अल फिराके अल फिराके अल फिराके अल फ़िराक
इस तरह इस ज़िन्दगी का एक वरक़ उल्टा गया । - मीना कुमारी
सन् 1972 बैंक रोड इलाहाबाद । सर्दियों की एक दोपहर । कथाकार अनीता गोपेश , शशि शर्मा और मैं यानि अजामिल रोज़ की तरह एशिया के सबसे बड़े शायर रघुपति सहाय फ़िराक जी के सानिध्य का सुख उठा रहे थे । फ़िराक साहब तबियत से साहित्य के अनेक मुद्दों पर बतिया रहे थे । अनीता और शशि जी नोट्स ले रहे थे । मैं अपने 35 mm फार्मेट के जेनिथ कैमरे से फ़िराक साहब के चेहरे पर आ जा रही भाव भंगिमाओं को कैद रहा था । उस दिन 80 से ज़्यादा तस्वीरें उतारी थी मैंने फ़िराक साहब की । उन तस्वीरों में से काफी तस्वीरें धर्मयुग सारिका दिनमान जनसत्ता नव भारत टाइम्स और इंडिया टुडे आदि तमाम पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थी ।
वक़्त गुज़र गया । पर यादें आज भी ताज़ा है । फ़िराक साहब कहाकार्टे थे क़ि लोग नाज़ करेंगे क़ि उन्होंने फ़िराक को देखा है । मैं और मेरी दोनों सहेलियां हम भाग्य शाली हैं कि हमने फ़िराक साहब को देखा ही नहीं है बल्कि उनकी प्यार दुलार से भरी गालियां भी खायीं हैं ।
-अजामिल
छाया : अजामिल
Wednesday, September 16, 2026
हां मैंने फिराक को देखा है
काव्यपाठ क़ि कला /अजामिल
बादल सरकार और समानांतर नामा/अजामिल
Tuesday, September 15, 2026
स्वाद का छलावा या सेहत का खेल /अजामिल
स्वाद का छलावा और सेहत का सत्य:
बदलती खाद्य-संस्कृति का संकट
**अजामिल
आज का मनुष्य एक अजीब द्वंद्व में जी रहा है। उसके सामने थाली में सजे विकल्प जितने आकर्षक हैं, उतने ही खतरनाक भी। एक ओर स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का शोर है—जिम, योग, डाइट प्लान, ऑर्गेनिक फूड—और दूसरी ओर स्वाद के नाम पर फैलता हुआ एक ऐसा बाज़ार, जिसने मनुष्य की भूख को आदत और आदत को लत में बदल दिया है। परिणाम यह है कि मनुष्य यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या छोड़ देना चाहिए।
यह संकट केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का है। आधुनिक जीवनशैली, भागदौड़, बाज़ार की चकाचौंध और सुविधा की अंधी दौड़ ने हमारे भोजन को “पोषण” से हटाकर “मनोरंजन” का साधन बना दिया है। भोजन अब शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि जीभ का उत्सव बन गया है—और यही उत्सव धीरे-धीरे बीमारी का उत्स बनता जा रहा है।
स्वाद बनाम सेहत: एक गहराता द्वंद्व
स्वाद तात्कालिक सुख देता है। वह जीभ को संतुष्ट करता है, मन को क्षणिक आनंद देता है। लेकिन सेहत एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है—जो अनुशासन, संयम और समझ की मांग करती है। आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम अल्पकालिक सुख के लिए दीर्घकालिक स्वास्थ्य को दांव पर लगा रहे हैं।
वैज्ञानिक शोध लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि प्रोसेस्ड फूड, अत्यधिक चीनी, नमक और वसा से भरपूर भोजन—जैसे फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स—शरीर के लिए धीमे जहर की तरह काम करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों में तेजी से वृद्धि का एक बड़ा कारण यही असंतुलित खानपान है।
भारत में स्थिति और चिंताजनक है। पारंपरिक संतुलित भोजन—दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, छाछ—की जगह अब तली-भुनी और बाजारू चीज़ों ने ले ली है। खाने का समय अनियमित हो गया है। “जब मन किया, तब खा लिया”—यह नई जीवनशैली बन चुकी है।
पेट: पोषण का केंद्र या कचरे का डिब्बा?
एक कटु सत्य यह है कि आज अधिकांश लोगों का पेट एक “डस्टबिन” की तरह व्यवहार किया जा रहा है। जो भी सामने आया—चाहे भूख हो या न हो—उसे खा लिया गया। स्वाद के नाम पर हम शरीर की सीमाओं को अनदेखा कर रहे हैं।
हम यह भूल चुके हैं कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर के संचालन के लिए ऊर्जा और पोषण देने का माध्यम है। जब हम बिना आवश्यकता, बिना संतुलन और बिना समझ के खाते हैं, तो वही भोजन हमारे लिए विष बन जाता है।
आज एक सामान्य परिवार में यह देखने को मिलता है कि खाने-पीने पर जितना खर्च नहीं होता, उससे अधिक दवाइयों पर खर्च हो रहा है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट का भी संकेत है।
पूर्वजों की परंपरा: भोजन एक साधना
हमारे पूर्वजों ने भोजन को केवल भोग नहीं, बल्कि एक साधना माना था। वे जानते थे कि “जैसा अन्न, वैसा मन।” इसलिए भोजन में सात्विकता, सादगी और संतुलन को प्राथमिकता दी जाती थी।
खाना घर में बनता था, ताज़ा बनता था, और उसमें परिवार के हर सदस्य की सेहत का ध्यान रखा जाता था। भोजन का समय निश्चित होता था। अधिक खाने से बचा जाता था। उपवास और व्रत जैसी परंपराएँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शरीर को विश्राम देने की वैज्ञानिक पद्धतियाँ थीं।
जैन धर्म की शिक्षाएँ: संयम का विज्ञान
यदि हम भारतीय परंपराओं में देखें, तो जैन धर्म ने भोजन के विषय में अत्यंत गहन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। जैन दर्शन में “अहिंसा” के साथ-साथ “संयम” को सर्वोच्च स्थान दिया गया है—और यह संयम भोजन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
जैन अनुयायी कई महत्वपूर्ण नियमों का पालन करते हैं:
सूर्यास्त के बाद भोजन न करना—जिससे पाचन तंत्र को पर्याप्त विश्राम मिले।
सात्विक और सरल भोजन—जिसमें तामसिक और उत्तेजक पदार्थों से बचा जाता है।
मिताहार (कम खाना)—अर्थात आवश्यकता से अधिक न खाना।
उपवास और एकासन—शरीर को डिटॉक्स करने के प्राकृतिक तरीके।
आधुनिक विज्ञान भी अब इन सिद्धांतों की पुष्टि कर रहा है। “इंटरमिटेंट फास्टिंग” जैसी अवधारणाएँ, जो आज पश्चिम में लोकप्रिय हैं, हमारे पारंपरिक ज्ञान का ही आधुनिक रूप हैं।
आधुनिक विज्ञान और बढ़ती चिंताएँ
आज पूरी दुनिया में “लाइफस्टाइल डिज़ीज़” (जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ) सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी हैं।
मोटापा बच्चों तक में तेजी से बढ़ रहा है।
टाइप-2 डायबिटीज़ अब युवाओं में भी आम हो गई है।
हृदय रोग पहले की तुलना में अधिक कम उम्र में हो रहे हैं।
इन सबके पीछे एक बड़ा कारण है—अनियंत्रित और असंतुलित खानपान।
वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर को जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है, उससे अधिक ऊर्जा (कैलोरी) लेने पर वह वसा के रूप में जमा हो जाती है। साथ ही, प्रोसेस्ड फूड में मौजूद केमिकल्स और प्रिज़र्वेटिव्स शरीर के आंतरिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं।
स्वाद का बाजार और हमारी कमजोरियाँ
आज का बाजार हमारी कमजोरियों को भली-भांति समझता है। वह जानता है कि मनुष्य को त्वरित सुख चाहिए। इसलिए वह ऐसे खाद्य पदार्थ तैयार करता है जो स्वाद में अत्यंत आकर्षक हों, लेकिन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों।
विज्ञापन, पैकेजिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से हमें लगातार यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि “स्वाद ही जीवन है।” लेकिन सच्चाई यह है कि यह स्वाद एक भ्रम है—एक ऐसा जाल, जिसमें फंसकर हम अपनी सेहत खो रहे हैं।
समाधान: संतुलन की ओर वापसी
यह स्थिति निराशाजनक जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। यदि हम सचेत हो जाएँ, तो बहुत कुछ बदला जा सकता है।
भोजन को प्राथमिकता दें, स्वाद को नहीं
भोजन का चुनाव इस आधार पर करें कि वह शरीर के लिए कितना लाभकारी है।
नियमित समय पर खाएँ
शरीर को एक लय में रखें। अनियमितता पाचन को बिगाड़ती है।
मिताहार अपनाएँ
जितनी भूख हो, उससे थोड़ा कम खाएँ।
प्राकृतिक और ताज़ा भोजन लें
पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएँ।
उपवास और विराम को अपनाएँ
सप्ताह में एक दिन या समय-समय पर शरीर को विश्राम दें।
परंपराओं से सीखें
जैन धर्म और अन्य भारतीय परंपराओं के सिद्धांतों को आधुनिक जीवन में अपनाएँ।
निष्कर्ष: स्थायी सुख का मार्ग
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमें स्वाद चाहिए या नहीं—प्रश्न यह है कि हम किस कीमत पर उसे चाहते हैं। यदि स्वाद के पीछे भागते-भागते हम अपनी सेहत खो दें, तो वह स्वाद व्यर्थ है।
सेहत वह आधार है, जिस पर जीवन का हर सुख टिका होता है। स्वाद का आनंद क्षणिक है, लेकिन सेहत का सुख स्थायी है।
इसलिए यह समय है कि हम अपने भीतर झांकें और यह तय करें कि हम अपने पेट को पोषण का केंद्र बनाएँगे या कचरे का डिब्बा।
यदि हमने अभी भी नहीं संभला, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी। लेकिन यदि हम संयम और समझ का रास्ता चुनते हैं, तो हम न केवल अपनी सेहत बचा सकते हैं, बल्कि एक स्वस्थ समाज की नींव भी रख सकते हैं।
याद रखिए—स्वाद कुछ क्षणों का उत्सव है, लेकिन सेहत पूरी जिंदगी का उत्सव है।
स्वाद का छलावा और सेहत का सत्य: प्रकृति से दूर होता मनुष्य
आज का मनुष्य केवल स्वाद और सेहत के बीच ही नहीं, बल्कि “प्रकृति और कृत्रिमता” के बीच भी एक गहरे द्वंद्व में फँसा हुआ है। यह द्वंद्व जितना व्यक्तिगत है, उतना ही वैश्विक भी। एक ओर आधुनिक खानपान की चकाचौंध है—तेल, घी, मसालों से लबालब भरे व्यंजन—और दूसरी ओर यह विचार तेजी से उभर रहा है कि क्या वास्तव में यही भोजन हमें स्वस्थ बना रहा है या धीरे-धीरे बीमार?
तेल, घी और मसाले: आवश्यकता या अति?
भारतीय भोजन की पहचान लंबे समय तक संतुलन और विविधता रही है। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। तेल, घी और मसालों का उपयोग अब स्वाद बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह एक प्रकार की अति में बदल गया है।
यह कहना गलत होगा कि तेल या घी अपने आप में हानिकारक हैं। हमारे पारंपरिक भोजन में इनका स्थान हमेशा से रहा है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब इनका उपयोग “आवश्यकता” से बढ़कर “लालसा” बन जाता है। अत्यधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन पाचन तंत्र पर दबाव डालता है, शरीर में सूजन बढ़ाता है और दीर्घकाल में कई बीमारियों का कारण बनता है।
प्रकृति का भोजन: सीधा, सरल और सशक्त
इसके विपरीत, जो भोजन हमें सीधे प्रकृति से प्राप्त होता है—जैसे फल, कच्ची सब्ज़ियाँ, अंकुरित अनाज—वह शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। यह भोजन न केवल पचने में आसान होता है, बल्कि शरीर को आवश्यक पोषक तत्व भी सहज रूप से प्रदान करता है।
आज “नेचुरल डाइट” या “प्लांट-बेस्ड डाइट” की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। वैज्ञानिक शोध यह बताते हैं कि प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त भोजन—विशेषकर फल और सब्ज़ियाँ—शरीर को रोगों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यह विचार भी तेजी से फैल रहा है कि मनुष्य को वही खाना चाहिए, जो पृथ्वी उसे सीधे प्रदान करती है, बिना अधिक प्रसंस्करण (processing) के। अर्थात, जितना कम हम भोजन के साथ छेड़छाड़ करेंगे, उतना ही वह हमारे लिए लाभकारी रहेगा।
मांसाहार पर प्रश्नचिह्न
इसी संदर्भ में मांसाहारी भोजन को लेकर भी वैश्विक स्तर पर बहस तेज़ हुई है। पर्यावरणीय, नैतिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से मांसाहार की आलोचना बढ़ रही है।
कई शोध यह संकेत देते हैं कि अत्यधिक मांसाहार हृदय रोग, मोटापा और अन्य बीमारियों से जुड़ा हुआ है। साथ ही, पशुपालन का पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग अब शाकाहार या प्लांट-बेस्ड आहार की ओर बढ़ रहे हैं।
भारतीय परंपरा, विशेषकर जैन और वैदिक दृष्टिकोण, पहले से ही इस बात पर जोर देता रहा है कि भोजन ऐसा होना चाहिए जो शरीर और प्रकृति—दोनों के लिए हितकारी हो।
हर समय खाना: एक नई बीमारी
आधुनिक जीवनशैली की एक और गंभीर समस्या है—लगातार खाना।
आज “भूख” और “खाने की इच्छा” के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया है।
हम सुबह उठते ही चाय-नाश्ता, फिर कुछ देर बाद स्नैक्स, दोपहर का भोजन, शाम की चाय, फिर रात का खाना—और उसके बाद भी कुछ न कुछ खाते रहते हैं।
यह निरंतर खाने की आदत शरीर को कभी भी पूर्ण विश्राम नहीं देती। पाचन तंत्र लगातार काम करता रहता है, जिससे शरीर की “रिपेयरिंग” प्रक्रिया बाधित होती है।
शाम का भोजन: आवश्यक या आदत?
अब एक महत्वपूर्ण विचार तेजी से सामने आ रहा है—क्या रात का भोजन वास्तव में आवश्यक है?
कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि हम सूर्यास्त के बाद भोजन न करें, या बहुत हल्का भोजन करें, तो यह शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी हो सकता है।
रात का समय शरीर के विश्राम और मरम्मत (repair) का समय होता है। यदि हम उस समय भारी भोजन कर लेते हैं, तो शरीर को पाचन में ही अपनी ऊर्जा लगानी पड़ती है, और वह अपनी अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं—जैसे कोशिकाओं की मरम्मत—को ठीक से नहीं कर पाता।
यह सिद्धांत हमारे पारंपरिक ज्ञान में पहले से मौजूद था। जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन न करने की परंपरा इसी वैज्ञानिक समझ पर आधारित है।
उपवास: शरीर का पुनर्निर्माण
जब हम कुछ समय के लिए भोजन से विराम लेते हैं—चाहे वह उपवास हो या सीमित आहार—तो शरीर को स्वयं को पुनर्संतुलित करने का अवसर मिलता है।
आज “इंटरमिटेंट फास्टिंग” के नाम से जो पद्धति लोकप्रिय हो रही है, वह मूलतः हमारे पारंपरिक उपवास की आधुनिक व्याख्या ही है।
उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है, पाचन तंत्र को आराम देता है और मानसिक स्पष्टता भी बढ़ाता है।
भारत में आवश्यकता: प्रकृति की ओर वापसी
भारत जैसे देश में, जहाँ प्रकृति ने हमें विविध और समृद्ध खाद्य संसाधन दिए हैं, वहाँ सबसे अधिक आवश्यकता है कि हम अपने खानपान में उन्हीं प्राकृतिक तत्वों का अधिकतम उपयोग करें।
हमारे यहाँ फल, सब्ज़ियाँ, अनाज, दालें—सब कुछ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। फिर भी हम बाजारू और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
यह एक विडंबना है कि जो चीज़ें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध हैं, हम उन्हें छोड़कर उन चीज़ों की ओर भाग रहे हैं जो न केवल महंगी हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हैं।
निष्कर्ष: संयम ही समाधान
अंततः समाधान किसी एक चरम में नहीं, बल्कि संतुलन और संयम में है।
तेल, घी और मसालों का उपयोग पूरी तरह बंद करना आवश्यक नहीं, लेकिन उनकी मात्रा पर नियंत्रण जरूरी है।
प्राकृतिक भोजन को प्राथमिकता देना चाहिए।
भोजन के समय और मात्रा को नियंत्रित करना चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—भोजन को “आनंद” के बजाय “आवश्यकता” के रूप में देखना चाहिए।
आज यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि स्वाद का आनंद क्षणिक है, लेकिन सेहत का महत्व जीवनभर का है।
यदि हम स्वाद के पीछे अंधी दौड़ में लगे रहेंगे, तो न केवल अपनी सेहत खो देंगे, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी भी तैयार करेंगे जो बीमारियों से घिरी होगी।
इसलिए यह समय है कि हम अपने भीतर यह संकल्प लें—
हम अपने पेट को डस्टबिन नहीं बनने देंगे,
हम प्रकृति के करीब जाएंगे,
और हम ऐसा भोजन चुनेंगे जो हमें जीवित ही नहीं, बल्कि स्वस्थ भी रखे।
याद रखिए—प्रकृति हमें जीवन देती है, और वही भोजन हमें स्वस्थ जीवन दे सकता है।
**अजामिल
गोपेश समग्र :एक व्यक्तित्व कृतित्व क़ि जाँच पड़ताल / रविंनंदन सिंह / सम्पादन :अजामिल
रंगमंच / अभिनय क़ि कला /अजामिल
रंगमंच
जहाँ अभिनय ज़िंदगी है
अभिनय : जीवन की अनिवार्य कला
अजामिल
मनुष्य के जीवन में अभिनय कब प्रवेश करता है? क्या वह तब, जब कोई बच्चा पहली बार मंच पर खड़ा होकर किसी राजा, किसान, पक्षी या किसी कहानी के पात्र की भूमिका निभाता है? या तब, जब कोई कलाकार रोशनी से भरे मंच पर किसी दूसरे मनुष्य का जीवन जीने लगता है?
शायद दोनों ही सवालों का उत्तर नहीं है।
अभिनय हमारे जीवन में उससे बहुत पहले आ चुका होता है। सच तो यह है कि हम जन्म के साथ ही अभिव्यक्ति की एक ऐसी यात्रा शुरू कर देते हैं, जिसमें अभिनय किसी बाहरी कला की तरह नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक भाषा की तरह हमारे साथ चलता है।
बच्चा रोकर अपनी भूख बताता है, मुस्कराकर अपनेपन का संकेत देता है, किसी की नकल करके उसे समझने की कोशिश करता है। थोड़ा बड़ा होता है तो माँ-बाप की चाल, बोलने का ढंग, शिक्षक की आवाज़, किसी अभिनेता की शैली या किसी प्रिय व्यक्ति के हाव-भाव की नकल करने लगता है। वह खेल-खेल में डॉक्टर बनता है, शिक्षक बनता है, पुलिसवाला बनता है, दुकानदार बनता है। वह अभिनय कर रहा होता है, लेकिन उसे पता नहीं होता कि वह अभिनय कर रहा है।
यहीं से मनुष्य और अभिनय का संबंध शुरू होता है।
क्या जीवन स्वयं एक रंगमंच है?
हम प्रायः कहते हैं कि फलाँ व्यक्ति बहुत अच्छा अभिनेता है। लेकिन जीवन में ऐसे कितने ही अवसर आते हैं, जब हम सभी किसी न किसी भूमिका में होते हैं।
घर में हमारी भूमिका अलग होती है, मित्रों के बीच अलग, कार्यस्थल पर अलग और सार्वजनिक जीवन में अलग। किसी बुजुर्ग से मिलते समय हमारा व्यवहार कुछ और होता है, छोटे बच्चे के साथ कुछ और। दुख में हम अपने चेहरे को नियंत्रित करते हैं, खुशी में खुलकर मुस्कराते हैं और किसी गंभीर परिस्थिति में अपनी भावनाओं को रोकने की कोशिश करते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा जीवन झूठ है।
बल्कि इसका अर्थ यह है कि मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार अपनी अभिव्यक्ति को बदलने की क्षमता रखता है।
अभिनय का सबसे गहरा अर्थ शायद यही है—अपने भीतर के भाव को परिस्थिति और सामने वाले व्यक्ति तक पहुँचाने की क्षमता।
हम बोलते हैं तो केवल शब्द नहीं बोलते। हमारी आँखें बोलती हैं, चेहरा बोलता है, हाथ बोलते हैं, शरीर की मुद्रा बोलती है और कभी-कभी हमारी चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है।
किसी से कहना—“मैं ठीक हूँ”—और वास्तव में ठीक होना, दोनों अलग बातें हो सकती हैं। सामने वाला हमारे शब्दों से अधिक हमारे चेहरे और आवाज़ से यह समझ सकता है कि हम सचमुच ठीक हैं या नहीं।
यही अभिनय और जीवन के बीच का अद्भुत संबंध है।
अभिनय की पहली पाठशाला—नकल
बच्चा अपने आसपास की दुनिया को नकल के माध्यम से समझता है। वह माता-पिता को देखकर बोलना सीखता है, चलना सीखता है, व्यवहार सीखता है। परिवार उसका पहला रंगमंच है और परिवार के लोग उसके पहले अभिनेता।
वह पिता की तरह अखबार पढ़ने का अभिनय करता है। माँ की तरह किसी को डाँटता है। शिक्षक की तरह पढ़ाता है। डॉक्टर की तरह खिलौने की जाँच करता है।
यह केवल खेल नहीं है। यह सीखने की प्रक्रिया है।
विज्ञान ने भी imitation यानी अनुकरण को मनुष्य के सामाजिक व्यवहार और सीखने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना है। न्यूरोसाइंस में जिस मिरर न्यूरॉन सिस्टम पर लंबे समय से शोध हुआ है, वह यह समझने में मदद करता है कि किसी दूसरे व्यक्ति की क्रिया को देखकर हमारे मस्तिष्क में उससे संबंधित प्रक्रियाएँ सक्रिय हो सकती हैं। अनुकरण और सामाजिक समझ के बीच संबंध पर शोध लगातार जारी है।
इसलिए बच्चे की नकल को केवल नकल समझ लेना उसके महत्व को छोटा कर देना है। वह नकल के माध्यम से दुनिया में प्रवेश कर रहा होता है।
लेकिन यही बात एक चेतावनी भी देती है।
बच्चे वही नहीं सीखते जो हम उन्हें सिखाते हैं। वे बहुत कुछ वह भी सीखते हैं जो वे हमें करते हुए देखते हैं।
इसलिए बच्चों के सामने हमारा व्यवहार भी एक तरह का अभिनय है—और कई बार सबसे प्रभावशाली अभिनय।
अभिनय बनाम बनावटीपन
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है—अभिनय और बनावटीपन एक चीज़ नहीं हैं।
किसी व्यक्ति से जब कहा जाता है—“इतनी एक्टिंग मत करो”—तो अक्सर उसका अर्थ होता है कि उसका व्यवहार स्वाभाविक नहीं लग रहा। वह कुछ ऐसा करने की कोशिश कर रहा है, जो उसके भीतर से नहीं आ रहा।
रंगमंच पर भी यही अंतर अभिनेता और केवल अभिनय करने वाले व्यक्ति के बीच दिखाई देता है।
अच्छा अभिनेता भावनाओं की नकल नहीं करता; वह भावनाओं को समझता है। वह पात्र के भीतर प्रवेश करता है। वह यह जानने की कोशिश करता है कि यह आदमी ऐसा क्यों बोल रहा है, इस परिस्थिति में ऐसा क्यों कर रहा है, उसके भीतर कौन-सा डर, प्रेम, अहंकार, अपराधबोध या इच्छा काम कर रही है।
तभी अभिनय नैसर्गिक लगता है।
अभिनय की सफलता इस बात में नहीं है कि अभिनेता हमें यह भूलने पर मजबूर कर दे कि वह अभिनय कर रहा है। सफलता तब है, जब कुछ देर के लिए हमें यह महसूस होने लगे कि हम किसी पात्र को देख नहीं रहे, उसका जीवन देख रहे हैं।
यही रंगमंच का जादू है।
अभिनेता असल में जीवन का पर्यवेक्षक होता है
अच्छा अभिनेता केवल अभिनय नहीं करता। वह जीवन को देखता है।
बस में बैठे आदमी को देखता है। चाय की दुकान पर बातचीत करते लोगों को देखता है। अस्पताल के गलियारे में प्रतीक्षा करती आँखों को देखता है। बाजार में मोलभाव करती महिला को देखता है। बूढ़े आदमी की चाल देखता है। बच्चे की जिद देखता है। किसी प्रेम में पड़े व्यक्ति की आवाज़ में आया परिवर्तन देखता है।
वह इन छोटी-छोटी चीज़ों को अपने भीतर जमा करता रहता है।
इसलिए अभिनय की पहली शर्त शायद संवाद याद करना नहीं, जीवन को देखना है।
जो आदमी जीवन को गहराई से नहीं देखता, वह अभिनय में बाहरी मुद्राएँ तो पैदा कर सकता है, लेकिन मनुष्य पैदा नहीं कर सकता।
रंगमंच का अभिनेता जब किसी बूढ़े व्यक्ति की भूमिका निभाता है तो केवल झुककर चलना पर्याप्त नहीं है। उसे यह समझना होगा कि बूढ़े होने का अनुभव क्या है—शरीर की गति धीमी होने के साथ दुनिया का व्यवहार कैसे बदलता है, स्मृतियाँ कैसे वर्तमान में लौटती हैं, अकेलापन कैसा लगता है और अपने ही परिवार में अप्रासंगिक हो जाने का डर क्या होता है।
यहीं अभिनय कला से आगे बढ़कर मनुष्य को समझने की कला बन जाता है।
अभिनय और संवेदना
अभिनय की असली जान तकनीक नहीं, संवेदना है।
चेहरा बनाना सीखा जा सकता है। आवाज़ का उतार-चढ़ाव सीखा जा सकता है। चलने का ढंग सीखा जा सकता है। मंच पर खड़े होने की तकनीक सीखी जा सकती है। लेकिन किसी दूसरे मनुष्य के दुख को महसूस करने की क्षमता केवल तकनीकी प्रशिक्षण से नहीं आती।
अभिनेता को अपने भीतर संवेदनाओं का संसार जीवित रखना पड़ता है।
इसी कारण अभिनय का संबंध empathy यानी सहानुभूतिपूर्ण समझ से भी जोड़ा गया है। कुछ शोधों में अभिनय प्रशिक्षण और भावनाओं को पहचानने तथा व्यक्त करने की क्षमता के बीच सकारात्मक संबंधों के संकेत मिले हैं। 2026 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा ने 32 शोध-पत्रों की समीक्षा करते हुए पाया कि अभिनय-आधारित हस्तक्षेपों का उपयोग शिक्षा, कार्यस्थल और अन्य क्षेत्रों में भाव-पहचान तथा भाव-अभिव्यक्ति जैसी क्षमताओं के विकास के लिए किया गया है, हालांकि शोध की गुणवत्ता और परिणामों में पर्याप्त विविधता भी मौजूद है।
अर्थात अभिनय के प्रभाव को लेकर अतिशयोक्ति से बचना चाहिए, लेकिन यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि अभिनय हमें भावनाओं को पहचानने और व्यक्त करने की बेहतर समझ दे सकता है।
अभिनय केवल अभिनेता के लिए नहीं
यहीं से अभिनय की उपयोगिता रंगमंच से बाहर निकलती है।
एक डॉक्टर के लिए अभिनय का अर्थ मरीज को धोखा देना नहीं, बल्कि उसकी स्थिति के अनुरूप संवेदनशील संवाद करना हो सकता है। शिक्षक के लिए अभिनय का अर्थ बच्चे की मानसिक अवस्था को समझते हुए अपनी आवाज़ और व्यवहार को बदलना हो सकता है। किसी प्रबंधक के लिए कठिन परिस्थिति में आत्मविश्वास बनाए रखना भी एक तरह का प्रदर्शन है।
वकील, पत्रकार, राजनेता, अध्यापक, चिकित्सक, विक्रेता, अभिभावक—कौन है जिसे लोगों के सामने स्वयं को प्रभावी ढंग से व्यक्त नहीं करना पड़ता?
यहाँ अभिनय छल नहीं है। यह संचार की कला है।
अभिनय हमें सिखाता है कि सामने वाले व्यक्ति तक केवल शब्द नहीं पहुँचते। आवाज़, विराम, चेहरे की मुद्रा, आँखों का संपर्क, शरीर की स्थिति और परिस्थिति की समझ भी संचार का हिस्सा हैं।
इसीलिए अभिनय को व्यक्तित्व-विकास की एक महत्वपूर्ण कला माना जा सकता है।
शिक्षा में अभिनय क्यों जरूरी है?
आज हमारी शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को जानकारी देने पर बहुत जोर है। वे गणित सीखते हैं, विज्ञान सीखते हैं, भाषा सीखते हैं, कंप्यूटर सीखते हैं। लेकिन क्या वे अपने विचार व्यक्त करना भी सीखते हैं? क्या वे असहमति को सभ्य ढंग से व्यक्त करना सीखते हैं? क्या वे दूसरे व्यक्ति की स्थिति को समझना सीखते हैं? क्या वे असफल होने के बाद फिर से सामने खड़े होना सीखते हैं?
अभिनय इन प्रश्नों के बीच एक उपयोगी रास्ता खोल सकता है।
2026 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 27 अध्ययनों और 2,239 प्रतिभागियों के आधार पर शैक्षिक ड्रामा के रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, संचार और सहयोग जैसी क्षमताओं पर संभावित सकारात्मक प्रभाव पाए गए। शोधकर्ताओं ने साथ ही यह सावधानी भी दर्ज की कि अध्ययनों के बीच पर्याप्त भिन्नता थी और परिणामों की व्याख्या सावधानी से की जानी चाहिए।
इस सावधानी को ध्यान में रखते हुए भी यह विचार महत्वपूर्ण है कि स्कूल में अभिनय केवल वार्षिक उत्सव का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए।
बच्चों को अभिनय करने दिया जाए।
उन्हें छोटी-छोटी परिस्थितियाँ दी जाएँ—दो मित्रों का झगड़ा, किसी बुजुर्ग से बातचीत, दुकान पर ग्राहक और दुकानदार, शिक्षक और विद्यार्थी, किसी समस्या का समाधान।
फिर उनसे पूछा जाए—तुम्हें क्या महसूस हुआ?
यहीं अभिनय शिक्षा बन जाता है।
अभिनय आत्मविश्वास देता है, लेकिन उससे अधिक भी देता है
मंच पर पहली बार खड़ा होना किसी बच्चे के लिए आसान नहीं होता। सामने बैठे लोगों की निगाहें उसे असहज कर सकती हैं। आवाज़ काँप सकती है। संवाद भूल सकता है।
लेकिन धीरे-धीरे वही बच्चा सीखता है कि गलती होने के बाद भी आगे बोला जा सकता है।
यह सीख मंच से कहीं बड़ी है।
जीवन में भी हम संवाद भूलते हैं, निर्णय गलत करते हैं, संबंधों में असफल होते हैं, नौकरी में असफल होते हैं, कभी अपने ही शब्दों में उलझ जाते हैं। लेकिन मंच हमें सिखाता है कि दृश्य समाप्त नहीं हुआ है। अगला संवाद अभी बाकी है।
अभिनय का यह पाठ जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अभिनय और मानसिक स्वास्थ्य
आज अकेलापन, सामाजिक अलगाव, चिंता और भावनात्मक दबाव आधुनिक जीवन की गंभीर चुनौतियों में शामिल हैं। ऐसे समय में रचनात्मक गतिविधियों की भूमिका पर दुनिया भर में शोध हो रहा है।
लेकिन यहाँ भी हमें सावधान रहना चाहिए। अभिनय को हर मानसिक समस्या का इलाज कहना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
हाँ, इतना जरूर कहा जा सकता है कि अभिनय व्यक्ति को अपने भीतर की भावनाओं को पहचानने, व्यक्त करने, दूसरे के दृष्टिकोण को समझने और समूह के साथ काम करने का अवसर देता है। अभिनय-आधारित गतिविधियों पर हुए शोधों में भावनात्मक कौशल और सामाजिक क्षमताओं से जुड़े संभावित लाभ सामने आए हैं, हालांकि सभी अध्ययनों के परिणाम एक जैसे नहीं हैं।
शायद अभिनय की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक शक्ति यह है कि वह हमें कुछ देर के लिए अपने ही जीवन से बाहर निकलकर किसी दूसरे जीवन को देखने का अवसर देता है।
और किसी दूसरे के जीवन को समझते-समझते हम कई बार अपने जीवन को भी बेहतर समझने लगते हैं।
मंच पर दूसरा व्यक्ति बनकर हम स्वयं को खोजते हैं
यह अभिनय का सबसे सुंदर विरोधाभास है।
हम किसी और का पात्र निभाते हैं और धीरे-धीरे अपने बारे में जानने लगते हैं।
किसी कायर पात्र को निभाते हुए हमें अपने भीतर का डर दिखाई दे सकता है। किसी क्रूर पात्र को निभाते हुए अपने भीतर छिपी कठोरता का अहसास हो सकता है। किसी प्रेमी की भूमिका करते हुए अपने भीतर का प्रेम सामने आ सकता है। किसी वृद्ध की भूमिका करते हुए भविष्य का अपना चेहरा दिखाई दे सकता है।
इसलिए अभिनय आत्म-खोज भी है।
मंच पर खड़ा अभिनेता केवल दर्शकों के सामने नहीं खड़ा होता। वह अपने भीतर भी खड़ा होता है।
हर मनुष्य में एक अभिनेता
हममें से हर व्यक्ति में एक अभिनेता छिपा हुआ है।
कोई मंच पर आता है, कोई नहीं आता। कोई कैमरे के सामने सहज होता है, कोई लोगों के बीच बोलने से घबराता है। लेकिन अपने जीवन की परिस्थितियों में हम सभी भूमिकाएँ निभाते हैं।
बेटा, बेटी, पिता, माँ, पति, पत्नी, मित्र, शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी, पड़ोसी—ये सभी सामाजिक भूमिकाएँ हैं।
समस्या अभिनय करने में नहीं है।
समस्या तब पैदा होती है जब हम इतनी भूमिकाएँ निभाते-निभाते यह भूल जाते हैं कि इन भूमिकाओं के पीछे हमारा अपना चेहरा कौन-सा है।
रंगमंच इसीलिए हमें अपने भीतर लौटने का रास्ता भी देता है।
वह पूछता है—तुम कौन हो?
तुम्हारा पात्र कौन है और तुम स्वयं कौन हो?
तुम जो बोल रहे हो, वह तुम्हारी आवाज़ है या किसी और से सीखी हुई आवाज़?
तुम जिस तरह जी रहे हो, वह तुम्हारा चुनाव है या समाज की अपेक्षाओं का अभिनय?
ये प्रश्न अभिनय को केवल मनोरंजन की कला से बहुत आगे ले जाते हैं।
नकल से नैसर्गिकता तक
बच्चा नकल से शुरू करता है।
कलाकार अवलोकन तक पहुँचता है।
फिर अभ्यास आता है।
और अंततः एक ऐसी अवस्था आती है जहाँ अभिनय अभिनय जैसा दिखाई ही नहीं देता।
यही नैसर्गिकता है।
लेकिन नैसर्गिकता का अर्थ अभ्यास का अभाव नहीं है। उलटे, मंच की सहजता के पीछे असंख्य अभ्यास छिपे होते हैं।
अच्छा अभिनेता इतना अभ्यास करता है कि अभ्यास अंततः दिखाई देना बंद हो जाता है।
जैसे अच्छा लेखक भाषा को इतना साध लेता है कि पाठक को भाषा दिखाई नहीं देती, केवल विचार दिखाई देते हैं।
अच्छा अभिनेता भी तकनीक को इतना आत्मसात कर लेता है कि दर्शक को तकनीक नहीं, मनुष्य दिखाई देता है।
रंगमंच हमें मनुष्य के करीब लाता है
आज स्क्रीन हमारे जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुकी है। हम अभिनय देखते हैं, वीडियो देखते हैं, रील देखते हैं, चेहरे देखते हैं, लेकिन वास्तविक मनुष्य से संवाद का समय कम होता जा रहा है।
रंगमंच इस दूरी को तोड़ता है।
वहाँ अभिनेता और दर्शक एक ही समय, एक ही स्थान और एक ही हवा में मौजूद होते हैं।
अभिनेता की साँस दर्शक तक पहुँचती है। दर्शक की प्रतिक्रिया अभिनेता तक पहुँचती है। एक छोटी-सी चुप्पी भी दोनों के बीच साझा अनुभव बन जाती है।
शायद इसी कारण रंगमंच आज भी जीवित है।
सिनेमा को तकनीक ने बहुत आगे पहुँचा दिया है। डिजिटल माध्यम ने मनोरंजन की दुनिया बदल दी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अभिनय की छवियाँ और आवाज़ें तक बना सकती है। फिर भी जीवंत मनुष्य का जीवंत मनुष्य के सामने खड़ा होना अपनी जगह अद्वितीय है।
क्योंकि रंगमंच पर केवल पात्र नहीं होता—मनुष्य उपस्थित होता है।
इसलिए अभिनय को जीवन की शिक्षा बनाना होगा
स्कूलों में अभिनय की कार्यशालाएँ हों। कॉलेजों में रंगमंच को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम न समझा जाए। कार्यालयों में संवाद और प्रस्तुति के प्रशिक्षण में नाट्य-अभ्यास का उपयोग किया जाए। बुजुर्गों के लिए सामुदायिक रंगमंच हो। बच्चों को कहानी कहने और भूमिका निभाने के अवसर दिए जाएँ।
लेकिन सबसे जरूरी है कि अभिनय को केवल स्टार बनने की सीढ़ी न माना जाए।
हर बच्चा अभिनेता बनने के लिए अभिनय नहीं करेगा।
उसे शायद डॉक्टर बनना हो, इंजीनियर बनना हो, किसान बनना हो, शिक्षक बनना हो या कोई और काम करना हो।
लेकिन उसे अपनी बात कहनी होगी।
दूसरे की बात सुननी होगी।
अपनी भावनाओं को समझना होगा।
किसी दूसरे के दुख को महसूस करना होगा।
असहमति के बावजूद संवाद करना होगा।
और सबसे बढ़कर—उसे स्वयं को समझना होगा।
इन सबके लिए अभिनय उपयोगी है।
अंत में...
अभिनय केवल मंच पर खड़े होकर किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन जीना नहीं है।
अभिनय जीवन को देखने की दृष्टि है।
यह शरीर की भाषा है, चेहरे की भाषा है, आवाज़ की भाषा है, संवेदनाओं की भाषा है।
यह नकल से शुरू हो सकता है, लेकिन उसका श्रेष्ठ रूप आत्म-अभिव्यक्ति है।
यह हमें दूसरों की तरह बनने से आगे ले जाकर यह पूछना सिखाता है कि हम वास्तव में कौन हैं।
शायद इसी अर्थ में जीवन भी एक रंगमंच है।
हम सब अपने-अपने दृश्य में प्रवेश करते हैं। कुछ संवाद बोलते हैं। कुछ संवाद भूल जाते हैं। कुछ पात्र हमें मिलते हैं और कुछ हमसे बिछड़ जाते हैं। कभी तालियाँ मिलती हैं, कभी आलोचना। कभी रोशनी हमारे ऊपर होती है, कभी हम अँधेरे में खड़े होते हैं।
लेकिन पर्दा गिरने तक अभिनय जारी रहता है।
और शायद जीवन की सबसे बड़ी कला यही है कि हम अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाएँ—इतनी ईमानदारी से कि अभिनय करते हुए भी अपने भीतर के मनुष्य को न खोएँ।
जीना ही अभिनय करना है—लेकिन अभिनय की अंतिम मंज़िल अभिनय नहीं, अपने वास्तविक मनुष्य तक पहुँचना है।
— अजामिल
Monday, September 14, 2026
हिंदी दिवस पर विशेष /अजामिल
वैश्विक प्रसार के बावजूद कई चुनौतियां
**अजामिल
यह सही है कि विश्व स्तर पर हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। कई देशों में हिंदी बोलने-जानने वालों की संख्या बढ़ी है। भारतीय सिनेमा, डिजिटल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भी हिंदी को नई पहचान दी है। फिर भी, यह कहना गलत होगा कि हिंदी अपनी सभी बाधाएं पार कर चुकी है। वैश्विक प्रसार के बावजूद इसकी राह में कई चुनौतियां मौजूद हैं।
सबसे बड़ी चुनौती तो उच्च शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनने की है। भारत के अधिकांश प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कानून और वैज्ञानिक शोध की प्रमुख भाषा अब भी अंग्रेजी है। नई शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय भाषाओं में पठन-पाठन पर जोर जरूर दिया है, लेकिन हिंदी में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य-पुस्तकों, शोध-सामग्री व तकनीकी शब्दावली का अभाव आज भी महसूस किया जाता है। परिणामस्वरूप, अनेक विद्यार्थी रोजगार और शोध के लिए अंग्रेजी को अधिक उपयोगी मानते हैं।
दूसरी चुनौती डिजिटल गुणवत्ता की है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की मात्रा तो बढ़ी है, लेकिन उसकी गुणवत्ता समान रूप से विकसित नहीं हुई। अनेक सरकारी वेबसाइटें और तकनीकी सेवाएं हिंदी में अधूरी या कठिन भाषा का प्रयोग करती हैं। मशीनी अनुवाद तो कई बार अर्थ का अनर्थ कर देता है, जिससे प्रशासनिक और कानूनी दस्तावेजों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में उच्च गुणवत्ता वाले हिंदी डेटा और मानकीकृत भाषा संसाधनों की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
तीसरी चुनौती अंतरराष्ट्रीय संस्थागत मान्यता की है। तमाम प्रयासों के बावजूद हिंदी अभी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा नहीं बन सकी है, जिसका अर्थ है कि हिंदी की लोकप्रियता और उसकी संस्थागत स्वीकार्यता में अभी भी खाई बनी हुई है।
एक महत्वपूर्ण सामाजिक चुनौती भाषायी संतुलन की है। गौरतलब है कि भारत एक बहुभाषी देश है, जहां तमिल, बांग्ला, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और अन्य भाषाओं की समृद्ध परंपरा है। कभी-कभी हिंदी के विस्तार को क्षेत्रीय भाषाओं के लिए चुनौती के रूप में देखा जाता है। वैसे, देखा जाए, तो बाजार और रोजगार का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उच्च पदों पर अंग्रेजी का प्रभुत्व बना हुआ है। हिंदी में उत्कृष्ट लेखन, अनुवाद, शोध और तकनीकी विशेषज्ञता रखने वालों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, परंतु उनकी संख्या और संस्थागत समर्थन अभी सीमित है। यदि हिंदी को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था से जोड़ना है, तो उद्योग और शिक्षा के बीच बेहतर समन्वय बनाना होगा।
सुजीत कुमार, टिप्पणीकार
दुनिया के लिए हिंदी अब अनजान नहीं
एक समय हिंदी को केवल भारत के उत्तरी हिस्से की भाषा माना जाता था, लेकिन आज यह देश-विदेश में संवाद, संस्कृति, शिक्षा और डिजिटल माध्यम की प्रमुख भाषाओं में शामिल हो गई है। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के प्रयोग, विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन या इंटरनेट पर हिंदी की सामग्रियों में तेज वृद्धि इस बात की पुष्टि करती है कि इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह अब केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रभावी माध्यम बन चुकी है। हिंदी दिवस (14 सितंबर) की सार्थकता इसी वजह से लगातार बढ़ रही है।
भारत में हिंदी सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, लगभग 44 प्रतिशत भारतीयों की मातृभाषा हिंदी है, जबकि करोड़ों लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया गया है। आज प्रशासन, न्याय, मीडिया, विज्ञापन और मनोरंजन उद्योग में हिंदी की स्वीकार्यता पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो गई है। हिंदी का दायरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में रह रही भारतीय आबादी हिंदी को जीवंत बनाए हुई है। मॉरीशस और फिजी में यह भाषा वहां की शिक्षा का औपचारिक हिस्सा बन चुकी है, जबकि हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड और टोक्यो विश्वविद्यालय जैसे कई विदेशी शिक्षण संस्थान हिंदी भाषा और भारतीय साहित्य के पाठ्यक्रम संचालित करने लगे हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन का नियमित आयोजन भी हिंदी के वैश्विक प्रचार का महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
हिंदी की लोकप्रियता बढ़ाने में भारतीय सिनेमा और डिजिटल मंचों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। बॉलीवुड की फिल्में और हिंदी गीत दुनिया के अनेक देशों में लोकप्रिय हैं। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और यू-ट्यूब के जरिये हिंदी सामग्री करोड़ों दर्शकों तक पहुंच रही है। इन सबसे हिंदी के शब्द वैश्विक दर्शकों तक पहुंच रहे हैं। हालांकि, हिंदी को ऊर्जा डिजिटल क्रांति से भी मिली है। आज ग्रामीण भारत का बड़ा वर्ग इंटरनेट पर हिंदी में जानकारी प्राप्त करता है।
साफ है, हिंदी का संसार बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी कहा था, राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। आज यह विचार व्यापक अर्थ ले चुका है। आज हिंदी केवल राष्ट्र की आवाज नहीं, बल्कि विश्व मंच पर भारत की पहचान और संवाद का सशक्त माध्यम बन गई है.
**अजामिल
Thursday, April 9, 2026
अविस्मरणीय मेरा सौभाग्य था नागार्जुन जी से मिलना
Wednesday, March 4, 2026
बाबू जी की चिट्ठियाँ !
जिंदगी सँवारता है - धीरे-धीरे
मुजस्समे तराशता है संतरास
संगीत रचता है -
हवाओं के चलने से
आस्थाएं और विश्वास से पैदा होते हैं
वेद-पुराण
बाइबिल-कुरान
बीज बनता है वृक्ष जैसे
वैसे ही किसी अज्ञात पीड़ा से गुजरकर
चिट्ठियाँ लिखा करते थे बाबू जी -
एक कलाकार की तरह
शबनमीं हरूफों के
गोशे-गोशे में
बसी होती थी उनकी रूह
कहाँ जाना है
कहाँ मुड़ना है
कहाँ रुकना है - बताते थे ऐसे
जैसे कोई भटके हुए को
बताए रास्ता
‘प्रिय’ से शुरु होकर
‘तुम्हारे बाबू जी’ तक
आशीष बरसता था - मूसलाधार
उनकी चिट्ठियों में
भीग जाता था
रोम-रोम
उनके प्यार-दुलार से
चिट्ठियों में साँस लेते थे
बाबू जी
सिर चढ़कर बोलता है आज भी
उनकी लिखावट का जादू
कोई-कोई ही बुन पाता है जिंदगी को
इतने सलीके से
यकीनन दिल और दिमाग पर
छा-जाने वाली
कालजयी रचनाओं की तरह हैं -
बाबू जी की चिट्ठियाँ
सोचता हूँ - इन्हे सहेजकर भी तो
सहेजे जा सकते हैं -
बाबू जी ।
राम थे, राम हैं और राम रहेंगे !
भगवान श्री राम को जीवन का अन्तिम सत्य मानने वाले भारतीय समाज में आज भी उस सत्य की तलाश जारी है, जो किन्ही भी परिस्थितियों में असत्य पर विजय पा सके। इतिहास और मिथ के द्वन्द्व में उलझे भारतीय समाज का यह एक ऐसा सच है जो सरल, सहज और सुगम राम के बारे में अभी तक एक मत नहीं हो पाया है। राम की उपस्थिति में भी यह समाज मानता है कि सत्य देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलता है और यह भी आवश्यक नहीं कि हर सत्य हर परिस्थिति में प्रत्येक के लिए सत्य ही हो, यह एक दुविधा की स्थिति है। किसी के लिए किसी विशेष परिस्थिति में असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है, असत्य के मार्ग पर जाने पर ही यदि किसी का जीवन सुरक्षित होता है, तो असत्य को सत्य में बदलने से कौन रोक सकता है ? लेकिन धर्म कहता है कि राम ही सत्य है, और इस सत्य के समक्ष कोई असत्य कभी नहीं ठहर सकता। शायद यही वजह है कि भारतीय जन-मानस राम के जटिल चरित्र को एक कालजयी महाकाव्य के रुप में देखता है, और यह अनुभव करता है कि राम भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों की स्थापना के आधार हैं। राम सामाजिक और नैतिक उत्थान की शक्ति हैं, एक ऐसी शक्ति जो अपने नाम के अनुसार ही सरल, सहज और सुगम तरीके से समस्त विश्व को सत्य का संबल दिये हुए है। राम के समक्ष सत्य ही खड़ा रह सकता है, असत्य में इतना साहस नहीं कि वह राम का सामना कर सके। शायद यही वजह है कि राम कण-कण में व्याप्त हैं और लोक-गाथाओं की जड़ों में समाये हुए हैं।हिन्दू समाज मानता है कि राम कल थे, राम आज हैं और राम कल भी रहेंगे, क्योंकि परिस्थितियाँ बदलती हैं सत्य नहीं बदला करता, शायद यही कारण है कि राम के नाम में ही सत्य समाहित है। राम सत्य पर आधारित एक अति मानवीय समय की सबसे बड़ी व्यवस्था के सूत्रधार हैं। राम इसीलिए हमारे नायक हैं क्योंकि उन्होंने नैतिक मानदण्डों को पुनर्स्थापित करने का काम किया था। उन्होंने मर्यादाओं की सीमा में सत्य की स्थापना की थी। राम का सत्य काल्पनिक नहीं है, और न वह किसी राजनैतिक कौशल का ही परिणाम है, बल्कि राम स्वयं सत्य हैं। राम हैं तो सत्य है, राम नहीं हैं तो सत्य भी नहीं है। राम सत्य का स्त्रोत हैं, सत्य की प्रेरणा हैं और सत्य की धारा हैं। राम का सत्य दृढ़ संकल्प का प्रतीक है, युग की सूत्रात्मा के रुप में राम अलौकिक हैं। राम की शपथ के बाद असत्य को कोई जगह नहीं मिलती, और इसीलिए राम प्राणी मात्र की आखिरी सांस में परब्रह्म-स्वरुप की तरह उपस्थित दिखाई देते हैं। राम एक ऐसा सत्य हैं, जो मानव मात्र के बहुत के बहुत करीब है, इसीलिए अनुकरणीय है। सत्य के पक्ष में जो लोग खड़े हैं, उनके लिए राम लौकिक भी हैं और अलौकिक भी हैं। राम के दिव्य मानवीय गुण उन्हें मर्यादा-पुरुषोत्तम बनाते हैं। सत्य के प्रतिनिधि के रुप में राम विकास की प्रत्येक दिशा में क्रियाशील हैं। राम का सत्य लोक-हित का सत्य है, यह सत्य अमानवीय सत्ता के समाप्त कर मानवीय सत्ता को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयत्नशील रहता है, इसीलिए राम का सत्य सर्वव्यापक सत्य हो जाता है, राम इसीलिए जन-जन का सत्य हो जाते हैं।
ऐसी मान्यता है कि जब-जब संसार में धर्म की क्षति होने लगती है, राक्षसी प्रवृत्तियों का आधिपत्य बढ़ जाता है, लोकाचरण में चारों तरफ अधर्म ही अधर्म दिखाई देता है, तब राम ऐसे असत्य को सत्य में बदलने के लिए साकार प्रकट होते हैं। असत्य को सत्य में बदलने की प्रक्रिया ही राम का होना है, सत्य के साथ होना राम के साथ होना है, राम के साथ होना धर्म के साथ होना है, क्योंकि राम का सत्य परम् कल्याण का सत्य है, राम सद्गुणों का समूह हैं, और यह पर्वत हजारों-हजार हिमालयों से भी ऊँचा है। राम का सत्य सर्वसिद्धिदायक महामंत्र है, राम का सत्य विषम परिस्थितियों में भयभीत नहीं करता, बल्कि धैर्य और कर्तव्य के प्रति हमारी आस्था और विश्वास को दृढ़ करता है। राम के सत्य के साथ रहकर हम असत्य पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, यह एक ऐसी विजय होती है, जो हमें अहंकार में नहीं ले जाती, बल्कि हमें विनम्र बनाती है, राम स्वयं विनम्रता की मूरत हैं, तभी तो महामुनि वशिष्ठ जी को राम से कहना पड़ा था कि ‘‘राम विनम्रता को भी आपसे विनम्रता सीखनी चाहिए।’’ ऐसा इसीलिए हो सका क्योंकि राम सदा कालजयी सत्य के साथ रहे, उन्होंने सामाजिक मूल्यों को नहीं टूटने दिया समाज को संचालित करने वाली मर्यादाओं की रक्षा के लिए राम ने वह भी किया जो देश-काल-परिस्थितियों में धर्म के अनुकूल नहीं थीं, लेकिन राम सत्य के साथ रहे, राम सत्य रहे, राम स्वयं कालजयी रचना बन गये और अपने भक्तों की आत्मा के भीतर ऐसे रच-बस गये कि उन्हें राम की धर्मभूमि ही मान लिया गया। राम की धार्मिक आस्थायें ऐसे प्रकाशित हुईं कि वह अजर-अमर हो गये, राम का सत्य सार्वभौमिक सत्य बन गया। आज राम के कारण ही अखिल विश्व में सत्य के पारस-स्पर्श का भाव देखने को मिलता है, धर्म और सत्य के दर्शन होते हैं, भक्त धर्म से दूर जाकर कभी संतुष्ट नहीं हो पाते क्योंकि राम उनके साथ नहीं होते।
प्राणी मात्र के कल्याण के लिए इस पृथ्वी पर अवतरित होने वाले भगवान श्री राम के दर्शन जीवन की कई भाव-भूमियों पर होते हैं। गृहधर्म, कुलधर्म, लोकधर्म, विश्वधर्म और पूर्णधर्म की उच्चता के लक्ष्य और उसकी व्यापकता राम के आदर्शों और उनकी मर्यादाओं में कल्याणकारी रुप में देखे जा सकते हैं। राम जिस सत्य को लेकर चलते रहे उसने उन्हे धर्मश्रेष्ठ बना दिया। गृहधर्म और कुलधर्म का जिस गरिमा के साथ निर्वाह राम ने किया वह उदाहरण अद्वितीय है। इतना ही नहीं धर्म, लोकधर्म और विश्वधर्म के प्रति राम का आचार-व्यवहार उन्हें धर्म की पूर्णता देता है, और आश्चर्य इस बात का है कि राम के भीतर भी यह क्रमिक विकास उनकी अनुभूति के अनुसार ही दिखाई देता है। राम जिस सत्य के पक्षधर हैं वह मनुष्य के हित की साधना तो है ही, सत्य एवं आनंद की अनुभूति भी है। राम ने सत्य को धर्म बना दिया, राम ने सत्य को सभी तरह की दुविधाओं और द्वन्द्व से मुक्त कर दिया, राम के सत्य के समक्ष सभी प्राणी आनंद-उत्सव मनाते हैं, राम का सत्य व्यक्ति को अपराध-बोध से मुक्त करता है।
राम की लीला क्षेत्र को यदि देखें तो हमें पता चलता है कि हम विविध रुपों में सत्य को ही प्रकाशित होते देख रहे हैं, एक ऐसी दिव्य ज्योति के रुप में जो व्यापक दृष्टि से धर्म-ज्योति में बदलती है। यही बात राम के साधारण कार्यों को भी असाधारण बना देती है और राम के सत्य को ब्रह्मनाद में बदल देती है। चौदह वर्ष वनवास में व्यतीत करते हुए बहुत बार परिस्थितियाँ ऐसी आयीं होंगी जब सत्य राम के हाथ से फिसलने वाला हो गया होगा परन्तु राम विषम परिस्थितियों में भी सत्य के साथ रहे, उन्होंने धर्म का पालन किया, उन्हीं सिद्धियों की साधना की जिससे धर्म का अभ्युदय होता है, इसका परिणाम यह हुआ कि राम धर्म के सत्य को लोकजीवन तक ले जा सके और उन्होंने जंगलों में रहकर गुजर-बसर करने वाले वानरों के आचार-व्यवहार को ही बदल दिया। राम के सत्य की यही व्यापकता उन प्राणियों का भी धर्म बन गई जो असत्य का साथ देना ही धर्म मानते रहे। इसलिए कहा जा सकता है कि राम का सत्य इसीलिए अन्तिम सत्य हो सका क्योंकि वह जन-कल्याणकारी, सर्वव्यापक, मानवीय दृष्टिकोण से ओतप्रोत और बहुआयामी है। राम के सत्य की धर्मध्वजा अगर आज विषम परिस्थितियों की तेज आँधियों में भी फहरा रही है तो उसका केवल यही कारण है कि वह जन कल्याणकारी है। जो सत्य जन कल्याणकारी नहीं होता वह राम का सत्य हो ही नहीं सकता, राम के सत्य का उद्देश्य ही है, उच्चतम मानवीय मूल्यों की स्थापना।
राम जानते थे कि धर्म को बचाने के लिए सत्य की पक्षधर एक सुदृढ़ व्यवस्था चाहिए और राम यह भी जानते थे कि सत्य का पक्ष लिए बिना धर्म बचाया भी नहीं जा सकता, कोई व्यवस्था धर्म से विमुख होकर नहीं चलाई जा सकती और सत्य के साथ खड़े राम तो स्वयं धर्म के पर्याय हो गये थे, माता-पिता और गुरु के प्रति आदर भाव, भाइयों के प्रति स्नेह, प्रजा के प्रति वात्सल्य राम के भीतर यदि जन्मा तो उसका केवल एक ही आधार था कि राम सत्य के साथ खड़े थे। राम भले-बुरे के ज्ञाता थे, बावजूद इसके उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए कोई भी निर्णय भावुकता में भरकर पक्षपात पूर्ण नहीं लिया। राम सत्य की शक्ति को पहचानते थे, इसीलिए सीता के चरित्र पर जब प्रजा ने उँगली उठायी तब राम सीता की अग्नि-परीक्षा तक के लिए सहर्ष तैयार हो गये, उन्हें विश्वास था कि सत्य अटल है, उसे बदला नहीं जा सकता और झूठ के पैर नहीं होते, उसकी तो अकाल मृत्यु सुनिश्चित ही है। भरत की नीयत पर जब सब संदेह कर रहे थे, तब राम सभी द्वन्द्व से बाहर निकलकर पूर्ण विश्वास के साथ भरत के साथ खड़े हुए थे, राम जानते थे कि भरत सत्य के साथ हैं। यह बात यह साबित करती है कि जो सत्य के साथ है वह राम के साथ है, भरत राम के साथ हैं और राम भरत की दृढ़ता की भाव-भूमि पर खड़े होकर सत्य के साथ हैं। यह अद्भुद समीकरण है जो सत्य को प्रत्येक परिस्थिति में मंगलमय और कल्याणकारी बनाता है। राम की जय-जयकार सत्य की जय-जयकार है, राम का धर्म सत्य का धर्म है, जो आज लोकधर्म की शक्ति बना हुआ है। जहाँ राम हैं वहाँ अंधकार को हटना ही होता है।
कहते हैं कि त्रेता युग में जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार बढ़ गया, सत्य अपमानित होने लगा और असत्य को महिमामण्डित किया जाने लगा तब राम अवतरित हुए। राम आते ही तब हैं, जब अधर्म बढ़ जाता है, जहाँ राम होते हैं सत्य की विजय सुनिश्चित होती है। राम ने अधर्म पर विजय प्राप्त कर शुभ धर्म की पताका फहरायी थी, असत्य पर सत्य की विजय का स्मृति पर्व है ‘विजय दशमी’। यह सत्य की पुर्नस्थापना का पर्व है, यह रावण पर राम की विजय का पर्व है, इसीलिए आज कलियुग की विषमताओं में जी रहे मनुष्य के लिए इससे बड़ा आनंद उत्सव और कोई दूसरा नहीं है। यह आनंद उत्सव हमें स्मरण कराता है कि विजय अन्ततः सत्य की ही होगी और असत्य बहुत दूर तक साथ चलने वाला नहीं है। तो यह सोचना होगा कि इस आनंद उत्सव की सार्थकता किन बातों पर निहित है। यह उत्सव अगर हमें सिखाता है कि हमें बुराइयों से दूर रहते हुए सत्य के साथ रहना चाहिए, हमें राम के साथ रहना चाहिए तो यह भी देखना होगा कि आज के समाज में मनुष्य के पास इसकी संभावना कितनी शेष है। रावण के पुतले का बार-बार दहन करके हम राम साथ नहीं खड़े हो सकते, यह संतोष की बात भी नहीं है। राम के साथ होने का अर्थ है रावण पर सम्पूर्ण विजय। आज समाज में रावण अत्याचार, अनाचार, शोषण, दम्भ, द्वेष, कपट, छल, बैर, लूट, हत्या अपहरण, बेरोजगारी के रुप में अपने दशों शीश के साथ न सिर्फ खड़ा हुआ है बल्कि सत्य का पक्ष लेने वाले लोगों की असहायता पर ठठाकर हँस रहा है। तो क्या सत्य का पक्ष कमजोर पड़ गया है ? राम कहाँ गये ? बार-बार विजय दशमी का पर्व किसकी हार के उपलक्ष्य में मनाया जाता है ? ये सारे सवाल एक संवेदनशील व्यक्ति के मन में उठते हैं, यह सवाल भी उठता है कि जब राम कण-कण में व्याप्त हैं, सत्य की स्थापना हो चुकी है तो असत्य को सिर उठाने का अवसर कौन दे रहा है ? यह सवाल अपनी जगह पर उठाये जा रहे हैं और अच्छाई द्वारा बुराई पर विजय प्राप्त करने की स्मृति भी रावण दहन के बाद हर्षउल्लास से मनाई जा रही है, निश्चय ही यह परम्परा बनाये रखना चाहिए। समाज यदि बुराई के विरुद्ध खड़ा नहीं होगा तो राम कलंकित होंगें। राम अर्थात सत्य कलंकित होगा। विजय दशमी की सार्थकता इसी बात में है कि समाज बुराईयों से मुक्त हो, इसलिए रावण की नाभि में बसे पोषणरुपी भ्रष्टाचार का जब तक समूल नाश नहीं होगा, तब तक राम की विजय के बाद भी वह बातें बची रह जायेंगी जो सत्य को कलंकित करती हैं। दशानन के सिर कुचल देने से कोई बात बनने वाली नहीं है, रावण की नाभि तक जाना होगा जहाँ भ्रष्टाचार का पोषण करने वाला अमृत मौजूद है। विजाय दशमी का पर्व हमें यह सिखाता है कि जब तक मनुष्य अपने भीतर निवास कर रहे रावण को पहचान नहीं लेता तब तक लज्जा, श्रद्धा, साधना, वंदना और शान्ति रुपी सीता का हरण होता रहेगा।
विजय दशमी का पर्व असत्य पर सत्य की विजय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एक प्रेरणा है जो हमें विकार रहित होने का संदेश देती है। विजय दशमी का पर्व हमें बताता है कि रावण के पुतले का दहन कर देने के बाद रावण का नाश नहीं हो जाता उस रावण का भी दहन करना होगा जो कहीं हमारे भीतर छुपा हुआ है और हमें सद्मार्ग से भटका रहा है। रावण अगर भयभीत होता है तो सिर्फ राम से अर्थात असत्य अगर डरता है तो केवल से, असत्य सत्य का सामना नहीं कर पाता, इसीलिए राम को अंगीकार करना है उसके प्रतिरोध के लिए सत्य पर आधारित रणनीति भी बनानी है, मर्यादायें भी देखनी हैं, जीवन मूल्यों को भी बचाना है और पराजित भी नहीं होना है। रावण दहन किया जाना चाहिए क्योंकि यह बुराईयों को छोड़ने का समाज द्वारा किया गया संकल्प है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर राम मय होकर कोई भक्त एक बुराई का भी त्याग कर देता है तो विजय दशमी का पर्व सार्थक हो उठेगा। यह नहीं सोचना चाहिए कि कोई राम नहीं हो सकता वे सारे लोग राम हो सकते हैं जो सत्य के साथ खड़े हुए हैं और यह विश्वास रखते हैं कि सत्य कभी पराजित नहीं होता। महामानव महात्मा गाँधी जीवन के अन्तिम छण तक सत्य के साथ रहे उन्होंने राम का हाथ नहीं छोेड़ा तो राम भी उन्हें छोड़कर कहीं नहीं गये। कोई सत्य को नहीं छोड़ता तो सत्य भी उसे नहीं छोड़ता। विजय दशमी का पर्व भगवान राम के मर्यादित जीवन की सुगंध है जो प्राण वायु की तरह प्रतिपल प्रत्येक प्राणी को जीवित रखे हुए है। यह पर्व समाज व्यवस्था के लिए एक स्मरणीय अनुष्ठान है यह अनुष्ठान मनुष्य को साहस,क्षमा,दया और परोपकार की भावना से भर देता है। यह भी देखना होगा कि असत्य यदि समाज में उपस्थित है, तो उसके कारण क्या हैं ? सत्य इसका विरोध क्यों नहीं कर पा रहा है ? इसे भी जांच लेने में कोई हर्ज नहीं है और यूँ तो विजय दशमी की सार्थकता इसी में है कि मनुष्य सबसे पहले अपने को बदलने का संकल्प ले। एक-एक व्यक्ति बदलेगा तो पूरे समाज को बदलने से कौन रोक सकता है ? जब सब सत्य बोलेंगे तो असत्य को तो भागना ही पड़ेगा।
असत्य पर सत्य की विजय का पर्व विजय दशमी भगवान श्री राम के संदर्भ में यह प्रमाणित करता है कि श्री राम दूसरों के दुख में दुखी होना जानते थे, इसीलिए वह जन-जन के आराध्य बने। राम की सम्पूर्ण छवि लार्जर देन लाईफ थी, वह मानवीय गुणों से पूरित थे। प्रख्यात शायर ‘अल्लामा इकबाल’ ने राम को ‘इमाम-ए-हिन्द’ कहा था। उनका कहना था कि राम का चरित्र वाकई अनूठा है, सत्य के लिए लड़ने वाला इतना बड़ा योद्धा पहले कभी नहीं हुआ। निदा फाजली मानते हैं कि राम बच्चों को लुभाते हैं, माओं के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, भक्तों को भयमुक्त करते हैं और दुष्टों को भयभीत करते हैं। राम का सम्पूर्ण जीवन असत्य से लड़ने की प्रेरणा है, सत्य को जानना राम को जानना है। श्री राम प्रजावत्सल हैं, उन्होंने लोकहित के लिए एक आदर्श शासक की तरह अपने सुखांे का त्याग कर दिया था, यही कारण है कि आज आपसी संवाद में भगवान श्री राम जय राम जी होकर रह गये। प्रजा राम की सत्य के कारण जय-जयकार करती है, यह अभिवादन राम के प्रति सम्मान का भाव तो व्यक्त करता ही है उस सत्य के प्रति भी अपना विश्वास व्यक्त करता है जिसे राम ने असत्य को पराजित करके प्राप्त किया था। सर्वशक्तिमान होकर भी राम शक्ति का प्रदर्शन नहीं करते। राम न्याय की बात करते हैं, राम चाहते तो किसी भी पल वह रावण का वध कर सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। राम असत्य के आधारों पर खड़े रावण के अहंकार का ही नाश करना चाहते थे, रावण का वध उनका उद्देश्य नहीं था, रावण को सद्मार्ग पर लाना उनका उद्देश्य था और इसीलिए उन्होंने रावण के साथ युद्ध को इतने दिनों तक लटकाये भी रखा।
राम के चेहरे पर भक्तों को जो प्रसन्नता, जो मनमोहक हँसी दिखाई देती है वह राम के अन्तर्मन में प्रज्वलित सत्य के सूर्य का प्रकाश ही है और यही पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करता है। पृथ्वी पर जब तक राम हैं असत्य की एक नहीं चलने वाली, राम थे, राम हैं और राम रहेंगे। सत्य था, सत्य है और सत्य रहेगा। क्योंकि सत्य का हर पक्षधर जानता है कि रामनाम सत्य है और विजय दशमी उसी सत्य का प्रजातांत्रिक अभिनंदन है।
