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Wednesday, September 16, 2026

हां मैंने फिराक को देखा है

अल फिराके अल फिराके अल फिराके अल फ़िराक
इस तरह इस ज़िन्दगी का एक वरक़ उल्टा गया । - मीना कुमारी
सन् 1972 बैंक रोड इलाहाबाद । सर्दियों की एक दोपहर । कथाकार अनीता गोपेश , शशि शर्मा  और मैं यानि अजामिल रोज़ की तरह एशिया के सबसे बड़े शायर रघुपति सहाय फ़िराक जी के सानिध्य का सुख उठा रहे थे । फ़िराक साहब तबियत से साहित्य के अनेक मुद्दों पर बतिया रहे थे । अनीता और शशि जी नोट्स ले रहे थे । मैं अपने 35 mm फार्मेट के जेनिथ कैमरे से फ़िराक साहब के चेहरे पर आ जा रही भाव भंगिमाओं को कैद रहा था । उस दिन 80 से ज़्यादा तस्वीरें उतारी थी मैंने फ़िराक साहब की । उन तस्वीरों में से काफी तस्वीरें धर्मयुग सारिका दिनमान जनसत्ता नव भारत टाइम्स और इंडिया टुडे  आदि तमाम पत्रपत्रिकाओं  में प्रकाशित हुई थी ।
       वक़्त गुज़र गया । पर यादें आज भी ताज़ा है । फ़िराक साहब कहाकार्टे थे क़ि लोग नाज़ करेंगे क़ि उन्होंने फ़िराक को देखा है । मैं और मेरी दोनों सहेलियां हम भाग्य शाली हैं कि हमने फ़िराक साहब को देखा ही नहीं है बल्कि उनकी प्यार दुलार से भरी गालियां भी खायीं हैं ।
-अजामिल
छाया : अजामिल

काव्यपाठ क़ि कला /अजामिल

**काव्यपाठ की कला
**कविता के प्राण बसते हैं काव्यपाठ में
**जो कविता सुनी सुनाई नहीं जाती वह कविता नहीं है...
कविता का पाठ : कला या चुनौती

"कविता केवल लिखने की वस्तु नहीं,
वह जीने और सुनाने की कला है।
अच्छा काव्य पाठ ही कविता को
श्रोता के दिल और दिमाग तक पहुँचाता है।"
संवाद और कविता : एक समान साधना

रंगमंच पर किसी अभिनेता द्वारा जब संवाद बोले जाते हैं, तो उनका अर्थ और प्रभाव तभी सामने आता है जब अभिनेता संवादों को बोलने की कला में प्रशिक्षित हो। ठीक इसी तरह कविता का पाठ (Poetry Recitation) भी केवल शब्दों को बोलना नहीं है, बल्कि एक जीवंत अनुभव की अभिव्यक्ति है।

विशेषज्ञों का मानना है कि “संवाद और काव्य पाठ, दोनों का लक्ष्य श्रोता तक भाव और अर्थ पहुँचाना है।” जब हम कविता को पढ़ते हैं, तो उसका असर कुछ और होता है, लेकिन जब वही कविता रंगमंच का अभिनेता पढ़ता है, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा और जीवंत होता है।
काव्य पाठ की वास्तविकता

यह माना जाता है कि दस में से आठ कवि अपनी कविताओं का खराब पाठ करते हैं। परिणामस्वरूप उनकी बेहतरीन रचनाएँ भी श्रोताओं तक सही ढंग से नहीं पहुँच पातीं। सुनने वाले पर वह असर नहीं होता, जो होना चाहिए।

“कविता केवल पढ़ने की नहीं, जीने की चीज है।” लेकिन बहुत-से कवि इसे केवल पन्नों पर लिखे शब्दों की तरह प्रस्तुत करते हैं।
**सामान्य भूलें

कई कवि अपनी ही कविता की भाषा और आशय से पूरी तरह परिचित नहीं होते।

वे समझते हैं कि केवल कागज़ से पढ़ लेना या स्मृति से सुना देना पर्याप्त है।

मंच पर कुछ कवि अनावश्यक चिल्लाकर या बार-बार तालियाँ माँगकर कविता की गरिमा को नष्ट कर देते हैं।

गंभीर कवि भी कई बार अपनी कविता की कमज़ोरी को अभिनय या आवाज़ की नकल से ढकने की कोशिश करते हैं।

ऐसे कवियों की कविताएँ श्रोता के मन तक नहीं पहुँच पातीं और कविता की गंभीरता हल्की पड़ जाती है। “फूहड़ अभिनय कविता का सहारा नहीं, बल्कि उसकी हत्या है।”
सादगी और प्रभावशीलता की मांग

कविता अपने संप्रेषण में सादगी और विनम्रता चाहती है। सच्चे कवि वे हैं, जो कविता को मंच पर जीकर प्रस्तुत करते हैं। ऐसे कवियों का काव्य पाठ श्रोताओं को भीतर तक छू लेता है और उनसे बार-बार कविता सुनने का आग्रह किया जाता है।

आज सोशल मीडिया पर कई रंगकर्मी और कवि इस कला को गंभीरता से सीखकर कविता-पाठ कर रहे हैं, जिन्हें खूब सराहा जा रहा है। यह स्पष्ट है कि एक अच्छी कविता के साथ-साथ अच्छा काव्य पाठ भी आवश्यक है।

कविता और पाठ का संतुलन

यह भी सच है कि कभी-कभी अच्छा काव्य पाठ औसत दर्जे की कविता को लोकप्रिय बना देता है, जबकि खराब पाठ बेहतरीन कविताओं का असर नष्ट कर देता है। इसलिए ज़रूरी है कि कविता के कंटेंट और काव्य पाठ में संतुलन बना रहे।

“किताब में छपी कविता और मंच पर प्रस्तुत कविता, दोनों में वही अंतर है जो लिखित संवाद और रंगमंच पर बोले गए संवाद में होता है।”

कवि का दायित्व केवल कविता लिख देना नहीं है, बल्कि उसे अपने पाठ के माध्यम से श्रोताओं तक पहुँचाना भी है। जब तक कविता को सुनाया और जीया न जाए, वह अधूरी रहती है।

“कविता लिखना साहित्य है, और कविता का पाठ कला।”
**अजामिल

बादल सरकार और समानांतर नामा/अजामिल


समानांतरनामा और 
वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक
48 वर्ष पहले देखा गया एक सपना
आज से 48 वर्ष पहले सुपरिचित रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक अनेक सपनों और रंगमंच के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के साथ इलाहाबाद आए थे। उन्होंने बड़ी विनम्रता और समर्पण के साथ अपने रंगकर्म की साधना शुरू की। यह वह समय था जब इलाहाबाद का रंगमंच अपनी नाट्य प्रस्तुतियों के कारण पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना चुका था। यह जानना भी दिलचस्प है कि उस दौर में इलाहाबाद में देश के दूसरे शहरों की तुलना में बड़ी संख्या में नाट्य प्रस्तुतियाँ हुआ करती थीं।
उस समय समर्पित रंगकर्मियों द्वारा आयोजित लघु नाट्य प्रतियोगिताओं में ही लगभग 400 नाटक संगीत समिति के मंच पर देश की विभिन्न नाट्य संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत किए जाते थे। इन आयोजनों में 600 से 800 तक रंगकर्मी शामिल होते थे। इसी रंगमंचीय वातावरण में अनिल रंजन भौमिक ने अपनी नाट्य प्रस्तुतियों की शुरुआत इलाहाबाद से की। कुछ ही प्रस्तुतियों के बाद वे रंगमंच के एक चर्चित नाम बन गए।
रंगमंच से आगे भी थी एक बेचैनी
अनिल रंजन भौमिक केवल रंगकर्म तक सीमित नहीं रहना चाहते थे। साहित्य, कला और संस्कृति की दूसरी विधाओं में भी काम करने की उनकी गहरी रुचि थी। इसी सोच से उनकी संस्था ‘समानांतर’ ने कला की विभिन्न विधाओं को केंद्र में रखकर साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े लोगों को एक साथ लाने का काम शुरू किया। उनकी बहुमुखी प्रतिभा और सक्रियता को साहित्य और कला जगत ने सराहा और स्वीकार किया।
लेकिन समानांतर की यह यात्रा केवल किसी संस्था के विस्तार की कहानी नहीं थी। इसके पीछे एक ऐसा सपना था, जिसमें रंगमंच को केवल मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं माना गया था।
रंगकर्मी परिवार क्यों नहीं बन सके?
अनिल रंजन भौमिक हमेशा एक समर्पित रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी रहे। उनका सपना था कि रंगकर्मी एक परिवार की तरह रहें, मिल-जुलकर श्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ करें और समाज के हित में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें। इसी भावना के कारण अनेक रंगकर्मी उनकी संस्था से परिवार के सदस्यों की तरह जुड़े।
लेकिन दूसरी संस्थाएँ एक मंच और एक छत के नीचे आकर काम करने के लिए तैयार नहीं हो सकीं। सभी अपनी-अपनी संस्थाओं और अपने-अपने ढंग से काम करना चाहते थे। इसमें कोई बुराई नहीं थी, लेकिन एक-दूसरे का सहयोग न करना निश्चित रूप से दुखद था। रंगकर्मियों के बीच सहयोग और सामूहिकता की कमी अनिल रंजन भौमिक को लंबे समय तक कचोटती रही।
अकेले चलने का निर्णय
फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वे अकेले चलने में भी विश्वास रखते रहे। उनके इस लंबे और एकाकी प्रयास का परिणाम आज, 48 वर्ष बाद, ‘समानांतर’ के मंच पर अनेक विधाओं में दिखाई देता है।
देशभर के रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी आज उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। समानांतर ने ऐसी पहचान बनाई है जिसका देश के कला और संस्कृति जगत में सम्मान है और जिसके साथ जुड़कर काम करना अनेक लोगों के लिए अपने आप में एक अनुभव है।
किसी संस्था की असली पहचान शायद उसके नाम से नहीं, बल्कि इस बात से बनती है कि उसने कितने लोगों को अपने साथ जोड़ा और कितने लोगों के लिए संवाद और सृजन की जगह बनाई। समानांतर की यात्रा को इसी संदर्भ में देखना अधिक सार्थक होगा।
और फिर आया ‘समानांतरनामा’
हाल ही में समानांतर ने अपनी चर्चित अनियतकालीन पत्रिका ‘समानांतरनामा’ का चौथा अंक प्रकाशित किया है। यह अंक देश-विदेश में चर्चित नाटककार और निर्देशक बादल सरकार के रंगकर्म पर केंद्रित है। अनिल रंजन भौमिक ने इस विशेषांक को नाम दिया है—‘बादल सरकार शतक विशेषांक’।
समानांतरनामा का यह अंक अपनी विषयवस्तु, गंभीरता और प्रस्तुति के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करता है। बादल सरकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय सामग्री प्रकाशित की गई है।
बादल सरकार को समझने की एक खिड़की
विशेषांक के ‘धरोहर’ स्तंभ में नेमिचंद्र जैन और प्रतिभा अग्रवाल जैसे वरिष्ठ रंगकर्मियों ने बादल सरकार के चर्चित नाटकों ‘बाकी इतिहास’ और ‘एवं इंद्रजीत’ पर महत्वपूर्ण आलेख लिखे हैं। इसके साथ ही विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर बादल सरकार द्वारा दिया गया उनका सार्थक संदेश भी प्रकाशित किया गया है।
इस विशेषांक में बादल सरकार के रंग-जीवन से जुड़े अनेक अनुभवों को पढ़ना अपने आप में एक अलग तरह का अनुभव है। पंडित सत्यदेव दुबे, सुलभा देशपांडे, महेश चंद्र चट्टोपाध्याय, अनामिका हक्सर और सुधीर मिश्रा के महत्वपूर्ण आलेखों और टिप्पणियों को भी इसमें स्थान दिया गया है।
लेकिन बादल सरकार को समझने के लिए केवल उनके नाटकों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। उनके रंगमंच की बुनियादी अवधारणाओं को समझना भी जरूरी है।
‘तीसरा रंगमंच’ और उससे आगे
बादल सरकार की रंग-दृष्टि और उनके ‘तीसरे रंगमंच’ की अवधारणा पर इस विशेषांक में विशेष रूप से विचार किया गया है। यह वह पक्ष है जो बादल सरकार को भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक विशिष्ट रंगकर्मी के रूप में समझने में मदद करता है।
पत्रिका का ‘रंग वैचारिकी’ खंड भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें विजय तेंदुलकर, श्याम बेनेगल, गिरीश कर्नाड, अमोल पालेकर, मोहन आगाशे, देवेंद्र राज अंकुर, प्रो. लाल बहादुर वर्मा, कीर्ति जैन, राकेश वेदा, प्रो. मित्रसेन मजूमदार और राजेश कुमार जैसे महत्वपूर्ण रंगकर्मियों और चिंतकों के विचारों को सामने लाने वाले उपयोगी आलेख शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त भी इस अंक में ऐसी बहुत-सी सामग्री है जो रंगमंच में रुचि रखने वाले पाठकों को लंबे समय तक अपने साथ जोड़े रखती है।
केवल पढ़ने की नहीं, संभालकर रखने की सामग्री
बादल सरकार को केवल उनके नाटकों के माध्यम से नहीं, बल्कि उनकी संपूर्ण रंग-दृष्टि और रंगमंच के प्रति उनके विचारों के संदर्भ में समझना हो, तो समानांतरनामा का यह अंक उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराता है।
विशेषांक में बादल सरकार के कई सुंदर चित्र भी प्रकाशित किए गए हैं, जो इसे केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि संभालकर रखने की सामग्री भी बनाते हैं।
संपादन के पीछे एक सामूहिक श्रम
इस अंक के संपादक मंडल में राजेंद्र कुमार, देवेंद्र राज अंकुर और अनीता गोपेश का सहयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके सहयोग के बिना यह अंक इस रूप में संभव नहीं था।
विशेषांक में बादल सरकार के चर्चित नाटक ‘सीढ़ी’ का अनुवाद अनिल रंजन भौमिक ने किया है, जबकि ‘बीज’ का अनुवाद यामाहा सराफ ने किया है। इन दोनों अनुवादों ने अंक की उपयोगिता को और बढ़ा दिया है।
एक विशेषांक से कहीं अधिक
मेरी दृष्टि में ‘समानांतरनामा’ का यह अंक केवल एक विशेषांक नहीं, बल्कि बादल सरकार के रंगकर्म को समझने की दिशा में एक गंभीर दस्तावेज है। हिंदी रंगमंच की पत्रिकाओं के संदर्भ में यह अंक इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें सामग्री का चयन केवल सूचना देने के लिए नहीं, बल्कि एक बड़े रंगकर्मी की रंग-दृष्टि को समझने के लिए किया गया है।
बादल सरकार को उनके रंगकर्म, उनकी वैचारिकी और उनके ‘तीसरे रंगमंच’ की अवधारणा के माध्यम से समझना चाहने वाले पाठकों के लिए यह अंक लंबे समय तक उपयोगी रहेगा। इसे एक संदर्भ सामग्री की तरह भी देखा जा सकता है।
48 साल की यात्रा का एक पड़ाव
अनिल रंजन भौमिक ने 48 वर्ष पहले जिस सपने के साथ इलाहाबाद में अपने रंगकर्म की शुरुआत की थी, उसकी एक झलक आज समानांतर की ऐसी गतिविधियों में दिखाई देती है। अकेले शुरू की गई एक यात्रा जब इतने वर्षों बाद अनेक लोगों को अपने साथ जोड़ लेती है, तो उसके पीछे केवल किसी संस्था का विस्तार नहीं होता; उसके पीछे लगातार किए गए काम, विश्वास और धैर्य की लंबी कहानी होती है।
‘समानांतरनामा’ का यह विशेषांक उसी लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
— अजामिल

Tuesday, September 15, 2026

स्वाद का छलावा या सेहत का खेल /अजामिल

स्वाद का छलावा और सेहत का सत्य: 

बदलती खाद्य-संस्कृति का संकट

**अजामिल

आज का मनुष्य एक अजीब द्वंद्व में जी रहा है। उसके सामने थाली में सजे विकल्प जितने आकर्षक हैं, उतने ही खतरनाक भी। एक ओर स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का शोर है—जिम, योग, डाइट प्लान, ऑर्गेनिक फूड—और दूसरी ओर स्वाद के नाम पर फैलता हुआ एक ऐसा बाज़ार, जिसने मनुष्य की भूख को आदत और आदत को लत में बदल दिया है। परिणाम यह है कि मनुष्य यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या छोड़ देना चाहिए।

यह संकट केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का है। आधुनिक जीवनशैली, भागदौड़, बाज़ार की चकाचौंध और सुविधा की अंधी दौड़ ने हमारे भोजन को “पोषण” से हटाकर “मनोरंजन” का साधन बना दिया है। भोजन अब शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि जीभ का उत्सव बन गया है—और यही उत्सव धीरे-धीरे बीमारी का उत्स बनता जा रहा है।

स्वाद बनाम सेहत: एक गहराता द्वंद्व

स्वाद तात्कालिक सुख देता है। वह जीभ को संतुष्ट करता है, मन को क्षणिक आनंद देता है। लेकिन सेहत एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है—जो अनुशासन, संयम और समझ की मांग करती है। आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम अल्पकालिक सुख के लिए दीर्घकालिक स्वास्थ्य को दांव पर लगा रहे हैं।

वैज्ञानिक शोध लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि प्रोसेस्ड फूड, अत्यधिक चीनी, नमक और वसा से भरपूर भोजन—जैसे फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स—शरीर के लिए धीमे जहर की तरह काम करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों में तेजी से वृद्धि का एक बड़ा कारण यही असंतुलित खानपान है।

भारत में स्थिति और चिंताजनक है। पारंपरिक संतुलित भोजन—दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, छाछ—की जगह अब तली-भुनी और बाजारू चीज़ों ने ले ली है। खाने का समय अनियमित हो गया है। “जब मन किया, तब खा लिया”—यह नई जीवनशैली बन चुकी है।

पेट: पोषण का केंद्र या कचरे का डिब्बा?

एक कटु सत्य यह है कि आज अधिकांश लोगों का पेट एक “डस्टबिन” की तरह व्यवहार किया जा रहा है। जो भी सामने आया—चाहे भूख हो या न हो—उसे खा लिया गया। स्वाद के नाम पर हम शरीर की सीमाओं को अनदेखा कर रहे हैं।

हम यह भूल चुके हैं कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर के संचालन के लिए ऊर्जा और पोषण देने का माध्यम है। जब हम बिना आवश्यकता, बिना संतुलन और बिना समझ के खाते हैं, तो वही भोजन हमारे लिए विष बन जाता है।

आज एक सामान्य परिवार में यह देखने को मिलता है कि खाने-पीने पर जितना खर्च नहीं होता, उससे अधिक दवाइयों पर खर्च हो रहा है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट का भी संकेत है।

पूर्वजों की परंपरा: भोजन एक साधना

हमारे पूर्वजों ने भोजन को केवल भोग नहीं, बल्कि एक साधना माना था। वे जानते थे कि “जैसा अन्न, वैसा मन।” इसलिए भोजन में सात्विकता, सादगी और संतुलन को प्राथमिकता दी जाती थी।

खाना घर में बनता था, ताज़ा बनता था, और उसमें परिवार के हर सदस्य की सेहत का ध्यान रखा जाता था। भोजन का समय निश्चित होता था। अधिक खाने से बचा जाता था। उपवास और व्रत जैसी परंपराएँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शरीर को विश्राम देने की वैज्ञानिक पद्धतियाँ थीं।

जैन धर्म की शिक्षाएँ: संयम का विज्ञान

यदि हम भारतीय परंपराओं में देखें, तो जैन धर्म ने भोजन के विषय में अत्यंत गहन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। जैन दर्शन में “अहिंसा” के साथ-साथ “संयम” को सर्वोच्च स्थान दिया गया है—और यह संयम भोजन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

जैन अनुयायी कई महत्वपूर्ण नियमों का पालन करते हैं:

सूर्यास्त के बाद भोजन न करना—जिससे पाचन तंत्र को पर्याप्त विश्राम मिले।

सात्विक और सरल भोजन—जिसमें तामसिक और उत्तेजक पदार्थों से बचा जाता है।

मिताहार (कम खाना)—अर्थात आवश्यकता से अधिक न खाना।

उपवास और एकासन—शरीर को डिटॉक्स करने के प्राकृतिक तरीके।

आधुनिक विज्ञान भी अब इन सिद्धांतों की पुष्टि कर रहा है। “इंटरमिटेंट फास्टिंग” जैसी अवधारणाएँ, जो आज पश्चिम में लोकप्रिय हैं, हमारे पारंपरिक ज्ञान का ही आधुनिक रूप हैं।

आधुनिक विज्ञान और बढ़ती चिंताएँ

आज पूरी दुनिया में “लाइफस्टाइल डिज़ीज़” (जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ) सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी हैं।

मोटापा बच्चों तक में तेजी से बढ़ रहा है।

टाइप-2 डायबिटीज़ अब युवाओं में भी आम हो गई है।

हृदय रोग पहले की तुलना में अधिक कम उम्र में हो रहे हैं।

इन सबके पीछे एक बड़ा कारण है—अनियंत्रित और असंतुलित खानपान।

वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर को जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है, उससे अधिक ऊर्जा (कैलोरी) लेने पर वह वसा के रूप में जमा हो जाती है। साथ ही, प्रोसेस्ड फूड में मौजूद केमिकल्स और प्रिज़र्वेटिव्स शरीर के आंतरिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं।

स्वाद का बाजार और हमारी कमजोरियाँ

आज का बाजार हमारी कमजोरियों को भली-भांति समझता है। वह जानता है कि मनुष्य को त्वरित सुख चाहिए। इसलिए वह ऐसे खाद्य पदार्थ तैयार करता है जो स्वाद में अत्यंत आकर्षक हों, लेकिन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों।

विज्ञापन, पैकेजिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से हमें लगातार यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि “स्वाद ही जीवन है।” लेकिन सच्चाई यह है कि यह स्वाद एक भ्रम है—एक ऐसा जाल, जिसमें फंसकर हम अपनी सेहत खो रहे हैं।

समाधान: संतुलन की ओर वापसी

यह स्थिति निराशाजनक जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। यदि हम सचेत हो जाएँ, तो बहुत कुछ बदला जा सकता है।

भोजन को प्राथमिकता दें, स्वाद को नहीं

भोजन का चुनाव इस आधार पर करें कि वह शरीर के लिए कितना लाभकारी है।

नियमित समय पर खाएँ

शरीर को एक लय में रखें। अनियमितता पाचन को बिगाड़ती है।

मिताहार अपनाएँ

जितनी भूख हो, उससे थोड़ा कम खाएँ।

प्राकृतिक और ताज़ा भोजन लें

पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएँ।

उपवास और विराम को अपनाएँ

सप्ताह में एक दिन या समय-समय पर शरीर को विश्राम दें।

परंपराओं से सीखें

जैन धर्म और अन्य भारतीय परंपराओं के सिद्धांतों को आधुनिक जीवन में अपनाएँ।

निष्कर्ष: स्थायी सुख का मार्ग

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमें स्वाद चाहिए या नहीं—प्रश्न यह है कि हम किस कीमत पर उसे चाहते हैं। यदि स्वाद के पीछे भागते-भागते हम अपनी सेहत खो दें, तो वह स्वाद व्यर्थ है।

सेहत वह आधार है, जिस पर जीवन का हर सुख टिका होता है। स्वाद का आनंद क्षणिक है, लेकिन सेहत का सुख स्थायी है।

इसलिए यह समय है कि हम अपने भीतर झांकें और यह तय करें कि हम अपने पेट को पोषण का केंद्र बनाएँगे या कचरे का डिब्बा।

यदि हमने अभी भी नहीं संभला, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी। लेकिन यदि हम संयम और समझ का रास्ता चुनते हैं, तो हम न केवल अपनी सेहत बचा सकते हैं, बल्कि एक स्वस्थ समाज की नींव भी रख सकते हैं।

याद रखिए—स्वाद कुछ क्षणों का उत्सव है, लेकिन सेहत पूरी जिंदगी का उत्सव है।

स्वाद का छलावा और सेहत का सत्य: प्रकृति से दूर होता मनुष्य

आज का मनुष्य केवल स्वाद और सेहत के बीच ही नहीं, बल्कि “प्रकृति और कृत्रिमता” के बीच भी एक गहरे द्वंद्व में फँसा हुआ है। यह द्वंद्व जितना व्यक्तिगत है, उतना ही वैश्विक भी। एक ओर आधुनिक खानपान की चकाचौंध है—तेल, घी, मसालों से लबालब भरे व्यंजन—और दूसरी ओर यह विचार तेजी से उभर रहा है कि क्या वास्तव में यही भोजन हमें स्वस्थ बना रहा है या धीरे-धीरे बीमार?

तेल, घी और मसाले: आवश्यकता या अति?

भारतीय भोजन की पहचान लंबे समय तक संतुलन और विविधता रही है। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। तेल, घी और मसालों का उपयोग अब स्वाद बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह एक प्रकार की अति में बदल गया है।

यह कहना गलत होगा कि तेल या घी अपने आप में हानिकारक हैं। हमारे पारंपरिक भोजन में इनका स्थान हमेशा से रहा है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब इनका उपयोग “आवश्यकता” से बढ़कर “लालसा” बन जाता है। अत्यधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन पाचन तंत्र पर दबाव डालता है, शरीर में सूजन बढ़ाता है और दीर्घकाल में कई बीमारियों का कारण बनता है।

प्रकृति का भोजन: सीधा, सरल और सशक्त

इसके विपरीत, जो भोजन हमें सीधे प्रकृति से प्राप्त होता है—जैसे फल, कच्ची सब्ज़ियाँ, अंकुरित अनाज—वह शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। यह भोजन न केवल पचने में आसान होता है, बल्कि शरीर को आवश्यक पोषक तत्व भी सहज रूप से प्रदान करता है।

आज “नेचुरल डाइट” या “प्लांट-बेस्ड डाइट” की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। वैज्ञानिक शोध यह बताते हैं कि प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त भोजन—विशेषकर फल और सब्ज़ियाँ—शरीर को रोगों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह विचार भी तेजी से फैल रहा है कि मनुष्य को वही खाना चाहिए, जो पृथ्वी उसे सीधे प्रदान करती है, बिना अधिक प्रसंस्करण (processing) के। अर्थात, जितना कम हम भोजन के साथ छेड़छाड़ करेंगे, उतना ही वह हमारे लिए लाभकारी रहेगा।

मांसाहार पर प्रश्नचिह्न

इसी संदर्भ में मांसाहारी भोजन को लेकर भी वैश्विक स्तर पर बहस तेज़ हुई है। पर्यावरणीय, नैतिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से मांसाहार की आलोचना बढ़ रही है।

कई शोध यह संकेत देते हैं कि अत्यधिक मांसाहार हृदय रोग, मोटापा और अन्य बीमारियों से जुड़ा हुआ है। साथ ही, पशुपालन का पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग अब शाकाहार या प्लांट-बेस्ड आहार की ओर बढ़ रहे हैं।

भारतीय परंपरा, विशेषकर जैन और वैदिक दृष्टिकोण, पहले से ही इस बात पर जोर देता रहा है कि भोजन ऐसा होना चाहिए जो शरीर और प्रकृति—दोनों के लिए हितकारी हो।

हर समय खाना: एक नई बीमारी

आधुनिक जीवनशैली की एक और गंभीर समस्या है—लगातार खाना।

आज “भूख” और “खाने की इच्छा” के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया है।

हम सुबह उठते ही चाय-नाश्ता, फिर कुछ देर बाद स्नैक्स, दोपहर का भोजन, शाम की चाय, फिर रात का खाना—और उसके बाद भी कुछ न कुछ खाते रहते हैं।

यह निरंतर खाने की आदत शरीर को कभी भी पूर्ण विश्राम नहीं देती। पाचन तंत्र लगातार काम करता रहता है, जिससे शरीर की “रिपेयरिंग” प्रक्रिया बाधित होती है।

शाम का भोजन: आवश्यक या आदत?

अब एक महत्वपूर्ण विचार तेजी से सामने आ रहा है—क्या रात का भोजन वास्तव में आवश्यक है?

कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि हम सूर्यास्त के बाद भोजन न करें, या बहुत हल्का भोजन करें, तो यह शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी हो सकता है।

रात का समय शरीर के विश्राम और मरम्मत (repair) का समय होता है। यदि हम उस समय भारी भोजन कर लेते हैं, तो शरीर को पाचन में ही अपनी ऊर्जा लगानी पड़ती है, और वह अपनी अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं—जैसे कोशिकाओं की मरम्मत—को ठीक से नहीं कर पाता।

यह सिद्धांत हमारे पारंपरिक ज्ञान में पहले से मौजूद था। जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन न करने की परंपरा इसी वैज्ञानिक समझ पर आधारित है।

उपवास: शरीर का पुनर्निर्माण

जब हम कुछ समय के लिए भोजन से विराम लेते हैं—चाहे वह उपवास हो या सीमित आहार—तो शरीर को स्वयं को पुनर्संतुलित करने का अवसर मिलता है।

आज “इंटरमिटेंट फास्टिंग” के नाम से जो पद्धति लोकप्रिय हो रही है, वह मूलतः हमारे पारंपरिक उपवास की आधुनिक व्याख्या ही है।

उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है, पाचन तंत्र को आराम देता है और मानसिक स्पष्टता भी बढ़ाता है।

भारत में आवश्यकता: प्रकृति की ओर वापसी

भारत जैसे देश में, जहाँ प्रकृति ने हमें विविध और समृद्ध खाद्य संसाधन दिए हैं, वहाँ सबसे अधिक आवश्यकता है कि हम अपने खानपान में उन्हीं प्राकृतिक तत्वों का अधिकतम उपयोग करें।

हमारे यहाँ फल, सब्ज़ियाँ, अनाज, दालें—सब कुछ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। फिर भी हम बाजारू और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

यह एक विडंबना है कि जो चीज़ें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध हैं, हम उन्हें छोड़कर उन चीज़ों की ओर भाग रहे हैं जो न केवल महंगी हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हैं।

निष्कर्ष: संयम ही समाधान

अंततः समाधान किसी एक चरम में नहीं, बल्कि संतुलन और संयम में है।

तेल, घी और मसालों का उपयोग पूरी तरह बंद करना आवश्यक नहीं, लेकिन उनकी मात्रा पर नियंत्रण जरूरी है।

प्राकृतिक भोजन को प्राथमिकता देना चाहिए।

भोजन के समय और मात्रा को नियंत्रित करना चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण—भोजन को “आनंद” के बजाय “आवश्यकता” के रूप में देखना चाहिए।

आज यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि स्वाद का आनंद क्षणिक है, लेकिन सेहत का महत्व जीवनभर का है।

यदि हम स्वाद के पीछे अंधी दौड़ में लगे रहेंगे, तो न केवल अपनी सेहत खो देंगे, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी भी तैयार करेंगे जो बीमारियों से घिरी होगी।

इसलिए यह समय है कि हम अपने भीतर यह संकल्प लें—

हम अपने पेट को डस्टबिन नहीं बनने देंगे,

हम प्रकृति के करीब जाएंगे,

और हम ऐसा भोजन चुनेंगे जो हमें जीवित ही नहीं, बल्कि स्वस्थ भी रखे।

याद रखिए—प्रकृति हमें जीवन देती है, और वही भोजन हमें स्वस्थ जीवन दे सकता है।

**अजामिल


गोपेश समग्र :एक व्यक्तित्व कृतित्व क़ि जाँच पड़ताल / रविंनंदन सिंह / सम्पादन :अजामिल

‘गोपेश समग्र’ : हिन्दी और रूसी साहित्य के अंतर्संबंधों का महत्त्वपूर्ण आख्यान
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               लगभग दो माह पूर्व कथाकार प्रो अनीता गोपेश ने अपने पिता कविवर गोपीकृष्ण गोपेश के रचनात्मक अवदान को सहेजने वाली कृति ’गोपेश समग्र’ उपलब्ध कराया था और एक समृद्ध समीक्षा का आग्रह किया था। जो भी हो सका, उनके उसी आत्मीय आदेश का निर्वाह मैने किया है। लगभग 700 पृष्ठों की किताब को धीरे धीरे पढ़ते हुए काफी समृद्ध होता रहा। मैं गोपेश जी को देख तो नहीं सका था (क्योंकि उनके निधन के लगभग 10 वर्ष बाद  इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था), किंतु मेरे अंग्रेजी विभाग में, जहां वे रसियन विभाग के प्राध्यापक थे, उनके के बारे में अनेक बातें अपने गुरुजनों से सुना करता था। विशेष रूप से प्रो अमर सिंह से। 
         गोपेश जी के बारे में लिखते हुए यह अवश्य कहना चाहता हूँ कि प्रत्येक भाषा के साहित्येतिहास में कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं जिनका महत्त्व उनकी प्रकाशित कृतियों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके रचनात्मक व्यक्तित्व की व्यापकता, वैचारिक सक्रियता और विभिन्न संस्कृतियों के बीच निर्मित संवाद से निर्धारित होता है। कवि, अनुवादक, अध्यापक, रेडियो-कर्मी, संस्मरणकार, डायरी-लेखक और हिन्दी-रूसी साहित्य के सांस्कृतिक सेतु गोपी कृष्ण ‘गोपेश’ जी इसी श्रेणी के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। उनके साहित्यिक अवदान को समग्रता में देखने का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रयास ‘गोपेश समग्र’ के रूप में सामने है। प्रस्तुत समग्र केवल किसी दिवंगत साहित्यकार की रचनाओं का संचयन नहीं है, बल्कि बीसवीं शताब्दी के मध्यवर्ती हिन्दी साहित्य, भारतीय-रूसी सांस्कृतिक संबंधों, अनुवाद-चेतना, प्रगतिशील साहित्यिक वातावरण और एक संवेदनशील कवि के जीवन-संघर्षों का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी है। 
         ‘गोपेश समग्र’ का समृद्ध और सार्थक संपादन वरिष्ठ साहित्यकार अजामिल जी ने किया है। समग्र की विषय-वस्तु और संरचना को देखते हुए स्पष्ट होता है कि सजग संपादक ने गोपेश जी को केवल कवि के रूप में सीमित करने के बजाय उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को सामने लाने का प्रयत्न किया है। समग्र का विभाजन चार प्रमुख अनुभागों—‘व्यक्तित्व और कृतित्व’, ‘गोपेश का कविता संसार’, ‘गोपेश का गद्य-संसार’ और ‘आवाज़ की दुनिया में, गोपेश की आवाज़’—में किया गया है। इसके अतिरिक्त अंत में जीवन-परिचय, सामग्री-संदर्भ और चित्र-वीथि भी दी गई है। यह संरचना स्वयं इस बात की प्रमाणिकता प्रस्तुत करती है कि गोपेश का साहित्यिक व्यक्तित्व एकरेखीय नहीं था।‘गोपेश समग्र’ का संपादकीय समग्र साहित्य की आवश्यकता, उपयोगिता और महत्ता को रेखांकित करने वाला एक सारगर्भित एवं भावपूर्ण लेख है। संपादक अजामिल जी ने यह स्पष्ट किया है कि किसी साहित्यकार के संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए उसकी समस्त रचनाओं का एक स्थान पर उपलब्ध होना आवश्यक है। संपादकीय में समग्र प्रकाशन की परंपरा, उसके शोधगत महत्त्व तथा साहित्यिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर प्रभावी ढंग से प्रकाश डाला गया है। संपादकीय की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आत्मीयता और भावनात्मक संवेदना है। यह संपादकीय गोपेश जी के मौलिक साहित्य, उनकी सृजनशीलता तथा रूसी साहित्य के अनुवादक के रूप में उनके अवदान को भी रेखांकित करता है। संपादकीय की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादधर्मी है, जिससे पाठक सहज रूप से विषय से जुड़ जाता है। समग्र के उद्देश्य और उपयोगिता को स्पष्ट करने में यह संपादकीय पूर्णतः सफल है। कुल मिलाकर यह संपादकीय गोपीकृष्ण गोपेश के साहित्यिक अवदान को स्मरणीय बनाने तथा हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि को सुरक्षित रखने की एक सार्थक और प्रशंसनीय पहल का परिचायक है।                   
           कविवर गोपीकृष्ण गोपेश जी की पुत्री प्रो. अनीता गोपेश द्वारा अपने पिता की रचनाओं को सहेजने का सार्थक प्रयास किया गया है। उनका पुत्री के रूप में रचनाकार पिता की स्मृतियों को लेख में उतरना अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है। इससे साहित्यिक धरोहर के संरक्षण में पारिवारिक योगदान का महत्त्व भी उद्घाटित होता है। प्रो. अनीता गोपेश का अपने पिता गोपेश जी पर संस्मरणात्मक लेख “जीवन जो जिया-किया : बेटी की निगाह में” केवल एक सुप्रसिद्ध कवि, अनुवादक और संस्कृतिकर्मी गोपेश के व्यक्तित्व का परिचय नहीं देता, बल्कि यह बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के हिंदी साहित्यिक संसार, उसकी वैचारिक हलचलों और मानवीय संबंधों का एक जीवंत दस्तावेज़ भी बन जाता है। यह लेख एक बेटी द्वारा अपने पिता को समझने और पुनः खोजने की भावनात्मक यात्रा का आख्यान है, जिसमें आत्मीयता, स्मृति, इतिहास और साहित्यिक मूल्यांकन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। लेख की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ईमानदार और निर्भीक दृष्टि है। अनीता गोपेश अपने पिता को किसी महिमामंडित नायक के रूप में प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि एक संवेदनशील, प्रगतिशील, संघर्षशील और मानवीय मूल्यों वाले व्यक्ति के रूप में सामने लाती हैं। यही कारण है कि संस्मरण में गोपेश का व्यक्तित्व अधिक विश्वसनीय और जीवंत बनकर उभरता है। लेखिका ने उनके साहित्यिक अवदान के साथ-साथ उनके पारिवारिक जीवन, वैचारिक प्रतिबद्धताओं, प्रेम, दायित्वबोध और संघर्षों को भी समान महत्व दिया है। इस लेख का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष इसका दस्तावेज़ी महत्व है। गोपेश के मॉस्को प्रवास, रेडियो मॉस्को में उनके कार्य, रूसी साहित्य के अनुवाद, ‘परिमल’ संस्था की स्थापना, धर्मवीर भारती, फिराक, बच्चन, निराला, पंत, भवानी प्रसाद मिश्र और अन्य साहित्यकारों के साथ उनके संबंधों का जो विवरण यहाँ मिलता है, वह हिंदी साहित्य के इतिहास की अमूल्य सामग्री है। अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो केवल संस्मरण नहीं, बल्कि साहित्यिक इतिहास के दुर्लभ साक्ष्य बन जाते हैं। लेख में भावुकता है, किंतु वह कहीं भी अतिनाटकीय नहीं होती। पिता की अनुपस्थिति, उनके अकाल निधन, परिवार के संघर्ष और बाद में उनके व्यक्तित्व को नए सिरे से समझने की प्रक्रिया को लेखिका ने अत्यंत संयम और संवेदनशीलता के साथ व्यक्त किया है। विशेष रूप से रूसी सहकर्मी से जुड़े प्रसंग तथा पति-पत्नी संबंधों पर की गई टिप्पणी लेखिका की परिपक्व दृष्टि और आत्मस्वीकृति का परिचय देती है। लेख सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय है। इसमें संस्मरण की आत्मकथात्मक ऊष्मा के साथ-साथ शोधपरक तथ्यात्मकता भी मौजूद है। यही कारण है कि यह लेख केवल एक बेटी की श्रद्धांजलि नहीं रह जाता, बल्कि गोपेश के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके उपेक्षित साहित्यिक अवदान के पुनर्मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण प्रयास बन जाता है। समग्रतः यह संस्मरण भावनात्मक गहराई, ऐतिहासिक प्रमाणिकता और साहित्यिक गरिमा से संपन्न एक उत्कृष्ट लेख है, जो पाठक को न केवल गोपेश के निकट ले जाता है, बल्कि उस पूरे साहित्यिक युग की आत्मा से भी परिचित कराता है। यह लेख स्मृति और इतिहास के संगम पर खड़ा एक मूल्यवान साहित्यिक दस्तावेज़ है।
           ‘गोपेश समग्र’ की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यापक संरचना है। अनुक्रमणिका से स्पष्ट है कि इसे चार प्रमुख भागों में व्यवस्थित किया गया है। पहले भाग ‘व्यक्तित्व और कृतित्व’ में ‘समय क्यों : ताकि अवदान रहे याद’, ‘जीवन जो जिया-किया : बेटी की निगाह में’, ‘गोपेश मेरी निगाह में’, ‘होना गोपेश का’, ‘गोपेश : रचनाकार और व्यक्ति’ जैसे लेख सम्मिलित हैं। इस खंड में गोपेश के जीवन और साहित्य का मूल्यांकन विभिन्न दृष्टियों से किया गया है। विशेष रूप से पारिवारिक दृष्टि, मित्रों की दृष्टि और समकालीन साहित्यिक दृष्टि को साथ रखने से व्यक्तित्व का बहुआयामी चित्र निर्मित होता है। इस खंड का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है—‘मित्र साहित्यकारों की दृष्टि में’ गोपेश। किसी साहित्यकार के व्यक्तित्व को समझने में आत्मकथात्मक या आधिकारिक जीवन-वृत्तांत जितने उपयोगी होते हैं, उतने ही महत्त्वपूर्ण उसके समकालीनों के संस्मरण और टिप्पणियाँ भी होती हैं। इस दृष्टि से यह खंड भविष्य के शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी है।
           दूसरा खंड ‘गोपेश का कविता संसार’ समग्र का केंद्रीय साहित्यिक आधार है। इसमें ‘कविता : क्यों और कैसे’, ‘हिन्दी कविता : बदलती दिशाएँ’ तथा ‘गोपेश की प्रयोगधर्मी कविताएँ’ जैसे आलोचनात्मक आलेखों के साथ उनकी प्रकाशित कविताओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके प्रमुख कविता-संग्रहों में ‘किरणें’, ‘धूप की लहरें’ और ‘तुम्हारे लिए’ विशेष उल्लेखनीय हैं। इन संग्रहों के साथ अप्रकाशित अथवा यत्र-तत्र प्रकाशित रचनाओं को जोड़कर समग्र ने गोपेश के कवि-रूप को अधिक व्यापक रूप में देखने का अवसर दिया है। गोपेश की कविता को उसके समय की साहित्यिक हलचलों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह वह समय था जब हिन्दी कविता छायावादी संवेदना से आगे बढ़कर सामाजिक यथार्थ, मनुष्य की जटिल स्थितियों, युद्ध, विस्थापन, राजनीतिक तनाव और बदलती विश्व-दृष्टि से संवाद कर रही थी। गोपेश की प्रयोगशीलता इसी संक्रमणशील काव्य-परिदृश्य से जुड़ती है। उनकी कविता में व्यक्तिगत अनुभूति और व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का अंतर्संबंध दिखाई देता है। इसीलिए उनके कवि-रूप को केवल किसी एक काव्यधारा के अनुयायी के रूप में परिभाषित करना उचित नहीं होगा। वे अपनी स्वतंत्र संवेदना और भाषिक प्रयोगशीलता के कारण अलग पहचान बनाते हैं।
           ’समग्र’ में संकलित दूधनाथ सिंह द्वारा लिखित संस्मरणात्मक आलोचनात्मक लेख ‘गोपेश : रचनाकार और व्यक्ति’ हिंदी साहित्य की उन दुर्लभ रचनाओं में है, जहाँ किसी साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन केवल आलोचक की दृष्टि से नहीं, बल्कि आत्मीय मित्र और सहयात्री की दृष्टि से भी किया गया है। यह लेख गोपेश के जीवन, संघर्ष, साहित्य, संवेदनशीलता और मानवीय गुणों का बहुआयामी चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक ने गोपेश को केवल एक कवि, अनुवादक और संस्मरणकार के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक ऐसे मनुष्य के रूप में चित्रित किया है, जिसकी सबसे बड़ी पूँजी उसका अथाह प्रेम और मानवीय करुणा थी। लेख का आरम्भ फैज़ अहमद फ़ैज़ के उस कथन से होता है जिसमें वे समूची दुनिया से प्रेम करने की बात करते हैं। दूधनाथ सिंह इसी सूत्र को गोपेश के व्यक्तित्व की कुंजी मानते हैं। उनके अनुसार गोपेश ऐसा व्यक्ति था जो दुनिया से प्रेम करने पर आमादा था, लेकिन यही उसका सबसे बड़ा गुण और सबसे बड़ी कमजोरी भी थी। वह नफरत करना नहीं जानता था और लोगों से मिले आघातों को सहजता से सहन भी नहीं कर पाता था। इस प्रकार लेखक ने गोपेश के व्यक्तित्व की मूल संवेदना को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उद्घाटित किया है। लेख की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आत्मीयता है। दूधनाथ सिंह ने अपने जीवन के अत्यंत कठिन दिनों का स्मरण करते हुए बताया है कि किस प्रकार आर्थिक अभावों से जूझते समय गोपेश ने बिना किसी औपचारिकता के उनकी सहायता की। यह प्रसंग गोपेश के उदार, सहृदय और मित्रवत् स्वभाव को उजागर करता है। यहाँ गोपेश केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि संवेदनशील मनुष्य के रूप में सामने आते हैं। लेखक ने इन निजी अनुभवों के माध्यम से यह स्थापित किया है कि गोपेश का जीवन और साहित्य एक-दूसरे से पृथक नहीं थे। समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो दूधनाथ सिंह ने गोपेश की साहित्यिक सीमाओं और संभावनाओं दोनों पर निष्पक्ष टिप्पणी की है। वे मानते हैं कि जीवन-संघर्षों और सामाजिक यथार्थ से गहरे रूप में जुड़े होने के बावजूद गोपेश की कविता यथार्थवादी धारा का सशक्त प्रतिनिधित्व नहीं कर सकी। उनका प्रमुख स्वर रोमानी गीतकार का रहा, जिस पर बच्चन की काव्य-परंपरा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। फिर भी लेखक यह स्वीकार करते हैं कि गोपेश की कविताओं में मानवीय संवेदनाओं की गहरी ऊष्मा और संबंधों को जोड़ने की अदम्य आकांक्षा विद्यमान है। यही गुण उन्हें विशिष्ट बनाता है। इस लेख में गोपेश के संस्मरणों और डायरी-लेखन का भी गंभीर मूल्यांकन किया गया है। लेखक के अनुसार उनके संस्मरण केवल स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि इलाहाबाद के साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास के प्रामाणिक दस्तावेज हैं। उनमें निराला, बच्चन, महादेवी, पंत, धर्मवीर भारती आदि साहित्यकारों का जीवंत चित्र उपस्थित है। साथ ही गोपेश के संघर्षपूर्ण जीवन और साहित्यिक निर्माण की कथा भी उनमें दर्ज है। इस दृष्टि से उनके संस्मरण साहित्यिक इतिहास और आत्मकथात्मक लेखन, दोनों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। 
          दूधनाथ सिंह ने गोपेश के अनुवादक रूप को भी रेखांकित किया है। विशेष रूप से शोलोखोव और दोस्तोयेव्स्की के अनुवादों का उल्लेख करते हुए उन्होंने उनकी भाषिक दक्षता, मुहावरेदानी और सांस्कृतिक समझ की प्रशंसा की है। इससे स्पष्ट होता है कि गोपेश केवल कवि ही नहीं, बल्कि विश्व साहित्य के गंभीर अध्येता और समर्थ अनुवादक भी थे। भाषा और शैली की दृष्टि से यह लेख अत्यंत प्रभावशाली है। इसमें संस्मरण, आलोचना, आत्मकथा और साहित्यिक इतिहास का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। लेखक की भाषा आत्मीय, व्यंग्यपूर्ण, भावुक और विश्लेषणात्मक—सभी रूपों में पाठक को बाँधे रखती है। गोपेश के प्रति गहरी श्रद्धा होने के बावजूद लेखक ने अंध-प्रशंसा का मार्ग नहीं अपनाया, बल्कि उनकी सीमाओं और अंतर्विरोधों को भी ईमानदारी से सामने रखा है। निष्कर्षतः ‘गोपेश : रचनाकार और व्यक्ति’ केवल एक साहित्यकार का मूल्यांकन नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य की जीवनगाथा है जिसने प्रेम, संवेदना और आत्मीयता को अपने जीवन और साहित्य का आधार बनाया। यह लेख गोपेश के व्यक्तित्व की मानवीय गरिमा, उनकी रचनात्मक उपलब्धियों और उनके अंतर्विरोधों को समझने की एक प्रामाणिक और संवेदनशील कोशिश है। हिंदी संस्मरणात्मक आलोचना की परंपरा में यह लेख एक महत्त्वपूर्ण और स्मरणीय कृति के रूप में देखा जाना चाहिए।
          गोपेश जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को बहुआयामी परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए इस समग्र में संकलित संस्मरण और आलोचनात्मक आलेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। दूधनाथ सिंह के आत्मीय संस्मरण के साथ-साथ राजेंद्र कुमार, सत्य प्रकाश मिश्र, अमरनाथ श्रीवास्तव तथा यश मालवीय के लेख इस संकलन की वैचारिक गरिमा को और अधिक समृद्ध बनाते हैं। विशेष रूप से नवगीतकार यश मालवीय का लेख ‘मित्र साहित्यकारों की दृष्टि में : कुछ टिप्पणियाँ, कुछ वक्तव्य’ उल्लेखनीय है, जिसमें गोपेश जी के संबंध में विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यकारों द्वारा व्यक्त विचारों और प्रतिक्रियाओं का सुविचारित संकलन प्रस्तुत किया गया है। यश भाई द्वारा सहेजी गई इन टिप्पणियों में सुमित्रानंदन पंत, पद्मकांत मालवीय, श्रीनारायण चतुर्वेदी, विजयदेव नारायण साही, रघुवंश, रामस्वरूप चतुर्वेदी, सत्यव्रत सिन्हा, उमाकांत मालवीय, कन्हैयालाल नंदन, धर्मवीर भारती तथा अमृतराय जैसे हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकारों के विचार शामिल हैं। इन साहित्यकारों की टिप्पणियाँ न केवल गोपेश जी की रचनात्मक प्रतिभा, वैचारिक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक सरोकारों को रेखांकित करती हैं, बल्कि उनके मानवीय व्यक्तित्व, साहित्यिक संबंधों और समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में उनकी विशिष्ट उपस्थिति का भी प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार विविध दृष्टियों से प्राप्त ये मूल्यवान अभिमत समग्र को वास्तविक अर्थों में ‘समग्र’ बनाते हैं तथा पाठकों और शोधार्थियों के लिए इसे एक विश्वसनीय संदर्भ-ग्रंथ का स्वरूप प्रदान करते हैं।
            गोपेश समग्र की उपलब्ध सामग्री के अनुसार गोपी कृष्ण ‘गोपेश’ का जन्म 11 नवम्बर 1925 को फ़रीदपुर (पीताम्बरपुर), बरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। 49 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन 4 सितम्बर 1974 को हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करना और शोध में प्रवेश लेना गोपेश के बौद्धिक गठन की दिशा को स्पष्ट करता है। यद्यपि उनका शोधकार्य पूरा नहीं हो सका, लेकिन उनके आगे के जीवन और लेखन में शोध-दृष्टि, भाषिक अनुशासन तथा साहित्यिक जिज्ञासा निरंतर बनी रही। युवा अवस्था में ही उन्होंने कवि के रूप में पहचान अर्जित कर ली थी। उनके साहित्यिक संस्कारों के निर्माण में हरिवंशराय बच्चन का सान्निध्य विशेष महत्त्व रखता है। बच्चन जैसे प्रतिष्ठित कवि के साथ उनका संबंध केवल व्यक्तिगत निकटता का प्रसंग नहीं, बल्कि उस दौर के इलाहाबाद के जीवंत साहित्यिक वातावरण की झलक भी देता है। डॉ. धर्मवीर भारती और डॉ. जगदीश गुप्त जैसे साहित्यकारों से उनकी मित्रता उनके व्यापक साहित्यिक संपर्क-संसार को प्रमाणित करती है। गोपेश का जीवन एक स्थान या एक संस्था तक सीमित नहीं रहा। आकाशवाणी इलाहाबाद से उनकी साहित्यिक-व्यावसायिक यात्रा प्रारंभ हुई; वहाँ से वे कलकत्ता गए और फिर मास्को पहुँचे। रेडियो मास्को में डेपुटेशन पर कार्य करना उनके जीवन का निर्णायक चरण था। बाद में वे दिल्ली लौटे और फिर इलाहाबाद तथा दिल्ली विश्वविद्यालयों में रूसी भाषा का अध्यापन किया। मास्को विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन और प्रतिष्ठित प्रगति प्रकाशन से उनका संबंध उनके व्यक्तित्व को भारतीय और रूसी साहित्यिक संसारों के बीच एक सक्रिय सांस्कृतिक माध्यम में परिवर्तित करता है। यही कारण है कि गोपेश को केवल ‘कवि’ कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे मूलतः बहुभाषिक सांस्कृतिक चेतना के रचनाकार थे।        
             ‘गोपेश समग्र’ में सम्मिलित ‘गोपेश की प्रयोगधर्मी कविताएँ’ संबंधी सामग्री विशेष ध्यान आकर्षित करती है। गोपेश के लिए कविता केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भाषा और अनुभव के बीच नए संबंधों की खोज भी थी।
उनके काव्य में आधुनिक मनुष्य की बेचैनी, सामाजिक विडंबना, प्रेम, स्मृति, समय और मनुष्य के अस्तित्व से जुड़े प्रश्न विभिन्न स्तरों पर अभिव्यक्त होते हैं। वे कविता को किसी स्थिर शिल्प में बाँधने के बजाय उसके अनुभव-क्षेत्र को विस्तृत करने का प्रयत्न करते दिखाई देते हैं। यही प्रयोगशीलता आगे चलकर उनके अनुवाद और गद्य-लेखन में भी दिखाई देती है। इसलिए गोपेश के काव्य और अनुवाद को दो अलग-अलग खानों में रखकर देखना उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को अधूरा समझना होगा।   
                 गोपेश के साहित्यिक व्यक्तित्व की सबसे विशिष्ट उपलब्धि उनका अनुवाद-कर्म है। यदि उनकी कविता उन्हें हिन्दी साहित्य के भीतर स्थापित करती है, तो उनका अनुवाद-कर्म उन्हें विश्व-साहित्य के साथ हिन्दी के सर्जनात्मक संवाद का महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि बनाता है। उन्होंने रूसी साहित्य के अनेक महत्त्वपूर्ण लेखकों और कृतियों का हिन्दी में अनुवाद किया। शोलोखोव, दोस्तोएव्स्की, अनातोली कुज़्नेत्सोव आदि के साहित्य को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाने में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘इंसान का नसीबा’, ‘धीरे बहो दोन रे’, ‘रातें रुपहली दिन-सी’, ‘दास्तान-ए-नसरुद्दीन’ जैसी कृतियाँ उनके अनुवाद-संसार की व्यापकता का परिचय देती हैं। यहाँ गोपेश का महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने विदेशी साहित्य का हिन्दी में रूपांतरण किया। उनका वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने दो भिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संसारों के बीच संवेदनात्मक संवाद स्थापित किया। अनुवाद उनके लिए शब्दों का स्थानांतरण नहीं, बल्कि संस्कृतियों का संवाद था। रूसी समाज, वहाँ का इतिहास, वहाँ का मनुष्य, संघर्ष, युद्ध, प्रेम, सामाजिक परिवर्तन और सामूहिक जीवन—इन सबको हिन्दी पाठक के निकट लाने में उनका योगदान स्मरणीय है।
        इस दृष्टि से गोपेश को हिन्दी के उन अनुवादकों की परंपरा में रखना चाहिए जिन्होंने भारतीय भाषिक संसार को विश्व-साहित्य से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया। मास्को में रहते हुए गोपेश जी का प्रगति प्रकाशन से जुड़ना उनके साहित्यिक जीवन की महत्त्वपूर्ण घटना है। प्रगति प्रकाशन उस दौर में सोवियत साहित्य को विभिन्न भाषाओं में पहुँचाने का प्रमुख माध्यम था। गोपेश की भाषिक क्षमता, हिन्दी की साहित्यिक समझ और रूसी भाषा-साहित्य से निकट परिचय ने उन्हें इस सांस्कृतिक प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाया। मास्को विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन का दायित्व भी उनके सांस्कृतिक व्यक्तित्व की दूसरी दिशा को सामने लाता है। वहाँ वे केवल रूसी साहित्य को हिन्दी में नहीं ला रहे थे, बल्कि हिन्दी भाषा और भारतीय साहित्य को रूसी पाठकों तथा विद्यार्थियों तक पहुँचाने का कार्य भी कर रहे थे। इस प्रकार उनकी भूमिका एकतरफा अनुवादक की नहीं, बल्कि द्विमुखी सांस्कृतिक दूत की थी। यही ‘गंगा से वोल्गा’ और ‘वोल्गा से गंगा’ के बीच उनकी वास्तविक साहित्यिक यात्रा है।
             ‘गोपेश समग्र’ का तीसरा खंड ‘गोपेश का गद्य-संसार’ उनके व्यक्तित्व की एक ऐसी दुनिया खोलता है जो केवल कविता और अनुवाद से संभव नहीं थी। ‘अपनी बात : हिन्दी भाषा और उसका साहित्य’, ‘साहित्यिक कृतियों के अनुवाद का दायित्व-बोध’, ‘रूस का साहित्यिक जगत’ जैसे लेख गोपेश की साहित्यिक दृष्टि और भाषिक विचारों को समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से ‘साहित्यिक कृतियों के अनुवाद का दायित्व-बोध’ शीर्षक उनके अनुवाद-दर्शन की ओर संकेत करता है। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि वे अनुवाद को किस प्रकार की नैतिक और साहित्यिक जिम्मेदारी मानते थे। यह विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। अच्छा अनुवाद मूल रचना की आत्मा को नष्ट किए बिना उसे दूसरी भाषा के स्वाभाविक संस्कारों में पुनर्जीवित करता है। गोपेश का अनुवाद-कर्म इस सिद्धांत का व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।    
               समग्र में ‘अविस्मरणीय-अविस्मरणीय : संस्मरण’ शीर्षक से प्रस्तुत सामग्री का महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि यहाँ साहित्यिक इतिहास के साथ निजी स्मृति जुड़ जाती है। मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, निराला, टैगोर आदि से संबंधित स्मृति-लेखों की उपस्थिति गोपेश के व्यापक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संपर्क संसार को सामने लाती है। संस्मरण साहित्य की विशेषता यह है कि वह इतिहास की औपचारिक भाषा के पीछे छिपे मनुष्य को सामने लाता है। साहित्यकारों के व्यक्तित्व, उनके व्यवहार, संबंधों और साहित्यिक वातावरण को समझने में ऐसे संस्मरण अत्यंत उपयोगी होते हैं। इस दृष्टि से ‘गोपेश समग्र’ केवल गोपेश का दस्तावेज नहीं रह जाता; वह बीसवीं शताब्दी के हिन्दी साहित्यिक संसार का भी एक सहायक दस्तावेज बन जाता है। 
            समग्र में ‘डायरी के पृष्ठ : जब तब सोचा, जब तब लिखा’ और ‘चिट्ठी-पत्री : खूब लिखे, खूब पाए खत’ जैसे खंड अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। डायरी किसी लेखक के भीतर चलने वाली मानसिक प्रक्रिया का प्रत्यक्ष दस्तावेज होती है। प्रकाशित रचना में लेखक अपने अनुभव को कलात्मक अनुशासन में प्रस्तुत करता है, जबकि डायरी में वह स्वयं से संवाद करता है। इसलिए गोपेश की डायरी उनके मानसिक संसार, यात्राओं, साहित्यिक चिंताओं और समय-बोध को समझने के लिए मूल्यवान स्रोत है। इसी प्रकार पत्नी, बेटी, बेटे, मित्र और शिष्य को लिखे गए पत्र गोपेश के निजी और आत्मीय व्यक्तित्व को सामने लाते हैं। इससे उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के पीछे मौजूद संवेदनशील मनुष्य दिखाई देता है। इन पत्रों का महत्त्व केवल भावनात्मक नहीं है। ये तत्कालीन साहित्यिक संबंधों, पारिवारिक संरचना, यात्राओं, संस्थागत जीवन और लेखक की दिनचर्या के अध्ययन के लिए भी उपयोगी प्राथमिक सामग्री हैं।
            ‘यात्रा संस्मरण : चले तो फिर रुके नहीं…’ में मास्को और लंदन से संबंधित अनुभव तथा यात्रा-संस्मरण गोपेश के विश्व-दृष्टि के विस्तार को सामने लाते हैं। मास्को उनके लिए केवल एक विदेशी नगर नहीं था। वह उनके जीवन और साहित्य के लिए एक निर्णायक सांस्कृतिक अनुभव था। रूसी समाज, वहाँ की साहित्यिक संस्थाएँ, भाषा, विश्वविद्यालय, प्रकाशन-संस्कृति और सामान्य जीवन से परिचय ने उनकी दृष्टि को व्यापक बनाया। इसलिए उनके यात्रा-वृत्तांतों को केवल यात्रा-विवरण की दृष्टि से पढ़ना उचित नहीं होगा। उनमें एक भारतीय साहित्यकार द्वारा दूसरे सांस्कृतिक संसार को देखने और समझने की प्रक्रिया दर्ज है।
             ‘गोपेश समग्र’ का चौथा खंड—‘आवाज़ की दुनिया में, गोपेश की आवाज़’—उनकी रेडियो-यात्रा को सामने लाता है। आकाशवाणी इलाहाबाद, कलकत्ता, रेडियो मास्को और बाद में रेडियो दिल्ली से उनका संबंध यह बताता है कि वे मुद्रित साहित्य तक सीमित लेखक नहीं थे। रेडियो ने उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को एक अलग माध्यम प्रदान किया। आवाज़, संवाद, श्रव्य भाषा और तत्काल संप्रेषण की क्षमता ने उनके साहित्यिक संस्कार को निश्चित रूप से प्रभावित किया होगा। ‘रेडियो एकलाप’, ‘रेडियो फीचर्स’ और अन्य सामग्री इस पक्ष को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है। आज जब साहित्य और संचार माध्यमों के अंतर्संबंध पर गंभीर अध्ययन हो रहा है, गोपेश का रेडियो-कर्म शोध का एक स्वतंत्र विषय बन सकता है।
             समग्र में ‘हास्य-व्यंग्य तथा अन्य रचनाएँ’ का पृथक खंड भी गोपेश के रचनात्मक व्यक्तित्व की विविधता का प्रमाण है। ‘मनुष्य में है निर्माण की शक्ति’, ‘पतझर आ गया, बसंत आने को है’, ‘आधी रात’, ‘बच्चन जी मॉस्को गए’, ‘मॉस्को और मार्फिया’, ‘गोपेश जी नहीं रहे’ जैसी रचनाओं से स्पष्ट होता है कि उनकी दृष्टि गंभीर साहित्यिक विमर्श के साथ जीवन की विडंबनाओं और हास्यपूर्ण स्थितियों को भी ग्रहण करती थी।
यह पक्ष उनके व्यक्तित्व को और अधिक मानवीय बनाता है। एक गंभीर कवि और अनुवादक के भीतर मौजूद विनोद-बोध और आत्मपरकता को समझे बिना गोपेश की सम्पूर्ण रचनात्मकता का मूल्यांकन संभव नहीं है।
           ‘गोपेश समग्र’ की एक विशेष उपलब्धि यह है कि इसमें केवल प्रकाशित रचनाओं को ही स्थान नहीं दिया गया, बल्कि अपूर्ण और अप्रकाशित सामग्री को भी सुरक्षित किया गया है। ‘वे बेचारे’, ‘डायरी बर्फ के फूलों की : मॉस्को में रोज-ब-रोज’ जैसी सामग्री इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। किसी लेखक की अपूर्ण रचनाएं उसके साहित्यिक विकास की प्रक्रिया को समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती हैं। वे बतातीं हैं कि लेखक किन विषयों की ओर आकर्षित था, किन परियोजनाओं पर काम कर रहा था और उसकी रचनात्मक दिशा किस ओर जा रही थी। इसलिए अप्रकाशित सामग्री का समावेश ‘गोपेश समग्र’ को मात्र चयनित रचनाओं के संकलन से आगे ले जाकर साहित्यिक अभिलेख का स्वरूप प्रदान करता है।
               गोपेश के साहित्य का मूल्यांकन करते हुए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हिन्दी साहित्य में उनका विशिष्ट स्थान कहाँ निर्धारित किया जाए। इसका उत्तर उनके हिन्दी-रूसी साहित्यिक सेतु की भूमिका में निहित है। एक ओर वे हिन्दी के कवि हैं, दूसरी ओर रूसी भाषा के अध्यापक; एक ओर वे हिन्दी में मूल रचना करते हैं, दूसरी ओर रूसी साहित्य का अनुवाद करते हैं; एक ओर वे मास्को में हिन्दी पढ़ाते हैं, दूसरी ओर रूसी साहित्य को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाते हैं। इस द्वंद्वात्मक स्थिति ने उनके व्यक्तित्व को असाधारण व्यापकता दी। उनका साहित्य भारतीय साहित्य की आत्मनिर्भरता को बनाए रखते हुए विश्व-साहित्य के साथ संवाद की आवश्यकता को स्वीकार करता है। इस अर्थ में गोपेश भारतीय आधुनिकता के उस रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं जो विदेशी साहित्य का अनुकरण नहीं करता, बल्कि उससे संवाद करता है।
             ‘गोपेश समग्र’ का महत्त्व कम-से-कम पाँच स्तरों पर रेखांकित किया जा सकता है—पहला, यह गोपेश के मूल साहित्य को एक जगह उपलब्ध कराता है। दूसरा, यह उनके अनुवाद-कर्म को उनके मूल लेखन के समान महत्त्व प्रदान करता है। तीसरा, संस्मरण, डायरी और पत्रों के माध्यम से उनके निजी जीवन और साहित्यिक संबंधों का दस्तावेज प्रस्तुत करता है। चौथा, रेडियो और अध्यापन से जुड़े उनके जीवन को साहित्यिक व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा मानता है। पाँचवाँ, हिन्दी-रूसी सांस्कृतिक संबंधों के इतिहास के लिए प्राथमिक सामग्री उपलब्ध कराता है। इस दृष्टि से ‘गोपेश समग्र’ पर जीवनी, साहित्येतिहास, अनुवाद-विज्ञान, तुलनात्मक साहित्य, मीडिया-अध्ययन और सांस्कृतिक इतिहास—इन सभी क्षेत्रों से शोध संभव है।
             समग्र रूप में कहा जा सकता है कि ‘गोपेश समग्र’ किसी एक कवि की रचनाओं का संचयन मात्र नहीं, बल्कि एक ऐसे साहित्यिक व्यक्तित्व का पुनराविष्कार है जिसने हिन्दी को अपनी मातृभाषिक संवेदना के साथ रूसी और विश्व-साहित्य की व्यापक भूमि से जोड़ा। गोपी कृष्ण ‘गोपेश’ का जीवन एक साहित्यिक यात्रा की तरह दिखाई देता है—बरेली से इलाहाबाद, इलाहाबाद से कलकत्ता, कलकत्ता से मास्को और फिर दिल्ली-इलाहाबाद तक; कविता से रेडियो तक, रेडियो से अध्यापन तक और अध्यापन से अनुवाद तक। उनकी यह यात्रा भौगोलिक जितनी है, उससे कहीं अधिक बौद्धिक और सांस्कृतिक यात्रा है। उनके लिए हिन्दी केवल अभिव्यक्ति की भाषा नहीं थी; वह विश्व-साहित्य से संवाद की भाषा भी थी। रूसी साहित्य केवल अनुवाद की सामग्री नहीं था; वह मनुष्य और समाज को समझने की एक दूसरी खिड़की था। इसी कारण शोलोखोव, दोस्तोएव्स्की और अन्य रूसी रचनाकारों को हिन्दी में लाने का उनका कार्य हिन्दी साहित्य के विकास की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है। ‘गोपेश समग्र’ एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व को पुनः हिन्दी साहित्य के केंद्र में लाने की सार्थक पहल है। इसमें कविता है, आलोचना है, अनुवाद है, संस्मरण है, डायरी है, पत्र हैं, यात्रा है, रेडियो है, हास्य-व्यंग्य है और सबसे बढ़कर एक ऐसे मनुष्य की जीवंत उपस्थिति है जिसने अपने समय को केवल जिया नहीं, बल्कि विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के बीच उसे समझने और समझाने का प्रयास भी किया। इस अर्थ में गोपेश की सबसे बड़ी पहचान शायद ‘कवि’ या ‘अनुवादक’ भर नहीं, बल्कि संस्कृतियों के बीच सेतु निर्मित करने वाले साहित्यकार की है। उन्होंने हिन्दी की सीमाओं को तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें विश्व-साहित्य की ओर विस्तारित किया। उनकी साहित्यिक यात्रा सचमुच गंगा से वोल्गा और वोल्गा से पुनः गंगा तक की सांस्कृतिक यात्रा है।
              आज जब अनुवाद को भारतीय भाषाओं और विश्व-साहित्य के बीच संवाद का केंद्रीय माध्यम माना जा रहा है, तब गोपेश का पुनर्पाठ और ‘गोपेश समग्र’ का गंभीर अध्ययन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यह समग्र न केवल गोपेश के साहित्यिक अवदान का पुनर्मूल्यांकन करता है, बल्कि हमें यह भी स्मरण कराता है कि साहित्य की वास्तविक शक्ति भाषाई सीमाओं को पार करके मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने में निहित है। इस दृष्टि से ‘गोपेश समग्र’ हिन्दी साहित्य की स्मृति में एक महत्त्वपूर्ण पुनर्स्थापनात्मक कृति है—जो गोपेश को विस्मृति से निकालकर हिन्दी के आधुनिक साहित्यिक इतिहास में उनका अधिक न्यायपूर्ण और व्यापक स्थान निर्धारित करने की आधारभूमि तैयार करती है।
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(रविनंदन सिंह)

रंगमंच / अभिनय क़ि कला /अजामिल


रंगमंच

जहाँ अभिनय ज़िंदगी है

अभिनय : जीवन की अनिवार्य कला

अजामिल

मनुष्य के जीवन में अभिनय कब प्रवेश करता है? क्या वह तब, जब कोई बच्चा पहली बार मंच पर खड़ा होकर किसी राजा, किसान, पक्षी या किसी कहानी के पात्र की भूमिका निभाता है? या तब, जब कोई कलाकार रोशनी से भरे मंच पर किसी दूसरे मनुष्य का जीवन जीने लगता है?

शायद दोनों ही सवालों का उत्तर नहीं है।

अभिनय हमारे जीवन में उससे बहुत पहले आ चुका होता है। सच तो यह है कि हम जन्म के साथ ही अभिव्यक्ति की एक ऐसी यात्रा शुरू कर देते हैं, जिसमें अभिनय किसी बाहरी कला की तरह नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक भाषा की तरह हमारे साथ चलता है।

बच्चा रोकर अपनी भूख बताता है, मुस्कराकर अपनेपन का संकेत देता है, किसी की नकल करके उसे समझने की कोशिश करता है। थोड़ा बड़ा होता है तो माँ-बाप की चाल, बोलने का ढंग, शिक्षक की आवाज़, किसी अभिनेता की शैली या किसी प्रिय व्यक्ति के हाव-भाव की नकल करने लगता है। वह खेल-खेल में डॉक्टर बनता है, शिक्षक बनता है, पुलिसवाला बनता है, दुकानदार बनता है। वह अभिनय कर रहा होता है, लेकिन उसे पता नहीं होता कि वह अभिनय कर रहा है।

यहीं से मनुष्य और अभिनय का संबंध शुरू होता है।

क्या जीवन स्वयं एक रंगमंच है?

हम प्रायः कहते हैं कि फलाँ व्यक्ति बहुत अच्छा अभिनेता है। लेकिन जीवन में ऐसे कितने ही अवसर आते हैं, जब हम सभी किसी न किसी भूमिका में होते हैं।

घर में हमारी भूमिका अलग होती है, मित्रों के बीच अलग, कार्यस्थल पर अलग और सार्वजनिक जीवन में अलग। किसी बुजुर्ग से मिलते समय हमारा व्यवहार कुछ और होता है, छोटे बच्चे के साथ कुछ और। दुख में हम अपने चेहरे को नियंत्रित करते हैं, खुशी में खुलकर मुस्कराते हैं और किसी गंभीर परिस्थिति में अपनी भावनाओं को रोकने की कोशिश करते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा जीवन झूठ है।

बल्कि इसका अर्थ यह है कि मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार अपनी अभिव्यक्ति को बदलने की क्षमता रखता है।

अभिनय का सबसे गहरा अर्थ शायद यही है—अपने भीतर के भाव को परिस्थिति और सामने वाले व्यक्ति तक पहुँचाने की क्षमता।

हम बोलते हैं तो केवल शब्द नहीं बोलते। हमारी आँखें बोलती हैं, चेहरा बोलता है, हाथ बोलते हैं, शरीर की मुद्रा बोलती है और कभी-कभी हमारी चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है।

किसी से कहना—“मैं ठीक हूँ”—और वास्तव में ठीक होना, दोनों अलग बातें हो सकती हैं। सामने वाला हमारे शब्दों से अधिक हमारे चेहरे और आवाज़ से यह समझ सकता है कि हम सचमुच ठीक हैं या नहीं।

यही अभिनय और जीवन के बीच का अद्भुत संबंध है।

अभिनय की पहली पाठशाला—नकल

बच्चा अपने आसपास की दुनिया को नकल के माध्यम से समझता है। वह माता-पिता को देखकर बोलना सीखता है, चलना सीखता है, व्यवहार सीखता है। परिवार उसका पहला रंगमंच है और परिवार के लोग उसके पहले अभिनेता।

वह पिता की तरह अखबार पढ़ने का अभिनय करता है। माँ की तरह किसी को डाँटता है। शिक्षक की तरह पढ़ाता है। डॉक्टर की तरह खिलौने की जाँच करता है।

यह केवल खेल नहीं है। यह सीखने की प्रक्रिया है।

विज्ञान ने भी imitation यानी अनुकरण को मनुष्य के सामाजिक व्यवहार और सीखने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना है। न्यूरोसाइंस में जिस मिरर न्यूरॉन सिस्टम पर लंबे समय से शोध हुआ है, वह यह समझने में मदद करता है कि किसी दूसरे व्यक्ति की क्रिया को देखकर हमारे मस्तिष्क में उससे संबंधित प्रक्रियाएँ सक्रिय हो सकती हैं। अनुकरण और सामाजिक समझ के बीच संबंध पर शोध लगातार जारी है।

इसलिए बच्चे की नकल को केवल नकल समझ लेना उसके महत्व को छोटा कर देना है। वह नकल के माध्यम से दुनिया में प्रवेश कर रहा होता है।

लेकिन यही बात एक चेतावनी भी देती है।

बच्चे वही नहीं सीखते जो हम उन्हें सिखाते हैं। वे बहुत कुछ वह भी सीखते हैं जो वे हमें करते हुए देखते हैं।

इसलिए बच्चों के सामने हमारा व्यवहार भी एक तरह का अभिनय है—और कई बार सबसे प्रभावशाली अभिनय।

अभिनय बनाम बनावटीपन

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है—अभिनय और बनावटीपन एक चीज़ नहीं हैं।

किसी व्यक्ति से जब कहा जाता है—“इतनी एक्टिंग मत करो”—तो अक्सर उसका अर्थ होता है कि उसका व्यवहार स्वाभाविक नहीं लग रहा। वह कुछ ऐसा करने की कोशिश कर रहा है, जो उसके भीतर से नहीं आ रहा।

रंगमंच पर भी यही अंतर अभिनेता और केवल अभिनय करने वाले व्यक्ति के बीच दिखाई देता है।

अच्छा अभिनेता भावनाओं की नकल नहीं करता; वह भावनाओं को समझता है। वह पात्र के भीतर प्रवेश करता है। वह यह जानने की कोशिश करता है कि यह आदमी ऐसा क्यों बोल रहा है, इस परिस्थिति में ऐसा क्यों कर रहा है, उसके भीतर कौन-सा डर, प्रेम, अहंकार, अपराधबोध या इच्छा काम कर रही है।

तभी अभिनय नैसर्गिक लगता है।

अभिनय की सफलता इस बात में नहीं है कि अभिनेता हमें यह भूलने पर मजबूर कर दे कि वह अभिनय कर रहा है। सफलता तब है, जब कुछ देर के लिए हमें यह महसूस होने लगे कि हम किसी पात्र को देख नहीं रहे, उसका जीवन देख रहे हैं।

यही रंगमंच का जादू है।

अभिनेता असल में जीवन का पर्यवेक्षक होता है

अच्छा अभिनेता केवल अभिनय नहीं करता। वह जीवन को देखता है।

बस में बैठे आदमी को देखता है। चाय की दुकान पर बातचीत करते लोगों को देखता है। अस्पताल के गलियारे में प्रतीक्षा करती आँखों को देखता है। बाजार में मोलभाव करती महिला को देखता है। बूढ़े आदमी की चाल देखता है। बच्चे की जिद देखता है। किसी प्रेम में पड़े व्यक्ति की आवाज़ में आया परिवर्तन देखता है।

वह इन छोटी-छोटी चीज़ों को अपने भीतर जमा करता रहता है।

इसलिए अभिनय की पहली शर्त शायद संवाद याद करना नहीं, जीवन को देखना है।

जो आदमी जीवन को गहराई से नहीं देखता, वह अभिनय में बाहरी मुद्राएँ तो पैदा कर सकता है, लेकिन मनुष्य पैदा नहीं कर सकता।

रंगमंच का अभिनेता जब किसी बूढ़े व्यक्ति की भूमिका निभाता है तो केवल झुककर चलना पर्याप्त नहीं है। उसे यह समझना होगा कि बूढ़े होने का अनुभव क्या है—शरीर की गति धीमी होने के साथ दुनिया का व्यवहार कैसे बदलता है, स्मृतियाँ कैसे वर्तमान में लौटती हैं, अकेलापन कैसा लगता है और अपने ही परिवार में अप्रासंगिक हो जाने का डर क्या होता है।

यहीं अभिनय कला से आगे बढ़कर मनुष्य को समझने की कला बन जाता है।

अभिनय और संवेदना

अभिनय की असली जान तकनीक नहीं, संवेदना है।

चेहरा बनाना सीखा जा सकता है। आवाज़ का उतार-चढ़ाव सीखा जा सकता है। चलने का ढंग सीखा जा सकता है। मंच पर खड़े होने की तकनीक सीखी जा सकती है। लेकिन किसी दूसरे मनुष्य के दुख को महसूस करने की क्षमता केवल तकनीकी प्रशिक्षण से नहीं आती।

अभिनेता को अपने भीतर संवेदनाओं का संसार जीवित रखना पड़ता है।

इसी कारण अभिनय का संबंध empathy यानी सहानुभूतिपूर्ण समझ से भी जोड़ा गया है। कुछ शोधों में अभिनय प्रशिक्षण और भावनाओं को पहचानने तथा व्यक्त करने की क्षमता के बीच सकारात्मक संबंधों के संकेत मिले हैं। 2026 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा ने 32 शोध-पत्रों की समीक्षा करते हुए पाया कि अभिनय-आधारित हस्तक्षेपों का उपयोग शिक्षा, कार्यस्थल और अन्य क्षेत्रों में भाव-पहचान तथा भाव-अभिव्यक्ति जैसी क्षमताओं के विकास के लिए किया गया है, हालांकि शोध की गुणवत्ता और परिणामों में पर्याप्त विविधता भी मौजूद है।

अर्थात अभिनय के प्रभाव को लेकर अतिशयोक्ति से बचना चाहिए, लेकिन यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि अभिनय हमें भावनाओं को पहचानने और व्यक्त करने की बेहतर समझ दे सकता है।

अभिनय केवल अभिनेता के लिए नहीं

यहीं से अभिनय की उपयोगिता रंगमंच से बाहर निकलती है।

एक डॉक्टर के लिए अभिनय का अर्थ मरीज को धोखा देना नहीं, बल्कि उसकी स्थिति के अनुरूप संवेदनशील संवाद करना हो सकता है। शिक्षक के लिए अभिनय का अर्थ बच्चे की मानसिक अवस्था को समझते हुए अपनी आवाज़ और व्यवहार को बदलना हो सकता है। किसी प्रबंधक के लिए कठिन परिस्थिति में आत्मविश्वास बनाए रखना भी एक तरह का प्रदर्शन है।

वकील, पत्रकार, राजनेता, अध्यापक, चिकित्सक, विक्रेता, अभिभावक—कौन है जिसे लोगों के सामने स्वयं को प्रभावी ढंग से व्यक्त नहीं करना पड़ता?

यहाँ अभिनय छल नहीं है। यह संचार की कला है।

अभिनय हमें सिखाता है कि सामने वाले व्यक्ति तक केवल शब्द नहीं पहुँचते। आवाज़, विराम, चेहरे की मुद्रा, आँखों का संपर्क, शरीर की स्थिति और परिस्थिति की समझ भी संचार का हिस्सा हैं।

इसीलिए अभिनय को व्यक्तित्व-विकास की एक महत्वपूर्ण कला माना जा सकता है।

शिक्षा में अभिनय क्यों जरूरी है?

आज हमारी शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को जानकारी देने पर बहुत जोर है। वे गणित सीखते हैं, विज्ञान सीखते हैं, भाषा सीखते हैं, कंप्यूटर सीखते हैं। लेकिन क्या वे अपने विचार व्यक्त करना भी सीखते हैं? क्या वे असहमति को सभ्य ढंग से व्यक्त करना सीखते हैं? क्या वे दूसरे व्यक्ति की स्थिति को समझना सीखते हैं? क्या वे असफल होने के बाद फिर से सामने खड़े होना सीखते हैं?

अभिनय इन प्रश्नों के बीच एक उपयोगी रास्ता खोल सकता है।

2026 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 27 अध्ययनों और 2,239 प्रतिभागियों के आधार पर शैक्षिक ड्रामा के रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, संचार और सहयोग जैसी क्षमताओं पर संभावित सकारात्मक प्रभाव पाए गए। शोधकर्ताओं ने साथ ही यह सावधानी भी दर्ज की कि अध्ययनों के बीच पर्याप्त भिन्नता थी और परिणामों की व्याख्या सावधानी से की जानी चाहिए।

इस सावधानी को ध्यान में रखते हुए भी यह विचार महत्वपूर्ण है कि स्कूल में अभिनय केवल वार्षिक उत्सव का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए।

बच्चों को अभिनय करने दिया जाए।

उन्हें छोटी-छोटी परिस्थितियाँ दी जाएँ—दो मित्रों का झगड़ा, किसी बुजुर्ग से बातचीत, दुकान पर ग्राहक और दुकानदार, शिक्षक और विद्यार्थी, किसी समस्या का समाधान।

फिर उनसे पूछा जाए—तुम्हें क्या महसूस हुआ?

यहीं अभिनय शिक्षा बन जाता है।

अभिनय आत्मविश्वास देता है, लेकिन उससे अधिक भी देता है

मंच पर पहली बार खड़ा होना किसी बच्चे के लिए आसान नहीं होता। सामने बैठे लोगों की निगाहें उसे असहज कर सकती हैं। आवाज़ काँप सकती है। संवाद भूल सकता है।

लेकिन धीरे-धीरे वही बच्चा सीखता है कि गलती होने के बाद भी आगे बोला जा सकता है।

यह सीख मंच से कहीं बड़ी है।

जीवन में भी हम संवाद भूलते हैं, निर्णय गलत करते हैं, संबंधों में असफल होते हैं, नौकरी में असफल होते हैं, कभी अपने ही शब्दों में उलझ जाते हैं। लेकिन मंच हमें सिखाता है कि दृश्य समाप्त नहीं हुआ है। अगला संवाद अभी बाकी है।

अभिनय का यह पाठ जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अभिनय और मानसिक स्वास्थ्य

आज अकेलापन, सामाजिक अलगाव, चिंता और भावनात्मक दबाव आधुनिक जीवन की गंभीर चुनौतियों में शामिल हैं। ऐसे समय में रचनात्मक गतिविधियों की भूमिका पर दुनिया भर में शोध हो रहा है।

लेकिन यहाँ भी हमें सावधान रहना चाहिए। अभिनय को हर मानसिक समस्या का इलाज कहना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

हाँ, इतना जरूर कहा जा सकता है कि अभिनय व्यक्ति को अपने भीतर की भावनाओं को पहचानने, व्यक्त करने, दूसरे के दृष्टिकोण को समझने और समूह के साथ काम करने का अवसर देता है। अभिनय-आधारित गतिविधियों पर हुए शोधों में भावनात्मक कौशल और सामाजिक क्षमताओं से जुड़े संभावित लाभ सामने आए हैं, हालांकि सभी अध्ययनों के परिणाम एक जैसे नहीं हैं।

शायद अभिनय की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक शक्ति यह है कि वह हमें कुछ देर के लिए अपने ही जीवन से बाहर निकलकर किसी दूसरे जीवन को देखने का अवसर देता है।

और किसी दूसरे के जीवन को समझते-समझते हम कई बार अपने जीवन को भी बेहतर समझने लगते हैं।

मंच पर दूसरा व्यक्ति बनकर हम स्वयं को खोजते हैं

यह अभिनय का सबसे सुंदर विरोधाभास है।

हम किसी और का पात्र निभाते हैं और धीरे-धीरे अपने बारे में जानने लगते हैं।

किसी कायर पात्र को निभाते हुए हमें अपने भीतर का डर दिखाई दे सकता है। किसी क्रूर पात्र को निभाते हुए अपने भीतर छिपी कठोरता का अहसास हो सकता है। किसी प्रेमी की भूमिका करते हुए अपने भीतर का प्रेम सामने आ सकता है। किसी वृद्ध की भूमिका करते हुए भविष्य का अपना चेहरा दिखाई दे सकता है।

इसलिए अभिनय आत्म-खोज भी है।

मंच पर खड़ा अभिनेता केवल दर्शकों के सामने नहीं खड़ा होता। वह अपने भीतर भी खड़ा होता है।

हर मनुष्य में एक अभिनेता

हममें से हर व्यक्ति में एक अभिनेता छिपा हुआ है।

कोई मंच पर आता है, कोई नहीं आता। कोई कैमरे के सामने सहज होता है, कोई लोगों के बीच बोलने से घबराता है। लेकिन अपने जीवन की परिस्थितियों में हम सभी भूमिकाएँ निभाते हैं।

बेटा, बेटी, पिता, माँ, पति, पत्नी, मित्र, शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी, पड़ोसी—ये सभी सामाजिक भूमिकाएँ हैं।

समस्या अभिनय करने में नहीं है।

समस्या तब पैदा होती है जब हम इतनी भूमिकाएँ निभाते-निभाते यह भूल जाते हैं कि इन भूमिकाओं के पीछे हमारा अपना चेहरा कौन-सा है।

रंगमंच इसीलिए हमें अपने भीतर लौटने का रास्ता भी देता है।

वह पूछता है—तुम कौन हो?

तुम्हारा पात्र कौन है और तुम स्वयं कौन हो?

तुम जो बोल रहे हो, वह तुम्हारी आवाज़ है या किसी और से सीखी हुई आवाज़?

तुम जिस तरह जी रहे हो, वह तुम्हारा चुनाव है या समाज की अपेक्षाओं का अभिनय?

ये प्रश्न अभिनय को केवल मनोरंजन की कला से बहुत आगे ले जाते हैं।

नकल से नैसर्गिकता तक

बच्चा नकल से शुरू करता है।

कलाकार अवलोकन तक पहुँचता है।

फिर अभ्यास आता है।

और अंततः एक ऐसी अवस्था आती है जहाँ अभिनय अभिनय जैसा दिखाई ही नहीं देता।

यही नैसर्गिकता है।

लेकिन नैसर्गिकता का अर्थ अभ्यास का अभाव नहीं है। उलटे, मंच की सहजता के पीछे असंख्य अभ्यास छिपे होते हैं।

अच्छा अभिनेता इतना अभ्यास करता है कि अभ्यास अंततः दिखाई देना बंद हो जाता है।

जैसे अच्छा लेखक भाषा को इतना साध लेता है कि पाठक को भाषा दिखाई नहीं देती, केवल विचार दिखाई देते हैं।

अच्छा अभिनेता भी तकनीक को इतना आत्मसात कर लेता है कि दर्शक को तकनीक नहीं, मनुष्य दिखाई देता है।

रंगमंच हमें मनुष्य के करीब लाता है

आज स्क्रीन हमारे जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुकी है। हम अभिनय देखते हैं, वीडियो देखते हैं, रील देखते हैं, चेहरे देखते हैं, लेकिन वास्तविक मनुष्य से संवाद का समय कम होता जा रहा है।

रंगमंच इस दूरी को तोड़ता है।

वहाँ अभिनेता और दर्शक एक ही समय, एक ही स्थान और एक ही हवा में मौजूद होते हैं।

अभिनेता की साँस दर्शक तक पहुँचती है। दर्शक की प्रतिक्रिया अभिनेता तक पहुँचती है। एक छोटी-सी चुप्पी भी दोनों के बीच साझा अनुभव बन जाती है।

शायद इसी कारण रंगमंच आज भी जीवित है।

सिनेमा को तकनीक ने बहुत आगे पहुँचा दिया है। डिजिटल माध्यम ने मनोरंजन की दुनिया बदल दी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अभिनय की छवियाँ और आवाज़ें तक बना सकती है। फिर भी जीवंत मनुष्य का जीवंत मनुष्य के सामने खड़ा होना अपनी जगह अद्वितीय है।

क्योंकि रंगमंच पर केवल पात्र नहीं होता—मनुष्य उपस्थित होता है।

इसलिए अभिनय को जीवन की शिक्षा बनाना होगा

स्कूलों में अभिनय की कार्यशालाएँ हों। कॉलेजों में रंगमंच को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम न समझा जाए। कार्यालयों में संवाद और प्रस्तुति के प्रशिक्षण में नाट्य-अभ्यास का उपयोग किया जाए। बुजुर्गों के लिए सामुदायिक रंगमंच हो। बच्चों को कहानी कहने और भूमिका निभाने के अवसर दिए जाएँ।

लेकिन सबसे जरूरी है कि अभिनय को केवल स्टार बनने की सीढ़ी न माना जाए।

हर बच्चा अभिनेता बनने के लिए अभिनय नहीं करेगा।

उसे शायद डॉक्टर बनना हो, इंजीनियर बनना हो, किसान बनना हो, शिक्षक बनना हो या कोई और काम करना हो।

लेकिन उसे अपनी बात कहनी होगी।

दूसरे की बात सुननी होगी।

अपनी भावनाओं को समझना होगा।

किसी दूसरे के दुख को महसूस करना होगा।

असहमति के बावजूद संवाद करना होगा।

और सबसे बढ़कर—उसे स्वयं को समझना होगा।

इन सबके लिए अभिनय उपयोगी है।

अंत में...

अभिनय केवल मंच पर खड़े होकर किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन जीना नहीं है।

अभिनय जीवन को देखने की दृष्टि है।

यह शरीर की भाषा है, चेहरे की भाषा है, आवाज़ की भाषा है, संवेदनाओं की भाषा है।

यह नकल से शुरू हो सकता है, लेकिन उसका श्रेष्ठ रूप आत्म-अभिव्यक्ति है।

यह हमें दूसरों की तरह बनने से आगे ले जाकर यह पूछना सिखाता है कि हम वास्तव में कौन हैं।

शायद इसी अर्थ में जीवन भी एक रंगमंच है।

हम सब अपने-अपने दृश्य में प्रवेश करते हैं। कुछ संवाद बोलते हैं। कुछ संवाद भूल जाते हैं। कुछ पात्र हमें मिलते हैं और कुछ हमसे बिछड़ जाते हैं। कभी तालियाँ मिलती हैं, कभी आलोचना। कभी रोशनी हमारे ऊपर होती है, कभी हम अँधेरे में खड़े होते हैं।

लेकिन पर्दा गिरने तक अभिनय जारी रहता है।

और शायद जीवन की सबसे बड़ी कला यही है कि हम अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाएँ—इतनी ईमानदारी से कि अभिनय करते हुए भी अपने भीतर के मनुष्य को न खोएँ।

जीना ही अभिनय करना है—लेकिन अभिनय की अंतिम मंज़िल अभिनय नहीं, अपने वास्तविक मनुष्य तक पहुँचना है।

— अजामिल


Monday, September 14, 2026

हिंदी दिवस पर विशेष /अजामिल

वैश्विक प्रसार के बावजूद कई चुनौतियां

**अजामिल 


यह सही है कि विश्व स्तर पर हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। कई देशों में हिंदी बोलने-जानने वालों की संख्या बढ़ी है। भारतीय सिनेमा, डिजिटल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भी हिंदी को नई पहचान दी है। फिर भी, यह कहना गलत होगा कि हिंदी अपनी सभी बाधाएं पार कर चुकी है। वैश्विक प्रसार के बावजूद इसकी राह में कई चुनौतियां मौजूद हैं।


सबसे बड़ी चुनौती तो उच्च शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनने की है। भारत के अधिकांश प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कानून और वैज्ञानिक शोध की प्रमुख भाषा अब भी अंग्रेजी है। नई शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय भाषाओं में पठन-पाठन पर जोर जरूर दिया है, लेकिन हिंदी में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य-पुस्तकों, शोध-सामग्री व तकनीकी शब्दावली का अभाव आज भी महसूस किया जाता है। परिणामस्वरूप, अनेक विद्यार्थी रोजगार और शोध के लिए अंग्रेजी को अधिक उपयोगी मानते हैं।


दूसरी चुनौती डिजिटल गुणवत्ता की है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की मात्रा तो बढ़ी है, लेकिन उसकी गुणवत्ता समान रूप से विकसित नहीं हुई। अनेक सरकारी वेबसाइटें और तकनीकी सेवाएं हिंदी में अधूरी या कठिन भाषा का प्रयोग करती हैं। मशीनी अनुवाद तो कई बार अर्थ का अनर्थ कर देता है, जिससे प्रशासनिक और कानूनी दस्तावेजों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में उच्च गुणवत्ता वाले हिंदी डेटा और मानकीकृत भाषा संसाधनों की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।


तीसरी चुनौती अंतरराष्ट्रीय संस्थागत मान्यता की है। तमाम प्रयासों के बावजूद हिंदी अभी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा नहीं बन सकी है, जिसका अर्थ है कि हिंदी की लोकप्रियता और उसकी संस्थागत स्वीकार्यता में अभी भी खाई बनी हुई है।


एक महत्वपूर्ण सामाजिक चुनौती भाषायी संतुलन की है। गौरतलब है कि भारत एक बहुभाषी देश है, जहां तमिल, बांग्ला, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और अन्य भाषाओं की समृद्ध परंपरा है। कभी-कभी हिंदी के विस्तार को क्षेत्रीय भाषाओं के लिए चुनौती के रूप में देखा जाता है। वैसे, देखा जाए, तो बाजार और रोजगार का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उच्च पदों पर अंग्रेजी का प्रभुत्व बना हुआ है। हिंदी में उत्कृष्ट लेखन, अनुवाद, शोध और तकनीकी विशेषज्ञता रखने वालों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, परंतु उनकी संख्या और संस्थागत समर्थन अभी सीमित है। यदि हिंदी को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था से जोड़ना है, तो उद्योग और शिक्षा के बीच बेहतर समन्वय बनाना होगा।


सुजीत कुमार, टिप्पणीकार


दुनिया के लिए हिंदी अब अनजान नहीं


एक समय हिंदी को केवल भारत के उत्तरी हिस्से की भाषा माना जाता था, लेकिन आज यह देश-विदेश में संवाद, संस्कृति, शिक्षा और डिजिटल माध्यम की प्रमुख भाषाओं में शामिल हो गई है। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के प्रयोग, विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन या इंटरनेट पर हिंदी की सामग्रियों में तेज वृद्धि इस बात की पुष्टि करती है कि इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह अब केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रभावी माध्यम बन चुकी है। हिंदी दिवस (14 सितंबर) की सार्थकता इसी वजह से लगातार बढ़ रही है।


भारत में हिंदी सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, लगभग 44 प्रतिशत भारतीयों की मातृभाषा हिंदी है, जबकि करोड़ों लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया गया है। आज प्रशासन, न्याय, मीडिया, विज्ञापन और मनोरंजन उद्योग में हिंदी की स्वीकार्यता पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो गई है। हिंदी का दायरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में रह रही भारतीय आबादी हिंदी को जीवंत बनाए हुई है। मॉरीशस और फिजी में यह भाषा वहां की शिक्षा का औपचारिक हिस्सा बन चुकी है, जबकि हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड और टोक्यो विश्वविद्यालय जैसे कई विदेशी शिक्षण संस्थान हिंदी भाषा और भारतीय साहित्य के पाठ्यक्रम संचालित करने लगे हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन का नियमित आयोजन भी हिंदी के वैश्विक प्रचार का महत्वपूर्ण मंच बन गया है।


हिंदी की लोकप्रियता बढ़ाने में भारतीय सिनेमा और डिजिटल मंचों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। बॉलीवुड की फिल्में और हिंदी गीत दुनिया के अनेक देशों में लोकप्रिय हैं। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और यू-ट्यूब के जरिये हिंदी सामग्री करोड़ों दर्शकों तक पहुंच रही है। इन सबसे हिंदी के शब्द वैश्विक दर्शकों तक पहुंच रहे हैं। हालांकि, हिंदी को ऊर्जा डिजिटल क्रांति से भी मिली है। आज ग्रामीण भारत का बड़ा वर्ग इंटरनेट पर हिंदी में जानकारी प्राप्त करता है।


साफ है, हिंदी का संसार बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी कहा था, राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। आज यह विचार व्यापक अर्थ ले चुका है। आज हिंदी केवल राष्ट्र की आवाज नहीं, बल्कि विश्व मंच पर भारत की पहचान और संवाद का सशक्त माध्यम बन गई है.

**अजामिल 




Thursday, April 9, 2026

अविस्मरणीय मेरा सौभाग्य था नागार्जुन जी से मिलना

अविस्मरणीय 
मेरा सौभाग्य रहा 
नागार्जुन जी से मिलना...

 उन दिनों मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र था। क्रांति का मतलब मैं अच्छी तरह से समझता भी नहीं था, लेकिन विश्वविद्यालय का माहौल देश की तमाम छोटी - बड़ी ज्वलंत समस्याओं के निराकरण की मांग को लेकर उबल रहा था। बेरोजगारी उस समय भी चरम पर थी । छात्र इस बात से बहुत डरे हुए थे कि उनका कोई भविष्य नहीं है  । इलाहाबाद विश्वविद्यालय में क्रांतिकारी छात्रों के कई गुट अपनी - अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर सक्रिय थे और पोस्टर तथा नारेबाजी के जरिए यहां- वहां आंदोलन करते रहते थे । उसी समय बिहार में जयप्रकाश नारायण ने राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन छेड़ा था । इस आंदोलन को लगभग सभी राजनीतिक दलों का समर्थन मिला क्योंकि यह आंदोलन जिन मुद्दों को लेकर चलाया जा रहा था कमोबेश सभी राजनीतिक दल उससे सहमत थे। जयप्रकाश नारायण जी समर्थकों को लेकर के बिहार में जगह-  जगह आंदोलन कर रहे थे । पटना में भी इसकी सरगर्मी थी । इलाहाबाद के बहुत से छात्र आंदोलन में भाग लेने के उद्देश्य से पटना जा रहे थे । उसी में मैं भी अपनी -अच्छी बुरी राजनीतिक समझ के साथ छात्रों के साथ पटना गया था।
 उस आंदोलन में पहली बार मैंने नागार्जुन जी को मंच पर बैठे हुए देखा। नागार्जुन जी जनता को संबोधित नहीं करते थे बल्कि महत्वपूर्ण लोगों के भाषण शुरू होने से पहले नागार्जुन जी कविताएं सुनाकर एक माहौल बना देते थे ।  नागार्जुन जी जब इलाहाबाद आते थे तब वह या तो हिंदी साहित्य सम्मेलन के अतिथिगृह में रुकते थे या उस समय के बहुचर्चित कवि लेखक कहानीकार अजित पुष्कल जी के यहां उनका रुकना होता था । मैं उसी मोहल्ले में रहता था यानी कल्याणी देवी पर जहां अजित पुष्कल जी रहते थे। हम उनके यहां जाते तो हमारी मुलाकात नागार्जुन जी से होती । वहां भी उनके साथ साहित्य चर्चा चलती और नागार्जुन जी अपने अनुभव हम लोगों को सुनाते। यहां उनकी कविताएं सुनने का भी अवसर मिला । मेरे ससुर पंडित जगपति चतुर्वेदी के नागार्जुन जी मित्रों में थे । उनके घर आया - जाया करते थे । वहां भी कई बार नागार्जुन जी से मिलने का अवसर मिला ।नागार्जुन जी की कविताएं तो मुझे पसंद ही थी । सबसे ज्यादा अच्छा लगता था उनका व्यक्तित्व। एकदम जमीनी आदमी थे । जहां मन किया बैठ गए ,जो मन किया खा लिया, जो मिल गया पहन लिया । कोई विशेष आग्रह उनके जीवन में मैंने नहीं देखा । मुझे याद है कि एक बार वह मेरे ससुर के साथ हीवेट रोड के फुटपाथ पर सत्तू की दुकान पर जा पहुंचे फिर वहां मेरे ससुर और नागार्जुन जी ने बैठकर सत्तू खाया ।उस समय कोई सोच भी नहीं सकता था कि कितनी बड़ी विभूति उस सत्तू की दुकान पर बैठी हुई है । मेरे विवाह में सम्मिलित हुए थे नागार्जुन जी। आकर उन्होंने बस यही कहा था कि तुमने भी वही किया जो सब करते हैं। मेरी पत्नी को बेटी की तरह मानते थे तो उन्होंने मुझसे इतना और कहा कि मैं उनकी बेटी का हमेशा ध्यान रखूं। नागार्जुन जी मेरी शादी में शामिल हुए थे , इसका गर्व मुझे आज तक है। इसके बाद मेरी मुलाकात नागार्जुन जी से तब हुई जब वह एक बार गाजियाबाद में वर्तमान साहित्य के दफ्तर में आए। मेरे ही कमरे में आकर बैठ गए बल्कि लेट गए मेरे बिस्तर पर। मैंने उनसे आग्रह भी किया कि आप यही रुकिए लेकिन वो रुके नहीं और गाजियाबाद की एक एक चर्चित कवित्री निर्मला गर्ग घर चले गए । मुझे और मेरे सहयोगी ओम प्रकाश गर्ग शाम को वही आने के लिए कहा । मैं गया तो वहां आयोजित एक संगोष्ठी में और उन्हें बहुत सारी कविताएं सुनाई। यह नागार्जुन जी से मेरी आखिरी मुलाकात की । उसके बाद मैंने उनको कभी नहीं देखा। नागार्जुन जी से मिलना मेरे लिए एक बड़ा सौभाग्य था। उन्हें देखकर ही बहुत सी चीजें सीखने को मिलती थी । उनका व्यक्तित्व जरा भी आकर्षक नहीं था लेकिन उनमें कुछ ऐसा जरूर था जो सबको बांध लेता था । प्रेम की अविरल धारा उनके भीतर प्रवाहित होती रहती थी । आप अगर उनसे बातें करें तो वह खुश होकर आप को गुदगुदा भी सकते थे । उनकी हंसी बच्चों के जैसी थी। मन बहुत निश्छल था। उनके पास कभी इतना पैसा नहीं रहा कि वह अमीर जैसे दिखाई पड़ते लेकिन नागार्जुन जी अपनी तबीयत के रईस थे । उन्हें देहाती भोजन बहुत पसंद था। बाटी चोखा खाने के लिए तो वह कहीं भी जा सकते थे । कोई उन्हें कवि लेखक और साहित्यकार माने , यह उनकी कोई अनिवार्य शर्त नहीं थी । नागार्जुन जी इतने साधारण व्यक्ति थे कि सभी लोग उन्हें असाधारण मानते थे । बहुत दिनों से मन कर रहा था नागार्जुन जी जैसे विभूति के साथ मेरा जो भी मिलना- जुलना हुआ, उसे कलमबद्ध करूं। आज यह काम करके बहुत हल्का महसूस कर रहा हूं ।
**अजामिल

Wednesday, March 4, 2026

बाबू जी की चिट्ठियाँ !

जैसे कोई किसी की
जिंदगी सँवारता है - धीरे-धीरे
मुजस्समे तराशता है संतरास
संगीत रचता है -
हवाओं के चलने से
आस्थाएं और विश्वास से पैदा होते हैं
वेद-पुराण
बाइबिल-कुरान
बीज बनता है वृक्ष जैसे
वैसे ही किसी अज्ञात पीड़ा से गुजरकर
चिट्ठियाँ लिखा करते थे बाबू जी -
एक कलाकार की तरह

शबनमीं हरूफों के
गोशे-गोशे में
बसी होती थी उनकी रूह

कहाँ जाना है
कहाँ मुड़ना है
कहाँ रुकना है - बताते थे ऐसे
जैसे कोई भटके हुए को
बताए रास्ता

प्रियसे शुरु होकर
तुम्हारे बाबू जीतक
आशीष बरसता था - मूसलाधार
उनकी चिट्ठियों में

भीग जाता था
रोम-रोम
उनके प्यार-दुलार से
चिट्ठियों में साँस लेते थे
बाबू जी

सिर चढ़कर बोलता है आज भी
उनकी लिखावट का जादू
कोई-कोई ही बुन पाता है जिंदगी को
इतने सलीके से

यकीनन दिल और दिमाग पर
छा-जाने वाली
कालजयी रचनाओं की तरह हैं -
बाबू जी की चिट्ठियाँ

सोचता हूँ - इन्हे सहेजकर भी तो
सहेजे जा सकते हैं -
बाबू जी

राम थे, राम हैं और राम रहेंगे !

भगवान श्री राम को जीवन का अन्तिम सत्य मानने वाले भारतीय समाज में आज भी उस सत्य की तलाश जारी है, जो किन्ही भी परिस्थितियों में असत्य पर विजय पा सके। इतिहास और मिथ के द्वन्द्व में उलझे भारतीय समाज का यह एक ऐसा सच है जो सरल, सहज और सुगम राम के बारे में अभी तक एक मत नहीं हो पाया है। राम की उपस्थिति में भी यह समाज मानता है कि सत्य देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलता है और यह भी आवश्यक नहीं कि हर सत्य हर परिस्थिति में प्रत्येक के लिए सत्य ही हो, यह एक दुविधा की स्थिति है। किसी के लिए किसी विशेष परिस्थिति में असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है, असत्य के मार्ग पर जाने पर ही यदि किसी का जीवन सुरक्षित होता है, तो असत्य को सत्य में बदलने से कौन रोक सकता है ? लेकिन धर्म कहता है कि राम ही सत्य है, और इस सत्य के समक्ष कोई असत्य कभी नहीं ठहर सकता। शायद यही वजह है कि भारतीय जन-मानस राम के जटिल चरित्र को एक कालजयी महाकाव्य के रुप में देखता है, और यह अनुभव करता है कि राम भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों की स्थापना के आधार हैं। राम सामाजिक और नैतिक उत्थान की शक्ति हैं, एक ऐसी शक्ति जो अपने नाम के अनुसार ही सरल, सहज और सुगम तरीके से समस्त विश्व को सत्य का संबल दिये हुए है। राम के समक्ष सत्य ही खड़ा रह सकता है, असत्य में इतना साहस नहीं कि वह राम का सामना कर सके। शायद यही वजह है कि राम कण-कण में व्याप्त हैं और लोक-गाथाओं की जड़ों में समाये हुए हैं।
हिन्दू समाज मानता है कि राम कल थे, राम आज हैं और राम कल भी रहेंगे, क्योंकि परिस्थितियाँ बदलती हैं सत्य नहीं बदला करता, शायद यही कारण है कि राम के नाम में ही सत्य समाहित है। राम सत्य पर आधारित एक अति मानवीय समय की सबसे बड़ी व्यवस्था के सूत्रधार हैं। राम इसीलिए हमारे नायक हैं क्योंकि उन्होंने नैतिक मानदण्डों को पुनर्स्थापित करने का काम किया था। उन्होंने मर्यादाओं की सीमा में सत्य की स्थापना की थी। राम का सत्य काल्पनिक नहीं है, और वह किसी राजनैतिक कौशल का ही परिणाम है, बल्कि राम स्वयं सत्य हैं। राम हैं तो सत्य है, राम नहीं हैं तो सत्य भी नहीं है। राम सत्य का स्त्रोत हैं, सत्य की प्रेरणा हैं और सत्य की धारा हैं। राम का सत्य दृढ़ संकल्प का प्रतीक है, युग की सूत्रात्मा के रुप में राम अलौकिक हैं। राम की शपथ के बाद असत्य को कोई जगह नहीं मिलती, और इसीलिए राम प्राणी मात्र की आखिरी सांस में परब्रह्म-स्वरुप की तरह उपस्थित दिखाई देते हैं। राम एक ऐसा सत्य हैं, जो मानव मात्र के बहुत के बहुत करीब है, इसीलिए अनुकरणीय है। सत्य के पक्ष में जो लोग खड़े हैं, उनके लिए राम लौकिक भी हैं और अलौकिक भी हैं। राम के दिव्य मानवीय गुण उन्हें मर्यादा-पुरुषोत्तम बनाते हैं। सत्य के प्रतिनिधि के रुप में राम विकास की प्रत्येक दिशा में क्रियाशील हैं। राम का सत्य लोक-हित का सत्य है, यह सत्य अमानवीय सत्ता के समाप्त कर मानवीय सत्ता को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयत्नशील रहता है, इसीलिए राम का सत्य सर्वव्यापक सत्य हो जाता है, राम इसीलिए जन-जन का सत्य हो जाते हैं।
ऐसी मान्यता है कि जब-जब संसार में धर्म की क्षति होने लगती है, राक्षसी प्रवृत्तियों का आधिपत्य बढ़ जाता है, लोकाचरण में चारों तरफ अधर्म ही अधर्म दिखाई देता है, तब राम ऐसे असत्य को सत्य में बदलने के लिए साकार प्रकट होते हैं। असत्य को सत्य में बदलने की प्रक्रिया ही राम का होना है, सत्य के साथ होना राम के साथ होना है, राम के साथ होना धर्म के साथ होना है, क्योंकि राम का सत्य परम् कल्याण का सत्य है, राम सद्गुणों का समूह हैं, और यह पर्वत हजारों-हजार हिमालयों से भी ऊँचा है। राम का सत्य सर्वसिद्धिदायक महामंत्र है, राम का सत्य विषम परिस्थितियों में भयभीत नहीं करता, बल्कि धैर्य और कर्तव्य के प्रति हमारी आस्था और विश्वास को दृढ़ करता है। राम के सत्य के साथ रहकर हम असत्य पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, यह एक ऐसी विजय होती है, जो हमें अहंकार में नहीं ले जाती, बल्कि हमें विनम्र बनाती है, राम स्वयं विनम्रता की मूरत हैं, तभी तो महामुनि वशिष्ठ जी को राम से कहना पड़ा था कि ‘‘राम विनम्रता को भी आपसे विनम्रता सीखनी चाहिए।’’ ऐसा इसीलिए हो सका क्योंकि राम सदा कालजयी सत्य के साथ रहे, उन्होंने सामाजिक मूल्यों को नहीं टूटने दिया समाज को संचालित करने वाली मर्यादाओं की रक्षा के लिए राम ने वह भी किया जो देश-काल-परिस्थितियों में धर्म के अनुकूल नहीं थीं, लेकिन राम सत्य के साथ रहे, राम सत्य रहे, राम स्वयं कालजयी रचना बन गये और अपने भक्तों की आत्मा के भीतर ऐसे रच-बस गये कि उन्हें राम की धर्मभूमि ही मान लिया गया। राम की धार्मिक आस्थायें ऐसे प्रकाशित हुईं कि वह अजर-अमर हो गये, राम का सत्य सार्वभौमिक सत्य बन गया। आज राम के कारण ही अखिल विश्व में सत्य के पारस-स्पर्श का भाव देखने को मिलता है, धर्म और सत्य के दर्शन होते हैं, भक्त धर्म से दूर जाकर कभी संतुष्ट नहीं हो पाते क्योंकि राम उनके साथ नहीं होते।
प्राणी मात्र के कल्याण के लिए इस पृथ्वी पर अवतरित होने वाले भगवान श्री राम के दर्शन जीवन की कई भाव-भूमियों पर होते हैं। गृहधर्म, कुलधर्म, लोकधर्म, विश्वधर्म और पूर्णधर्म की उच्चता के लक्ष्य और उसकी व्यापकता राम के आदर्शों और उनकी मर्यादाओं में कल्याणकारी रुप में देखे जा सकते हैं। राम जिस सत्य को लेकर चलते रहे उसने उन्हे धर्मश्रेष्ठ बना दिया। गृहधर्म और कुलधर्म का जिस गरिमा के साथ निर्वाह राम ने किया वह उदाहरण अद्वितीय है। इतना ही नहीं धर्म, लोकधर्म और विश्वधर्म के प्रति राम का आचार-व्यवहार उन्हें धर्म की पूर्णता देता है, और आश्चर्य इस बात का है कि राम के भीतर भी यह क्रमिक विकास उनकी अनुभूति के अनुसार ही दिखाई देता है। राम जिस सत्य के पक्षधर हैं वह मनुष्य के हित की साधना तो है ही, सत्य एवं आनंद की अनुभूति भी है। राम ने सत्य को धर्म बना दिया, राम ने सत्य को सभी तरह की दुविधाओं और द्वन्द्व से मुक्त कर दिया, राम के सत्य के समक्ष सभी प्राणी आनंद-उत्सव मनाते हैं, राम का सत्य व्यक्ति को अपराध-बोध से मुक्त करता है।
राम की लीला क्षेत्र को यदि देखें तो हमें पता चलता है कि हम विविध रुपों में सत्य को ही प्रकाशित होते देख रहे हैं, एक ऐसी दिव्य ज्योति के रुप में जो व्यापक दृष्टि से धर्म-ज्योति में बदलती है। यही बात राम के साधारण कार्यों को भी असाधारण बना देती है और राम के सत्य को ब्रह्मनाद में बदल देती है। चौदह वर्ष वनवास में व्यतीत करते हुए बहुत बार परिस्थितियाँ ऐसी आयीं होंगी जब सत्य राम के हाथ से फिसलने वाला हो गया होगा परन्तु राम विषम परिस्थितियों में भी सत्य के साथ रहे, उन्होंने धर्म का पालन किया, उन्हीं सिद्धियों की साधना की जिससे धर्म का अभ्युदय होता है, इसका परिणाम यह हुआ कि राम धर्म के सत्य को लोकजीवन तक ले जा सके और उन्होंने जंगलों में रहकर गुजर-बसर करने वाले वानरों के आचार-व्यवहार को ही बदल दिया। राम के सत्य की यही व्यापकता उन प्राणियों का भी धर्म बन गई जो असत्य का साथ देना ही धर्म मानते रहे। इसलिए कहा जा सकता है कि राम का सत्य इसीलिए अन्तिम सत्य हो सका क्योंकि वह जन-कल्याणकारी, सर्वव्यापक, मानवीय दृष्टिकोण से ओतप्रोत और बहुआयामी है। राम के सत्य की धर्मध्वजा अगर आज विषम परिस्थितियों की तेज आँधियों में भी फहरा रही है तो उसका केवल यही कारण है कि वह जन कल्याणकारी है। जो सत्य जन कल्याणकारी नहीं होता वह राम का सत्य हो ही नहीं सकता, राम के सत्य का उद्देश्य ही है, उच्चतम मानवीय मूल्यों की स्थापना।
राम जानते थे कि धर्म को बचाने के लिए सत्य की पक्षधर एक सुदृढ़ व्यवस्था चाहिए और राम यह भी जानते थे कि सत्य का पक्ष लिए बिना धर्म बचाया भी नहीं जा सकता, कोई व्यवस्था धर्म से विमुख होकर नहीं चलाई जा सकती और सत्य के साथ खड़े राम तो स्वयं धर्म के पर्याय हो गये थे, माता-पिता और गुरु के प्रति आदर भाव, भाइयों के प्रति स्नेह, प्रजा के प्रति वात्सल्य राम के भीतर यदि जन्मा तो उसका केवल एक ही आधार था कि राम सत्य के साथ खड़े थे। राम भले-बुरे के ज्ञाता थे, बावजूद इसके उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए कोई भी निर्णय भावुकता में भरकर पक्षपात पूर्ण नहीं लिया। राम सत्य की शक्ति को पहचानते थे, इसीलिए सीता के चरित्र पर जब प्रजा ने उँगली उठायी तब राम सीता की अग्नि-परीक्षा तक के लिए सहर्ष तैयार हो गये, उन्हें विश्वास था कि सत्य अटल है, उसे बदला नहीं जा सकता और झूठ के पैर नहीं होते, उसकी तो अकाल मृत्यु सुनिश्चित ही है। भरत की नीयत पर जब सब संदेह कर रहे थे, तब राम सभी द्वन्द्व से बाहर निकलकर पूर्ण विश्वास के साथ भरत के साथ खड़े हुए थे, राम जानते थे कि भरत सत्य के साथ हैं। यह बात यह साबित करती है कि जो सत्य के साथ है वह राम के साथ है, भरत राम के साथ हैं और राम भरत की दृढ़ता की भाव-भूमि पर खड़े होकर सत्य के साथ हैं। यह अद्भुद समीकरण है जो सत्य को प्रत्येक परिस्थिति में मंगलमय और कल्याणकारी बनाता है। राम की जय-जयकार सत्य की जय-जयकार है, राम का धर्म सत्य का धर्म है, जो आज लोकधर्म की शक्ति बना हुआ है। जहाँ राम हैं वहाँ अंधकार को हटना ही होता है।
कहते हैं कि त्रेता युग में जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार बढ़ गया, सत्य अपमानित होने लगा और असत्य को महिमामण्डित किया जाने लगा तब राम अवतरित हुए। राम आते ही तब हैं, जब अधर्म बढ़ जाता है, जहाँ राम होते हैं सत्य की विजय सुनिश्चित होती है। राम ने अधर्म पर विजय प्राप्त कर शुभ धर्म की पताका फहरायी थी, असत्य पर सत्य की विजय का स्मृति पर्व हैविजय दशमी यह सत्य की पुर्नस्थापना का पर्व है, यह रावण पर राम की विजय का पर्व है, इसीलिए आज कलियुग की विषमताओं में जी रहे मनुष्य के लिए इससे बड़ा आनंद उत्सव और कोई दूसरा नहीं है। यह आनंद उत्सव हमें स्मरण कराता है कि विजय अन्ततः सत्य की ही होगी और असत्य बहुत दूर तक साथ चलने वाला नहीं है। तो यह सोचना होगा कि इस आनंद उत्सव की सार्थकता किन बातों पर निहित है। यह उत्सव अगर हमें सिखाता है कि हमें बुराइयों से दूर रहते हुए सत्य के साथ रहना चाहिए, हमें राम के साथ रहना चाहिए तो यह भी देखना होगा कि आज के समाज में मनुष्य के पास इसकी संभावना कितनी शेष है। रावण के पुतले का बार-बार दहन करके हम राम साथ नहीं खड़े हो सकते, यह संतोष की बात भी नहीं है। राम के साथ होने का अर्थ है रावण पर सम्पूर्ण विजय। आज समाज में रावण अत्याचार, अनाचार, शोषण, दम्भ, द्वेष, कपट, छल, बैर, लूट, हत्या अपहरण, बेरोजगारी के रुप में अपने दशों शीश के साथ सिर्फ खड़ा हुआ है बल्कि सत्य का पक्ष लेने वाले लोगों की असहायता पर ठठाकर हँस रहा है। तो क्या सत्य का पक्ष कमजोर पड़ गया है ? राम कहाँ गये ? बार-बार विजय दशमी का पर्व किसकी हार के उपलक्ष्य में मनाया जाता है ? ये सारे सवाल एक संवेदनशील व्यक्ति के मन में उठते हैं, यह सवाल भी उठता है कि जब राम कण-कण में व्याप्त हैं, सत्य की स्थापना हो चुकी है तो असत्य को सिर उठाने का अवसर कौन दे रहा है ? यह सवाल अपनी जगह पर उठाये जा रहे हैं और अच्छाई द्वारा बुराई पर विजय प्राप्त करने की स्मृति भी रावण दहन के बाद हर्षउल्लास से मनाई जा रही है, निश्चय ही यह परम्परा बनाये रखना चाहिए। समाज यदि बुराई के विरुद्ध खड़ा नहीं होगा तो राम कलंकित होंगें। राम अर्थात सत्य कलंकित होगा। विजय दशमी की सार्थकता इसी बात में है कि समाज बुराईयों से मुक्त हो, इसलिए रावण की नाभि में बसे पोषणरुपी भ्रष्टाचार का जब तक समूल नाश नहीं होगा, तब तक राम की विजय के बाद भी वह बातें बची रह जायेंगी जो सत्य को कलंकित करती हैं। दशानन के सिर कुचल देने से कोई बात बनने वाली नहीं है, रावण की नाभि तक जाना होगा जहाँ भ्रष्टाचार का पोषण करने वाला अमृत मौजूद है। विजाय दशमी का पर्व हमें यह सिखाता है कि जब तक मनुष्य अपने भीतर निवास कर रहे रावण को पहचान नहीं लेता तब तक लज्जा, श्रद्धा, साधना, वंदना और शान्ति रुपी सीता का हरण होता रहेगा।
विजय दशमी का पर्व असत्य पर सत्य की विजय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एक प्रेरणा है जो हमें विकार रहित होने का संदेश देती है। विजय दशमी का पर्व हमें बताता है कि रावण के पुतले का दहन कर देने के बाद रावण का नाश नहीं हो जाता उस रावण का भी दहन करना होगा जो कहीं हमारे भीतर छुपा हुआ है और हमें सद्मार्ग से भटका रहा है। रावण अगर भयभीत होता है तो सिर्फ राम से अर्थात असत्य अगर डरता है तो केवल से, असत्य सत्य का सामना नहीं कर पाता, इसीलिए राम को अंगीकार करना है उसके प्रतिरोध के लिए सत्य पर आधारित रणनीति भी बनानी है, मर्यादायें भी देखनी हैं, जीवन मूल्यों को भी बचाना है और पराजित भी नहीं होना है। रावण दहन किया जाना चाहिए क्योंकि यह बुराईयों को छोड़ने का समाज द्वारा किया गया संकल्प है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर राम मय होकर कोई भक्त एक बुराई का भी त्याग कर देता है तो विजय दशमी का पर्व सार्थक हो उठेगा। यह नहीं सोचना चाहिए कि कोई राम नहीं हो सकता वे सारे लोग राम हो सकते हैं जो सत्य के साथ खड़े हुए हैं और यह विश्वास रखते हैं कि सत्य कभी पराजित नहीं होता। महामानव महात्मा गाँधी जीवन के अन्तिम छण तक सत्य के साथ रहे उन्होंने राम का हाथ नहीं छोेड़ा तो राम भी उन्हें छोड़कर कहीं नहीं गये। कोई सत्य को नहीं छोड़ता तो सत्य भी उसे नहीं छोड़ता। विजय दशमी का पर्व भगवान राम के मर्यादित जीवन की सुगंध है जो प्राण वायु की तरह प्रतिपल प्रत्येक प्राणी को जीवित रखे हुए है। यह पर्व समाज व्यवस्था के लिए एक स्मरणीय अनुष्ठान है यह अनुष्ठान मनुष्य को साहस,क्षमा,दया और परोपकार की भावना से भर देता है। यह भी देखना होगा कि असत्य यदि समाज में उपस्थित है, तो उसके कारण क्या हैं ? सत्य इसका विरोध क्यों नहीं कर पा रहा है ? इसे भी जांच लेने में कोई हर्ज नहीं है और यूँ तो विजय दशमी की सार्थकता इसी में है कि मनुष्य सबसे पहले अपने को बदलने का संकल्प ले। एक-एक व्यक्ति बदलेगा तो पूरे समाज को बदलने से कौन रोक सकता है ? जब सब सत्य बोलेंगे तो असत्य को तो भागना ही पड़ेगा।
असत्य पर सत्य की विजय का पर्व विजय दशमी भगवान श्री राम के संदर्भ में यह प्रमाणित करता है कि श्री राम दूसरों के दुख में दुखी होना जानते थे, इसीलिए वह जन-जन के आराध्य बने। राम की सम्पूर्ण छवि लार्जर देन लाईफ थी, वह मानवीय गुणों से पूरित थे। प्रख्यात शायरअल्लामा इकबालने राम कोइमाम--हिन्दकहा था। उनका कहना था कि राम का चरित्र वाकई अनूठा है, सत्य के लिए लड़ने वाला इतना बड़ा योद्धा पहले कभी नहीं हुआ। निदा फाजली मानते हैं कि राम बच्चों को लुभाते हैं, माओं के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, भक्तों को भयमुक्त करते हैं और दुष्टों को भयभीत करते हैं। राम का सम्पूर्ण जीवन असत्य से लड़ने की प्रेरणा है, सत्य को जानना राम को जानना है। श्री राम प्रजावत्सल हैं, उन्होंने लोकहित के लिए एक आदर्श शासक की तरह अपने सुखांे का त्याग कर दिया था, यही कारण है कि आज आपसी संवाद में भगवान श्री राम जय राम जी होकर रह गये। प्रजा राम की सत्य के कारण जय-जयकार करती है, यह अभिवादन राम के प्रति सम्मान का भाव तो व्यक्त करता ही है उस सत्य के प्रति भी अपना विश्वास व्यक्त करता है जिसे राम ने असत्य को पराजित करके प्राप्त किया था। सर्वशक्तिमान होकर भी राम शक्ति का प्रदर्शन नहीं करते। राम न्याय की बात करते हैं, राम चाहते तो किसी भी पल वह रावण का वध कर सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। राम असत्य के आधारों पर खड़े रावण के अहंकार का ही नाश करना चाहते थे, रावण का वध उनका उद्देश्य नहीं था, रावण को सद्मार्ग पर लाना उनका उद्देश्य था और इसीलिए उन्होंने रावण के साथ युद्ध को इतने दिनों तक लटकाये भी रखा।
राम के चेहरे पर भक्तों को जो प्रसन्नता, जो मनमोहक हँसी दिखाई देती है वह राम के अन्तर्मन में प्रज्वलित सत्य के सूर्य का प्रकाश ही है और यही पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करता है। पृथ्वी पर जब तक राम हैं असत्य की एक नहीं चलने वाली, राम थे, राम हैं और राम रहेंगे। सत्य था, सत्य है और सत्य रहेगा। क्योंकि सत्य का हर पक्षधर जानता है कि रामनाम सत्य है और विजय दशमी उसी सत्य का प्रजातांत्रिक अभिनंदन है।