड़ों और जमीन पर परिणामों के साथ यह साबित करना चाहिए।
कितने बच्चों को बेहतर शिक्षक मिले?
कितने विद्यालयों में सुविधाएँ सुधरीं?
कितने बच्चों की उपस्थिति बढ़ी?
कितने बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी?
कितने विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात सुधरा?
इन प्रश्नों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
बच्चे आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ?
आज का बच्चा सचमुच एक विचित्र चौराहे पर खड़ा है।
घर उससे सफलता चाहता है।
स्कूल उससे परिणाम चाहता है।
समाज उससे प्रतियोगिता चाहता है।
सरकार उससे भविष्य की उम्मीद करती है।
लेकिन बच्चा शायद केवल इतना चाहता है कि कोई उसकी बात सुन ले।
उसे एक ऐसा स्कूल चाहिए जहाँ शिक्षक पर्याप्त हों।
एक ऐसी कक्षा चाहिए जहाँ वह आराम से बैठ सके।
एक ऐसा वातावरण चाहिए जहाँ उसे सम्मान मिले।
एक ऐसा घर चाहिए जहाँ उसके कम अंक आने पर उसे असफल इंसान न समझा जाए।
और एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जो यह स्वीकार करे कि बच्चा किसी आँकड़े का हिस्सा नहीं, एक जीवित मनुष्य है।
स्कूलों की संख्या घटाने से शिक्षा की गुणवत्ता अपने आप नहीं बढ़ती। असली सुधार तब होगा जब हर बच्चे तक अच्छा शिक्षक, सुरक्षित भवन, पर्याप्त संसाधन और सम्मानजनक वातावरण पहुँचे।
हमें यह तय करना होगा कि हमारी प्राथमिकता क्या है—कम विद्यालय या बेहतर विद्यालय?
क्योंकि अंततः सवाल स्कूल की इमारत का नहीं है।
सवाल उस बच्चे का है जो हर सुबह अपनी किताब लेकर निकलता है और विश्वास करता है कि पढ़-लिखकर वह अपना भविष्य बदल सकता है।
उस विश्वास को टूटने से बचाना ही शिक्षा-व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
और यदि हम उस विश्वास को बचा नहीं पाए, तो फिर हमें यह शिकायत करने का अधिकार भी नहीं रहेगा कि आज के बच्चे पढ़ाई से दूर क्यों जा रहे हैं।
**अजामिल 

Friday, September 18, 2026

ये कैसा विकास, किसका विकास? अजामिल

विकास किसका, अधिकार किसका?
एक सवाल से शुरू करते हैं—विकास आखिर किसके लिए होता है?
आप कहेंगे—मनुष्य के लिए।
समाज के लिए।
बेहतर जीवन के लिए।
ठीक है। लेकिन फिर एक दूसरा सवाल पूछें—अगर विकास के नाम पर मनुष्य ही अपनी जमीन, जंगल, नदी और जीवन से बेदखल होने लगे, तो वह विकास किसका है?
यहीं से हमारी असली चिंता शुरू होती है।
आज भारी उद्योग, बड़े बाँध, खनन परियोजनाएँ, एक्सप्रेस-वे, स्मार्ट सिटी और वैश्विक बाजार विकास की तस्वीर बनाते हैं। इनके लिए जमीन चाहिए, खनिज चाहिए, पानी चाहिए और जंगल चाहिए। और जब इन संसाधनों पर पहले से कोई समुदाय रह रहा हो, अपनी आजीविका चला रहा हो, तब सवाल केवल अधिग्रहण का नहीं रह जाता।
सवाल अधिकार और संप्रभुता का हो जाता है।
मैं आपसे पूछना चाहता हूँ—जल, जंगल, जमीन और खनिज के असली मालिक कौन हैं?
राज्य?
कंपनियाँ?
या वे लोग जो सदियों से इन संसाधनों के साथ अपना जीवन बनाते आए हैं?
यहाँ एक महत्वपूर्ण अवधारणा सामने आती है—‘एमिनेंट डोमेन’ (Eminent Domain)। सामान्य अर्थ में इसका मतलब है कि राज्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए निजी संपत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण कर सकता है।
लेकिन जरा इसके भीतर छिपे सवाल को देखिए।
राज्य को यह सर्वोच्च अधिकार मिला कहाँ से?
लोकतंत्र में राज्य स्वयं संप्रभु नहीं होता; वह जनता से शक्ति प्राप्त करता है। फिर क्या जनता की संप्रभुता केवल चुनाव के दिन दिखाई देती है? क्या उसके बाद जमीन, जंगल, पानी और प्राकृतिक संसाधनों के बारे में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह राज्य के हाथ में चला जाता है?
यहीं विकास की पूरी बहस एक नए मोड़ पर पहुँच जाती है।
किसी किसान से कहिए कि उसकी जमीन किसी परियोजना के लिए ली जा रही है। उसे मुआवजा दीजिए। लेकिन क्या आपने उसकी जमीन वापस दे दी?
नहीं।
आपने केवल जमीन की आर्थिक कीमत दी है।
लेकिन जमीन की कीमत और जमीन का अर्थ—क्या दोनों एक ही चीज हैं?
जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं होती। वह किसी परिवार की आजीविका हो सकती है, किसी समुदाय की स्मृति हो सकती है, किसी आदिवासी समाज की संस्कृति हो सकती है। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता और नदी केवल पानी की धारा नहीं होती।
फिर हम प्रकृति को केवल आर्थिक संसाधन में बदलकर कैसे देख सकते हैं?
2013 के भूमि अधिग्रहण कानून ने इसी जटिलता को ध्यान में रखते हुए सामाजिक प्रभाव आकलन, सार्वजनिक सुनवाई, ग्रामसभा से जुड़ी प्रक्रियाओं और पुनर्वास-पुनर्स्थापन जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया। इसका उद्देश्य अधिग्रहण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावित लोगों की भागीदारी वाला बनाना था।
लेकिन कानून से बड़ा सवाल लोकतंत्र का है।
फैसला कौन करेगा?
जिसकी जमीन जा रही है, उसकी आवाज कितनी महत्वपूर्ण होगी?
जिस गाँव का जंगल उजड़ रहा है, उसकी ग्रामसभा की भूमिका कितनी निर्णायक होगी?
जिस नदी का रास्ता बदला जा रहा है, क्या उस नदी के किनारे रहने वाले लोगों की चिंता केवल ‘परियोजना की लागत’ का हिस्सा होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या विकास का अर्थ यह है कि कुछ लोगों को लाभ मिले और कुछ लोगों को विस्थापन स्वीकार करना पड़े?
मैं यह नहीं कह रहा कि उद्योग नहीं होने चाहिए। शहर नहीं बढ़ने चाहिए। सड़कें नहीं बननी चाहिए। खनिजों का उपयोग नहीं होना चाहिए।
प्रश्न विकास के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है।
प्रश्न यह है कि विकास की दिशा कौन तय करेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा।
अगर निर्णय लेने की शक्ति कुछ हाथों में केंद्रित होती जाती है और प्राकृतिक संसाधन धीरे-धीरे बाजार की वस्तु बनते जाते हैं, तो हमें ठहरकर सोचना ही होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल विकास की लाभार्थी नहीं है।
वह विकास की स्वामी भी है।
और शायद विकास की सबसे जरूरी कसौटी यही होनी चाहिए—
विकास से क्या बना, यह पूछने से पहले यह पूछा जाए कि विकास के रास्ते में क्या और कौन उजड़ा?
यही सवाल हमें ‘एमिनेंट डोमेन’ से आगे ले जाता है—राज्य की सत्ता से जनता की संप्रभुता तक।
और शायद आज हमें सबसे ज्यादा इसी सवाल पर बातचीत करने की जरूरत है।
विकास किसका?
अधिकार किसका?
और निर्णय लेने का अंतिम हक किसका?
आगे के लेखों में भी मैं इसी सीधी बातचीत, छोटे-छोटे सवालों, क्रमशः खुलती वैचारिक परतों और अंत में पाठक के सामने छोड़े गए बड़े प्रश्न वाली शैली को बनाए रखूँगा।

Wednesday, September 16, 2026

हां मैंने फिराक को देखा है

अल फिराके अल फिराके अल फिराके अल फ़िराक
इस तरह इस ज़िन्दगी का एक वरक़ उल्टा गया । - मीना कुमारी
सन् 1972 बैंक रोड इलाहाबाद । सर्दियों की एक दोपहर । कथाकार अनीता गोपेश , शशि शर्मा  और मैं यानि अजामिल रोज़ की तरह एशिया के सबसे बड़े शायर रघुपति सहाय फ़िराक जी के सानिध्य का सुख उठा रहे थे । फ़िराक साहब तबियत से साहित्य के अनेक मुद्दों पर बतिया रहे थे । अनीता और शशि जी नोट्स ले रहे थे । मैं अपने 35 mm फार्मेट के जेनिथ कैमरे से फ़िराक साहब के चेहरे पर आ जा रही भाव भंगिमाओं को कैद रहा था । उस दिन 80 से ज़्यादा तस्वीरें उतारी थी मैंने फ़िराक साहब की । उन तस्वीरों में से काफी तस्वीरें धर्मयुग सारिका दिनमान जनसत्ता नव भारत टाइम्स और इंडिया टुडे  आदि तमाम पत्रपत्रिकाओं  में प्रकाशित हुई थी ।
       वक़्त गुज़र गया । पर यादें आज भी ताज़ा है । फ़िराक साहब कहाकार्टे थे क़ि लोग नाज़ करेंगे क़ि उन्होंने फ़िराक को देखा है । मैं और मेरी दोनों सहेलियां हम भाग्य शाली हैं कि हमने फ़िराक साहब को देखा ही नहीं है बल्कि उनकी प्यार दुलार से भरी गालियां भी खायीं हैं ।
-अजामिल
छाया : अजामिल

काव्यपाठ क़ि कला /अजामिल

**काव्यपाठ की कला
**कविता के प्राण बसते हैं काव्यपाठ में
**जो कविता सुनी सुनाई नहीं जाती वह कविता नहीं है...
कविता का पाठ : कला या चुनौती

"कविता केवल लिखने की वस्तु नहीं,
वह जीने और सुनाने की कला है।
अच्छा काव्य पाठ ही कविता को
श्रोता के दिल और दिमाग तक पहुँचाता है।"
संवाद और कविता : एक समान साधना

रंगमंच पर किसी अभिनेता द्वारा जब संवाद बोले जाते हैं, तो उनका अर्थ और प्रभाव तभी सामने आता है जब अभिनेता संवादों को बोलने की कला में प्रशिक्षित हो। ठीक इसी तरह कविता का पाठ (Poetry Recitation) भी केवल शब्दों को बोलना नहीं है, बल्कि एक जीवंत अनुभव की अभिव्यक्ति है।

विशेषज्ञों का मानना है कि “संवाद और काव्य पाठ, दोनों का लक्ष्य श्रोता तक भाव और अर्थ पहुँचाना है।” जब हम कविता को पढ़ते हैं, तो उसका असर कुछ और होता है, लेकिन जब वही कविता रंगमंच का अभिनेता पढ़ता है, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा और जीवंत होता है।
काव्य पाठ की वास्तविकता

यह माना जाता है कि दस में से आठ कवि अपनी कविताओं का खराब पाठ करते हैं। परिणामस्वरूप उनकी बेहतरीन रचनाएँ भी श्रोताओं तक सही ढंग से नहीं पहुँच पातीं। सुनने वाले पर वह असर नहीं होता, जो होना चाहिए।

“कविता केवल पढ़ने की नहीं, जीने की चीज है।” लेकिन बहुत-से कवि इसे केवल पन्नों पर लिखे शब्दों की तरह प्रस्तुत करते हैं।
**सामान्य भूलें

कई कवि अपनी ही कविता की भाषा और आशय से पूरी तरह परिचित नहीं होते।

वे समझते हैं कि केवल कागज़ से पढ़ लेना या स्मृति से सुना देना पर्याप्त है।

मंच पर कुछ कवि अनावश्यक चिल्लाकर या बार-बार तालियाँ माँगकर कविता की गरिमा को नष्ट कर देते हैं।

गंभीर कवि भी कई बार अपनी कविता की कमज़ोरी को अभिनय या आवाज़ की नकल से ढकने की कोशिश करते हैं।

ऐसे कवियों की कविताएँ श्रोता के मन तक नहीं पहुँच पातीं और कविता की गंभीरता हल्की पड़ जाती है। “फूहड़ अभिनय कविता का सहारा नहीं, बल्कि उसकी हत्या है।”
सादगी और प्रभावशीलता की मांग

कविता अपने संप्रेषण में सादगी और विनम्रता चाहती है। सच्चे कवि वे हैं, जो कविता को मंच पर जीकर प्रस्तुत करते हैं। ऐसे कवियों का काव्य पाठ श्रोताओं को भीतर तक छू लेता है और उनसे बार-बार कविता सुनने का आग्रह किया जाता है।

आज सोशल मीडिया पर कई रंगकर्मी और कवि इस कला को गंभीरता से सीखकर कविता-पाठ कर रहे हैं, जिन्हें खूब सराहा जा रहा है। यह स्पष्ट है कि एक अच्छी कविता के साथ-साथ अच्छा काव्य पाठ भी आवश्यक है।

कविता और पाठ का संतुलन

यह भी सच है कि कभी-कभी अच्छा काव्य पाठ औसत दर्जे की कविता को लोकप्रिय बना देता है, जबकि खराब पाठ बेहतरीन कविताओं का असर नष्ट कर देता है। इसलिए ज़रूरी है कि कविता के कंटेंट और काव्य पाठ में संतुलन बना रहे।

“किताब में छपी कविता और मंच पर प्रस्तुत कविता, दोनों में वही अंतर है जो लिखित संवाद और रंगमंच पर बोले गए संवाद में होता है।”

कवि का दायित्व केवल कविता लिख देना नहीं है, बल्कि उसे अपने पाठ के माध्यम से श्रोताओं तक पहुँचाना भी है। जब तक कविता को सुनाया और जीया न जाए, वह अधूरी रहती है।

“कविता लिखना साहित्य है, और कविता का पाठ कला।”
**अजामिल

बादल सरकार और समानांतर नामा/अजामिल


समानांतरनामा और 
वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक
48 वर्ष पहले देखा गया एक सपना
आज से 48 वर्ष पहले सुपरिचित रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक अनेक सपनों और रंगमंच के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के साथ इलाहाबाद आए थे। उन्होंने बड़ी विनम्रता और समर्पण के साथ अपने रंगकर्म की साधना शुरू की। यह वह समय था जब इलाहाबाद का रंगमंच अपनी नाट्य प्रस्तुतियों के कारण पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना चुका था। यह जानना भी दिलचस्प है कि उस दौर में इलाहाबाद में देश के दूसरे शहरों की तुलना में बड़ी संख्या में नाट्य प्रस्तुतियाँ हुआ करती थीं।
उस समय समर्पित रंगकर्मियों द्वारा आयोजित लघु नाट्य प्रतियोगिताओं में ही लगभग 400 नाटक संगीत समिति के मंच पर देश की विभिन्न नाट्य संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत किए जाते थे। इन आयोजनों में 600 से 800 तक रंगकर्मी शामिल होते थे। इसी रंगमंचीय वातावरण में अनिल रंजन भौमिक ने अपनी नाट्य प्रस्तुतियों की शुरुआत इलाहाबाद से की। कुछ ही प्रस्तुतियों के बाद वे रंगमंच के एक चर्चित नाम बन गए।
रंगमंच से आगे भी थी एक बेचैनी
अनिल रंजन भौमिक केवल रंगकर्म तक सीमित नहीं रहना चाहते थे। साहित्य, कला और संस्कृति की दूसरी विधाओं में भी काम करने की उनकी गहरी रुचि थी। इसी सोच से उनकी संस्था ‘समानांतर’ ने कला की विभिन्न विधाओं को केंद्र में रखकर साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े लोगों को एक साथ लाने का काम शुरू किया। उनकी बहुमुखी प्रतिभा और सक्रियता को साहित्य और कला जगत ने सराहा और स्वीकार किया।
लेकिन समानांतर की यह यात्रा केवल किसी संस्था के विस्तार की कहानी नहीं थी। इसके पीछे एक ऐसा सपना था, जिसमें रंगमंच को केवल मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं माना गया था।
रंगकर्मी परिवार क्यों नहीं बन सके?
अनिल रंजन भौमिक हमेशा एक समर्पित रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी रहे। उनका सपना था कि रंगकर्मी एक परिवार की तरह रहें, मिल-जुलकर श्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ करें और समाज के हित में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें। इसी भावना के कारण अनेक रंगकर्मी उनकी संस्था से परिवार के सदस्यों की तरह जुड़े।
लेकिन दूसरी संस्थाएँ एक मंच और एक छत के नीचे आकर काम करने के लिए तैयार नहीं हो सकीं। सभी अपनी-अपनी संस्थाओं और अपने-अपने ढंग से काम करना चाहते थे। इसमें कोई बुराई नहीं थी, लेकिन एक-दूसरे का सहयोग न करना निश्चित रूप से दुखद था। रंगकर्मियों के बीच सहयोग और सामूहिकता की कमी अनिल रंजन भौमिक को लंबे समय तक कचोटती रही।
अकेले चलने का निर्णय
फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वे अकेले चलने में भी विश्वास रखते रहे। उनके इस लंबे और एकाकी प्रयास का परिणाम आज, 48 वर्ष बाद, ‘समानांतर’ के मंच पर अनेक विधाओं में दिखाई देता है।
देशभर के रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी आज उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। समानांतर ने ऐसी पहचान बनाई है जिसका देश के कला और संस्कृति जगत में सम्मान है और जिसके साथ जुड़कर काम करना अनेक लोगों के लिए अपने आप में एक अनुभव है।
किसी संस्था की असली पहचान शायद उसके नाम से नहीं, बल्कि इस बात से बनती है कि उसने कितने लोगों को अपने साथ जोड़ा और कितने लोगों के लिए संवाद और सृजन की जगह बनाई। समानांतर की यात्रा को इसी संदर्भ में देखना अधिक सार्थक होगा।
और फिर आया ‘समानांतरनामा’
हाल ही में समानांतर ने अपनी चर्चित अनियतकालीन पत्रिका ‘समानांतरनामा’ का चौथा अंक प्रकाशित किया है। यह अंक देश-विदेश में चर्चित नाटककार और निर्देशक बादल सरकार के रंगकर्म पर केंद्रित है। अनिल रंजन भौमिक ने इस विशेषांक को नाम दिया है—‘बादल सरकार शतक विशेषांक’।
समानांतरनामा का यह अंक अपनी विषयवस्तु, गंभीरता और प्रस्तुति के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करता है। बादल सरकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय सामग्री प्रकाशित की गई है।
बादल सरकार को समझने की एक खिड़की
विशेषांक के ‘धरोहर’ स्तंभ में नेमिचंद्र जैन और प्रतिभा अग्रवाल जैसे वरिष्ठ रंगकर्मियों ने बादल सरकार के चर्चित नाटकों ‘बाकी इतिहास’ और ‘एवं इंद्रजीत’ पर महत्वपूर्ण आलेख लिखे हैं। इसके साथ ही विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर बादल सरकार द्वारा दिया गया उनका सार्थक संदेश भी प्रकाशित किया गया है।
इस विशेषांक में बादल सरकार के रंग-जीवन से जुड़े अनेक अनुभवों को पढ़ना अपने आप में एक अलग तरह का अनुभव है। पंडित सत्यदेव दुबे, सुलभा देशपांडे, महेश चंद्र चट्टोपाध्याय, अनामिका हक्सर और सुधीर मिश्रा के महत्वपूर्ण आलेखों और टिप्पणियों को भी इसमें स्थान दिया गया है।
लेकिन बादल सरकार को समझने के लिए केवल उनके नाटकों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। उनके रंगमंच की बुनियादी अवधारणाओं को समझना भी जरूरी है।
‘तीसरा रंगमंच’ और उससे आगे
बादल सरकार की रंग-दृष्टि और उनके ‘तीसरे रंगमंच’ की अवधारणा पर इस विशेषांक में विशेष रूप से विचार किया गया है। यह वह पक्ष है जो बादल सरकार को भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक विशिष्ट रंगकर्मी के रूप में समझने में मदद करता है।
पत्रिका का ‘रंग वैचारिकी’ खंड भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें विजय तेंदुलकर, श्याम बेनेगल, गिरीश कर्नाड, अमोल पालेकर, मोहन आगाशे, देवेंद्र राज अंकुर, प्रो. लाल बहादुर वर्मा, कीर्ति जैन, राकेश वेदा, प्रो. मित्रसेन मजूमदार और राजेश कुमार जैसे महत्वपूर्ण रंगकर्मियों और चिंतकों के विचारों को सामने लाने वाले उपयोगी आलेख शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त भी इस अंक में ऐसी बहुत-सी सामग्री है जो रंगमंच में रुचि रखने वाले पाठकों को लंबे समय तक अपने साथ जोड़े रखती है।
केवल पढ़ने की नहीं, संभालकर रखने की सामग्री
बादल सरकार को केवल उनके नाटकों के माध्यम से नहीं, बल्कि उनकी संपूर्ण रंग-दृष्टि और रंगमंच के प्रति उनके विचारों के संदर्भ में समझना हो, तो समानांतरनामा का यह अंक उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराता है।
विशेषांक में बादल सरकार के कई सुंदर चित्र भी प्रकाशित किए गए हैं, जो इसे केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि संभालकर रखने की सामग्री भी बनाते हैं।
संपादन के पीछे एक सामूहिक श्रम
इस अंक के संपादक मंडल में राजेंद्र कुमार, देवेंद्र राज अंकुर और अनीता गोपेश का सहयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके सहयोग के बिना यह अंक इस रूप में संभव नहीं था।
विशेषांक में बादल सरकार के चर्चित नाटक ‘सीढ़ी’ का अनुवाद अनिल रंजन भौमिक ने किया है, जबकि ‘बीज’ का अनुवाद यामाहा सराफ ने किया है। इन दोनों अनुवादों ने अंक की उपयोगिता को और बढ़ा दिया है।
एक विशेषांक से कहीं अधिक
मेरी दृष्टि में ‘समानांतरनामा’ का यह अंक केवल एक विशेषांक नहीं, बल्कि बादल सरकार के रंगकर्म को समझने की दिशा में एक गंभीर दस्तावेज है। हिंदी रंगमंच की पत्रिकाओं के संदर्भ में यह अंक इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें सामग्री का चयन केवल सूचना देने के लिए नहीं, बल्कि एक बड़े रंगकर्मी की रंग-दृष्टि को समझने के लिए किया गया है।
बादल सरकार को उनके रंगकर्म, उनकी वैचारिकी और उनके ‘तीसरे रंगमंच’ की अवधारणा के माध्यम से समझना चाहने वाले पाठकों के लिए यह अंक लंबे समय तक उपयोगी रहेगा। इसे एक संदर्भ सामग्री की तरह भी देखा जा सकता है।
48 साल की यात्रा का एक पड़ाव
अनिल रंजन भौमिक ने 48 वर्ष पहले जिस सपने के साथ इलाहाबाद में अपने रंगकर्म की शुरुआत की थी, उसकी एक झलक आज समानांतर की ऐसी गतिविधियों में दिखाई देती है। अकेले शुरू की गई एक यात्रा जब इतने वर्षों बाद अनेक लोगों को अपने साथ जोड़ लेती है, तो उसके पीछे केवल किसी संस्था का विस्तार नहीं होता; उसके पीछे लगातार किए गए काम, विश्वास और धैर्य की लंबी कहानी होती है।
‘समानांतरनामा’ का यह विशेषांक उसी लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
— अजामिल

Tuesday, September 15, 2026

स्वाद का छलावा या सेहत का खेल /अजामिल

स्वाद का छलावा और सेहत का सत्य: 

बदलती खाद्य-संस्कृति का संकट

**अजामिल

आज का मनुष्य एक अजीब द्वंद्व में जी रहा है। उसके सामने थाली में सजे विकल्प जितने आकर्षक हैं, उतने ही खतरनाक भी। एक ओर स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का शोर है—जिम, योग, डाइट प्लान, ऑर्गेनिक फूड—और दूसरी ओर स्वाद के नाम पर फैलता हुआ एक ऐसा बाज़ार, जिसने मनुष्य की भूख को आदत और आदत को लत में बदल दिया है। परिणाम यह है कि मनुष्य यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या छोड़ देना चाहिए।

यह संकट केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का है। आधुनिक जीवनशैली, भागदौड़, बाज़ार की चकाचौंध और सुविधा की अंधी दौड़ ने हमारे भोजन को “पोषण” से हटाकर “मनोरंजन” का साधन बना दिया है। भोजन अब शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि जीभ का उत्सव बन गया है—और यही उत्सव धीरे-धीरे बीमारी का उत्स बनता जा रहा है।

स्वाद बनाम सेहत: एक गहराता द्वंद्व

स्वाद तात्कालिक सुख देता है। वह जीभ को संतुष्ट करता है, मन को क्षणिक आनंद देता है। लेकिन सेहत एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है—जो अनुशासन, संयम और समझ की मांग करती है। आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम अल्पकालिक सुख के लिए दीर्घकालिक स्वास्थ्य को दांव पर लगा रहे हैं।

वैज्ञानिक शोध लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि प्रोसेस्ड फूड, अत्यधिक चीनी, नमक और वसा से भरपूर भोजन—जैसे फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स—शरीर के लिए धीमे जहर की तरह काम करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों में तेजी से वृद्धि का एक बड़ा कारण यही असंतुलित खानपान है।

भारत में स्थिति और चिंताजनक है। पारंपरिक संतुलित भोजन—दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, छाछ—की जगह अब तली-भुनी और बाजारू चीज़ों ने ले ली है। खाने का समय अनियमित हो गया है। “जब मन किया, तब खा लिया”—यह नई जीवनशैली बन चुकी है।

पेट: पोषण का केंद्र या कचरे का डिब्बा?

एक कटु सत्य यह है कि आज अधिकांश लोगों का पेट एक “डस्टबिन” की तरह व्यवहार किया जा रहा है। जो भी सामने आया—चाहे भूख हो या न हो—उसे खा लिया गया। स्वाद के नाम पर हम शरीर की सीमाओं को अनदेखा कर रहे हैं।

हम यह भूल चुके हैं कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर के संचालन के लिए ऊर्जा और पोषण देने का माध्यम है। जब हम बिना आवश्यकता, बिना संतुलन और बिना समझ के खाते हैं, तो वही भोजन हमारे लिए विष बन जाता है।

आज एक सामान्य परिवार में यह देखने को मिलता है कि खाने-पीने पर जितना खर्च नहीं होता, उससे अधिक दवाइयों पर खर्च हो रहा है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट का भी संकेत है।

पूर्वजों की परंपरा: भोजन एक साधना

हमारे पूर्वजों ने भोजन को केवल भोग नहीं, बल्कि एक साधना माना था। वे जानते थे कि “जैसा अन्न, वैसा मन।” इसलिए भोजन में सात्विकता, सादगी और संतुलन को प्राथमिकता दी जाती थी।

खाना घर में बनता था, ताज़ा बनता था, और उसमें परिवार के हर सदस्य की सेहत का ध्यान रखा जाता था। भोजन का समय निश्चित होता था। अधिक खाने से बचा जाता था। उपवास और व्रत जैसी परंपराएँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शरीर को विश्राम देने की वैज्ञानिक पद्धतियाँ थीं।

जैन धर्म की शिक्षाएँ: संयम का विज्ञान

यदि हम भारतीय परंपराओं में देखें, तो जैन धर्म ने भोजन के विषय में अत्यंत गहन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। जैन दर्शन में “अहिंसा” के साथ-साथ “संयम” को सर्वोच्च स्थान दिया गया है—और यह संयम भोजन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

जैन अनुयायी कई महत्वपूर्ण नियमों का पालन करते हैं:

सूर्यास्त के बाद भोजन न करना—जिससे पाचन तंत्र को पर्याप्त विश्राम मिले।

सात्विक और सरल भोजन—जिसमें तामसिक और उत्तेजक पदार्थों से बचा जाता है।

मिताहार (कम खाना)—अर्थात आवश्यकता से अधिक न खाना।

उपवास और एकासन—शरीर को डिटॉक्स करने के प्राकृतिक तरीके।

आधुनिक विज्ञान भी अब इन सिद्धांतों की पुष्टि कर रहा है। “इंटरमिटेंट फास्टिंग” जैसी अवधारणाएँ, जो आज पश्चिम में लोकप्रिय हैं, हमारे पारंपरिक ज्ञान का ही आधुनिक रूप हैं।

आधुनिक विज्ञान और बढ़ती चिंताएँ

आज पूरी दुनिया में “लाइफस्टाइल डिज़ीज़” (जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ) सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी हैं।

मोटापा बच्चों तक में तेजी से बढ़ रहा है।

टाइप-2 डायबिटीज़ अब युवाओं में भी आम हो गई है।

हृदय रोग पहले की तुलना में अधिक कम उम्र में हो रहे हैं।

इन सबके पीछे एक बड़ा कारण है—अनियंत्रित और असंतुलित खानपान।

वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर को जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है, उससे अधिक ऊर्जा (कैलोरी) लेने पर वह वसा के रूप में जमा हो जाती है। साथ ही, प्रोसेस्ड फूड में मौजूद केमिकल्स और प्रिज़र्वेटिव्स शरीर के आंतरिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं।

स्वाद का बाजार और हमारी कमजोरियाँ

आज का बाजार हमारी कमजोरियों को भली-भांति समझता है। वह जानता है कि मनुष्य को त्वरित सुख चाहिए। इसलिए वह ऐसे खाद्य पदार्थ तैयार करता है जो स्वाद में अत्यंत आकर्षक हों, लेकिन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों।

विज्ञापन, पैकेजिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से हमें लगातार यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि “स्वाद ही जीवन है।” लेकिन सच्चाई यह है कि यह स्वाद एक भ्रम है—एक ऐसा जाल, जिसमें फंसकर हम अपनी सेहत खो रहे हैं।

समाधान: संतुलन की ओर वापसी

यह स्थिति निराशाजनक जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। यदि हम सचेत हो जाएँ, तो बहुत कुछ बदला जा सकता है।

भोजन को प्राथमिकता दें, स्वाद को नहीं

भोजन का चुनाव इस आधार पर करें कि वह शरीर के लिए कितना लाभकारी है।

नियमित समय पर खाएँ

शरीर को एक लय में रखें। अनियमितता पाचन को बिगाड़ती है।

मिताहार अपनाएँ

जितनी भूख हो, उससे थोड़ा कम खाएँ।

प्राकृतिक और ताज़ा भोजन लें

पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएँ।

उपवास और विराम को अपनाएँ

सप्ताह में एक दिन या समय-समय पर शरीर को विश्राम दें।

परंपराओं से सीखें

जैन धर्म और अन्य भारतीय परंपराओं के सिद्धांतों को आधुनिक जीवन में अपनाएँ।

निष्कर्ष: स्थायी सुख का मार्ग

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमें स्वाद चाहिए या नहीं—प्रश्न यह है कि हम किस कीमत पर उसे चाहते हैं। यदि स्वाद के पीछे भागते-भागते हम अपनी सेहत खो दें, तो वह स्वाद व्यर्थ है।

सेहत वह आधार है, जिस पर जीवन का हर सुख टिका होता है। स्वाद का आनंद क्षणिक है, लेकिन सेहत का सुख स्थायी है।

इसलिए यह समय है कि हम अपने भीतर झांकें और यह तय करें कि हम अपने पेट को पोषण का केंद्र बनाएँगे या कचरे का डिब्बा।

यदि हमने अभी भी नहीं संभला, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी। लेकिन यदि हम संयम और समझ का रास्ता चुनते हैं, तो हम न केवल अपनी सेहत बचा सकते हैं, बल्कि एक स्वस्थ समाज की नींव भी रख सकते हैं।

याद रखिए—स्वाद कुछ क्षणों का उत्सव है, लेकिन सेहत पूरी जिंदगी का उत्सव है।

स्वाद का छलावा और सेहत का सत्य: प्रकृति से दूर होता मनुष्य

आज का मनुष्य केवल स्वाद और सेहत के बीच ही नहीं, बल्कि “प्रकृति और कृत्रिमता” के बीच भी एक गहरे द्वंद्व में फँसा हुआ है। यह द्वंद्व जितना व्यक्तिगत है, उतना ही वैश्विक भी। एक ओर आधुनिक खानपान की चकाचौंध है—तेल, घी, मसालों से लबालब भरे व्यंजन—और दूसरी ओर यह विचार तेजी से उभर रहा है कि क्या वास्तव में यही भोजन हमें स्वस्थ बना रहा है या धीरे-धीरे बीमार?

तेल, घी और मसाले: आवश्यकता या अति?

भारतीय भोजन की पहचान लंबे समय तक संतुलन और विविधता रही है। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। तेल, घी और मसालों का उपयोग अब स्वाद बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह एक प्रकार की अति में बदल गया है।

यह कहना गलत होगा कि तेल या घी अपने आप में हानिकारक हैं। हमारे पारंपरिक भोजन में इनका स्थान हमेशा से रहा है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब इनका उपयोग “आवश्यकता” से बढ़कर “लालसा” बन जाता है। अत्यधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन पाचन तंत्र पर दबाव डालता है, शरीर में सूजन बढ़ाता है और दीर्घकाल में कई बीमारियों का कारण बनता है।

प्रकृति का भोजन: सीधा, सरल और सशक्त

इसके विपरीत, जो भोजन हमें सीधे प्रकृति से प्राप्त होता है—जैसे फल, कच्ची सब्ज़ियाँ, अंकुरित अनाज—वह शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। यह भोजन न केवल पचने में आसान होता है, बल्कि शरीर को आवश्यक पोषक तत्व भी सहज रूप से प्रदान करता है।

आज “नेचुरल डाइट” या “प्लांट-बेस्ड डाइट” की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। वैज्ञानिक शोध यह बताते हैं कि प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त भोजन—विशेषकर फल और सब्ज़ियाँ—शरीर को रोगों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह विचार भी तेजी से फैल रहा है कि मनुष्य को वही खाना चाहिए, जो पृथ्वी उसे सीधे प्रदान करती है, बिना अधिक प्रसंस्करण (processing) के। अर्थात, जितना कम हम भोजन के साथ छेड़छाड़ करेंगे, उतना ही वह हमारे लिए लाभकारी रहेगा।

मांसाहार पर प्रश्नचिह्न

इसी संदर्भ में मांसाहारी भोजन को लेकर भी वैश्विक स्तर पर बहस तेज़ हुई है। पर्यावरणीय, नैतिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से मांसाहार की आलोचना बढ़ रही है।

कई शोध यह संकेत देते हैं कि अत्यधिक मांसाहार हृदय रोग, मोटापा और अन्य बीमारियों से जुड़ा हुआ है। साथ ही, पशुपालन का पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग अब शाकाहार या प्लांट-बेस्ड आहार की ओर बढ़ रहे हैं।

भारतीय परंपरा, विशेषकर जैन और वैदिक दृष्टिकोण, पहले से ही इस बात पर जोर देता रहा है कि भोजन ऐसा होना चाहिए जो शरीर और प्रकृति—दोनों के लिए हितकारी हो।

हर समय खाना: एक नई बीमारी

आधुनिक जीवनशैली की एक और गंभीर समस्या है—लगातार खाना।

आज “भूख” और “खाने की इच्छा” के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया है।

हम सुबह उठते ही चाय-नाश्ता, फिर कुछ देर बाद स्नैक्स, दोपहर का भोजन, शाम की चाय, फिर रात का खाना—और उसके बाद भी कुछ न कुछ खाते रहते हैं।

यह निरंतर खाने की आदत शरीर को कभी भी पूर्ण विश्राम नहीं देती। पाचन तंत्र लगातार काम करता रहता है, जिससे शरीर की “रिपेयरिंग” प्रक्रिया बाधित होती है।

शाम का भोजन: आवश्यक या आदत?

अब एक महत्वपूर्ण विचार तेजी से सामने आ रहा है—क्या रात का भोजन वास्तव में आवश्यक है?

कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि हम सूर्यास्त के बाद भोजन न करें, या बहुत हल्का भोजन करें, तो यह शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी हो सकता है।

रात का समय शरीर के विश्राम और मरम्मत (repair) का समय होता है। यदि हम उस समय भारी भोजन कर लेते हैं, तो शरीर को पाचन में ही अपनी ऊर्जा लगानी पड़ती है, और वह अपनी अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं—जैसे कोशिकाओं की मरम्मत—को ठीक से नहीं कर पाता।

यह सिद्धांत हमारे पारंपरिक ज्ञान में पहले से मौजूद था। जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन न करने की परंपरा इसी वैज्ञानिक समझ पर आधारित है।

उपवास: शरीर का पुनर्निर्माण

जब हम कुछ समय के लिए भोजन से विराम लेते हैं—चाहे वह उपवास हो या सीमित आहार—तो शरीर को स्वयं को पुनर्संतुलित करने का अवसर मिलता है।

आज “इंटरमिटेंट फास्टिंग” के नाम से जो पद्धति लोकप्रिय हो रही है, वह मूलतः हमारे पारंपरिक उपवास की आधुनिक व्याख्या ही है।

उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है, पाचन तंत्र को आराम देता है और मानसिक स्पष्टता भी बढ़ाता है।

भारत में आवश्यकता: प्रकृति की ओर वापसी

भारत जैसे देश में, जहाँ प्रकृति ने हमें विविध और समृद्ध खाद्य संसाधन दिए हैं, वहाँ सबसे अधिक आवश्यकता है कि हम अपने खानपान में उन्हीं प्राकृतिक तत्वों का अधिकतम उपयोग करें।

हमारे यहाँ फल, सब्ज़ियाँ, अनाज, दालें—सब कुछ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। फिर भी हम बाजारू और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

यह एक विडंबना है कि जो चीज़ें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध हैं, हम उन्हें छोड़कर उन चीज़ों की ओर भाग रहे हैं जो न केवल महंगी हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हैं।

निष्कर्ष: संयम ही समाधान

अंततः समाधान किसी एक चरम में नहीं, बल्कि संतुलन और संयम में है।

तेल, घी और मसालों का उपयोग पूरी तरह बंद करना आवश्यक नहीं, लेकिन उनकी मात्रा पर नियंत्रण जरूरी है।

प्राकृतिक भोजन को प्राथमिकता देना चाहिए।

भोजन के समय और मात्रा को नियंत्रित करना चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण—भोजन को “आनंद” के बजाय “आवश्यकता” के रूप में देखना चाहिए।

आज यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि स्वाद का आनंद क्षणिक है, लेकिन सेहत का महत्व जीवनभर का है।

यदि हम स्वाद के पीछे अंधी दौड़ में लगे रहेंगे, तो न केवल अपनी सेहत खो देंगे, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी भी तैयार करेंगे जो बीमारियों से घिरी होगी।

इसलिए यह समय है कि हम अपने भीतर यह संकल्प लें—

हम अपने पेट को डस्टबिन नहीं बनने देंगे,

हम प्रकृति के करीब जाएंगे,

और हम ऐसा भोजन चुनेंगे जो हमें जीवित ही नहीं, बल्कि स्वस्थ भी रखे।

याद रखिए—प्रकृति हमें जीवन देती है, और वही भोजन हमें स्वस्थ जीवन दे सकता है।

**अजामिल