ज़रूरी मुद्दा:
बच्चे आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ?
**अजामिल
स्कूल, माता-पिता और व्यवस्था के बीच पिसता बचपन
आज का बच्चा केवल स्कूल और माता-पिता के बीच नहीं फँसा है; वह एक ऐसी शिक्षा-व्यवस्था के बीच फँसा है, जहाँ उससे लगातार बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उसके लिए बेहतर वातावरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी अक्सर पीछे छूट जाती है।
एक ओर निजी स्कूलों की फीस, प्रतियोगिता और अभिभावकों की महत्वाकांक्षाएँ हैं, दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की अपनी चुनौतियाँ हैं। और इन दोनों के बीच खड़ा है वह बच्चा, जिसके हाथ में किताब तो है, लेकिन मन में अनेक सवाल हैं—क्या मैं अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरा उतर पाऊँगा? क्या मैं अपने शिक्षक को संतुष्ट कर पाऊँगा? अगर मैं असफल हुआ तो मेरा क्या होगा? और अगर मेरा स्कूल ही मेरे लिए पर्याप्त नहीं है तो मैं कहाँ जाऊँ?
सरकारी स्कूलों का संकट केवल स्कूलों का संकट नहीं है
उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों के विलय और pairing की नीति ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है। सरकार का कहना है कि कम नामांकन वाले विद्यालयों को आसपास के बेहतर संसाधन वाले विद्यालयों से जोड़ा जा रहा है, ताकि शिक्षक, भवन और अन्य संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके। 2025 में सरकार ने 50 से कम विद्यार्थियों वाले विद्यालयों को नजदीकी विद्यालयों के साथ जोड़ने की नीति अपनाई थी और इसे शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में कदम बताया था।
सरकार की अपनी दलील में एक तर्क है—बहुत छोटे विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक और संसाधन उपलब्ध कराना कठिन है। लेकिन यहीं से एक दूसरा और अधिक असुविधाजनक सवाल पैदा होता है:
अगर किसी सरकारी स्कूल में बच्चे कम हो गए हैं, तो क्या समाधान स्कूल को बच्चे से दूर करना है या स्कूल को बच्चे के लिए बेहतर बनाना?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्कूलों में कम नामांकन का कारण हमेशा यह नहीं हो सकता कि गाँव या मोहल्ले के माता-पिता शिक्षा नहीं चाहते। विद्यालय में शिक्षक नहीं हैं, भवन जर्जर है, शौचालय खराब है, बिजली-पानी की व्यवस्था नहीं है, पढ़ाई का वातावरण कमजोर है—तो स्वाभाविक है कि सक्षम परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने लगेंगे। इसके बाद सरकारी स्कूल में बच्चों की संख्या और घटेगी और फिर कम नामांकन को स्कूल के विलय का आधार बनाया जाएगा।
यह एक ऐसा चक्र बन सकता है जिसमें व्यवस्था की कमजोरी को बच्चे की गलती मान लिया जाता है।
एक शिक्षक और पूरा स्कूल
भारत की शिक्षा-व्यवस्था के सामने सबसे गंभीर प्रश्नों में से एक शिक्षक की उपलब्धता है। UDISE+ के 2023-24 के आँकड़ों के हवाले से सामने आया कि देश में 1,10,971 स्कूल ऐसे थे जहाँ केवल एक शिक्षक था।
उत्तर प्रदेश में भी शिक्षक पदों की बड़ी संख्या खाली होने का प्रश्न लगातार उठता रहा है। अगस्त 2025 में विधानसभा में सरकार की ओर से बताया गया कि प्राथमिक विद्यालयों में 4,17,886 स्वीकृत शिक्षकीय पदों में 3,38,590 पद भरे हुए थे; उच्च प्राथमिक स्तर पर भी स्वीकृत और कार्यरत शिक्षकों के बीच अंतर था।
कल्पना कीजिए उस शिक्षक की स्थिति की, जिसे एक ही विद्यालय में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को संभालना हो। और कल्पना कीजिए उन बच्चों की, जिन्हें एक साथ अलग-अलग स्तरों पर पढ़ना हो।
क्या हम ऐसे वातावरण में बच्चों से वही शैक्षिक परिणाम माँग सकते हैं जो अत्याधुनिक सुविधाओं वाले विद्यालयों से अपेक्षित हैं?
स्कूल का भवन भी शिक्षा का हिस्सा है
शिक्षा केवल किताब और शिक्षक से नहीं होती। साफ-सुथरा कमरा, पर्याप्त रोशनी, हवा, बैठने की उचित व्यवस्था, ब्लैकबोर्ड, शौचालय, पीने का पानी और सुरक्षित भवन—ये सब शिक्षा की बुनियादी शर्तें हैं।
यदि बच्चे को फर्श पर बैठना पड़े, कक्षा में गर्मी हो, पंखा न हो, दीवारें गंदी हों, ब्लैकबोर्ड तक ठीक न हो और विद्यालय में केवल एक-दो शिक्षक हों, तो हमें यह पूछना चाहिए कि बच्चे को दोष किस बात का दिया जा रहा है?
बच्चा पढ़ना चाहता है, लेकिन क्या हमने उसके लिए पढ़ने योग्य वातावरण बनाया है?
यही वह प्रश्न है जिसे शिक्षा पर होने वाली बड़ी बहसों में अक्सर भुला दिया जाता है।
स्कूल बंद नहीं हुए—लेकिन बच्चे कहाँ गए?
सरकार का कहना है कि स्कूल स्थायी रूप से बंद नहीं किए गए, बल्कि उन्हें दूसरे विद्यालयों के साथ जोड़ा गया है। जुलाई 2025 में बेसिक शिक्षा मंत्री ने भी कहा था कि कोई विद्यालय स्थायी रूप से बंद नहीं किया गया और आवश्यकता होने पर वहाँ फिर से कक्षाएँ शुरू की जा सकती हैं।
लेकिन किसी अभिभावक के लिए प्रशासनिक शब्दावली से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उसका बच्चा अब पढ़ने कहाँ जाएगा?
यदि पहले स्कूल घर से कुछ कदम की दूरी पर था और अब दूसरे विद्यालय तक जाने के लिए उसे अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, तो खासकर छोटे बच्चों और लड़कियों के लिए यह केवल सुविधा का प्रश्न नहीं रह जाता। सुरक्षा, परिवहन और परिवार की आर्थिक स्थिति भी इससे जुड़ जाती है।
ऐसी ही चिंताएँ उत्तर प्रदेश में विद्यालयों की pairing के बाद सामने आई रिपोर्टों में भी दिखाई दीं, जहाँ कुछ बच्चों के लिए दूरी और सुरक्षा चिंता का विषय बनी।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “स्कूल बंद हुआ या मर्ज हुआ?”
सवाल यह होना चाहिए—
क्या बच्चे की शिक्षा पहले से अधिक आसान हुई या कठिन?
मीडिया और समाज की भूमिका
यदि किसी सरकारी विद्यालय की वास्तविक स्थिति खराब है, तो उसे सामने लाना व्यवस्था के खिलाफ साजिश नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा होना चाहिए।
मीडिया का काम केवल उद्घाटन समारोह, नई योजनाओं और सरकारी घोषणाओं को दिखाना नहीं है। उसे यह भी देखना चाहिए कि उन योजनाओं का जमीन पर क्या हुआ।
जिस विद्यालय में बच्चे पढ़ते हैं, वहाँ जाकर देखना चाहिए कि उनके पास बैठने की जगह है या नहीं। शिक्षक कितने हैं। शौचालय की स्थिति क्या है। पीने का पानी है या नहीं। कक्षा में पंखा चलता है या नहीं। ब्लैकबोर्ड है या नहीं। बच्चों को वास्तव में पढ़ाया जा रहा है या शिक्षक प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कामों में उलझे हैं।
हालाँकि किसी विशेष विद्यालय में मीडिया को प्रवेश से रोके जाने के दावे को प्रमाण के बिना सामान्य तथ्य की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए। लेकिन यदि कहीं ऐसा होता है तो यह निश्चित रूप से गंभीर सार्वजनिक प्रश्न है, क्योंकि सरकारी विद्यालय जनता के पैसे से चलते हैं और वहाँ पढ़ने वाले बच्चे समाज की जिम्मेदारी हैं।
कम नामांकन का असली इलाज क्या है?
यहाँ शिक्षा नीति के सामने सबसे कठिन प्रश्न है।
अगर किसी स्कूल में बच्चे कम हैं तो उसे बंद या मर्ज करना सबसे आसान प्रशासनिक रास्ता हो सकता है। लेकिन उससे पहले यह पूछना चाहिए कि वहाँ बच्चे कम क्यों हैं?
क्या वहाँ शिक्षक पर्याप्त हैं?
क्या भवन ठीक है?
क्या विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है?
क्या अभिभावकों को विद्यालय पर विश्वास है?
क्या निजी विद्यालयों की ओर बच्चों के जाने का कारण सरकारी विद्यालय की कमजोरी है?
यदि उत्तर हाँ है, तो समस्या स्कूल में बच्चों की संख्या नहीं, स्कूल की गुणवत्ता है।
और गुणवत्ता सुधारने के बजाय स्कूल को ही समाप्त कर देना बीमारी का इलाज नहीं है।
गरीब बच्चे के पास विकल्प कम हैं
सरकारी शिक्षा-व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन बच्चों के प्रति है जिनके परिवार महँगे निजी स्कूलों का खर्च नहीं उठा सकते।
समाज का संपन्न वर्ग खराब सरकारी स्कूल से अपने बच्चे को निकालकर दूसरे स्कूल में भेज सकता है। गरीब परिवार के पास यह विकल्प सीमित होता है।
इसलिए सरकारी स्कूल का कमजोर होना केवल शिक्षा का संकट नहीं है; यह सामाजिक समानता का संकट भी है।
अगर एक बच्चे को अच्छी शिक्षा इसलिए मिलती है क्योंकि उसके माता-पिता उसके लिए महँगा स्कूल खरीद सकते हैं और दूसरे बच्चे को केवल इसलिए खराब शिक्षा मिलती है क्योंकि उसके परिवार के पास पैसा नहीं है, तो हम शिक्षा के माध्यम से असमानता को कम नहीं कर रहे, बल्कि उसे और गहरा कर रहे हैं।
बच्चे पर पहले से ही बहुत दबाव है
और यहीं से यह प्रश्न हमारे मूल विषय से जुड़ता है।
जिस बच्चे को घर में माता-पिता की अपेक्षाओं का दबाव झेलना पड़ रहा है, स्कूल में परीक्षा और प्रदर्शन का दबाव झेलना पड़ रहा है, वह अगर सरकारी विद्यालय में पढ़ता है तो उसे कभी-कभी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से भी जूझना पड़ता है।
एक तरफ बच्चे से कहा जाता है—“तुम्हें भविष्य में बहुत आगे जाना है।”
दूसरी तरफ उसे वह वर्तमान नहीं दिया जाता जिसमें वह अच्छी तरह पढ़ सके।
हम उससे कहते हैं—“प्रतियोगिता बहुत कठिन है।”
लेकिन क्या हमने उसे प्रतियोगिता के लिए समान मैदान दिया है?
हम कहते हैं—“तुम्हें मेहनत करनी होगी।”
लेकिन क्या हमने उसके हाथ में पर्याप्त किताब, पर्याप्त शिक्षक और पर्याप्त सुविधाएँ दी हैं?
शिक्षा सरकार की कृपा नहीं, बच्चे का अधिकार है
शिक्षा किसी सरकार की दया नहीं है। यह बच्चे का अधिकार है और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
इसलिए स्कूलों के विलय पर बहस केवल प्रशासनिक दक्षता की बहस नहीं होनी चाहिए। हमें देखना होगा कि इस प्रक्रिया का असर बच्चे के अधिकार, उसकी सुरक्षा, उसकी पहुँच और उसकी शिक्षा की गुणवत्ता पर क्या पड़ रहा है।
सरकार यदि कहती है कि विलय से शिक्षा बेहतर होगी, तो उसे आँकड़ों और जमीन पर परिणामों के साथ यह साबित करना चाहिए।
कितने बच्चों को बेहतर शिक्षक मिले?
कितने विद्यालयों में सुविधाएँ सुधरीं?
कितने बच्चों की उपस्थिति बढ़ी?
कितने बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी?
कितने विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात सुधरा?
इन प्रश्नों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
बच्चे आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ?
आज का बच्चा सचमुच एक विचित्र चौराहे पर खड़ा है।
घर उससे सफलता चाहता है।
स्कूल उससे परिणाम चाहता है।
समाज उससे प्रतियोगिता चाहता है।
सरकार उससे भविष्य की उम्मीद करती है।
लेकिन बच्चा शायद केवल इतना चाहता है कि कोई उसकी बात सुन ले।
उसे एक ऐसा स्कूल चाहिए जहाँ शिक्षक पर्याप्त हों।
एक ऐसी कक्षा चाहिए जहाँ वह आराम से बैठ सके।
एक ऐसा वातावरण चाहिए जहाँ उसे सम्मान मिले।
एक ऐसा घर चाहिए जहाँ उसके कम अंक आने पर उसे असफल इंसान न समझा जाए।
और एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जो यह स्वीकार करे कि बच्चा किसी आँकड़े का हिस्सा नहीं, एक जीवित मनुष्य है।
स्कूलों की संख्या घटाने से शिक्षा की गुणवत्ता अपने आप नहीं बढ़ती। असली सुधार तब होगा जब हर बच्चे तक अच्छा शिक्षक, सुरक्षित भवन, पर्याप्त संसाधन और सम्मानजनक वातावरण पहुँचे।
हमें यह तय करना होगा कि हमारी प्राथमिकता क्या है—कम विद्यालय या बेहतर विद्यालय?
क्योंकि अंततः सवाल स्कूल की इमारत का नहीं है।
सवाल उस बच्चे का है जो हर सुबह अपनी किताब लेकर निकलता है और विश्वास करता है कि पढ़-लिखकर वह अपना भविष्य बदल सकता है।
उस विश्वास को टूटने से बचाना ही शिक्षा-व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
और यदि हम उस विश्वास को बचा नहीं पाए, तो फिर हमें यह शिकायत करने का अधिकार भी नहीं रहेगा कि आज के बच्चे पढ़ाई से दूर क्यों जा रहे हैं।