Monday, September 28, 2026
आस्था का विसर्जन /अजामिल
Saturday, September 26, 2026
भारत में बालसहित्य / अजामिल
भारत में बाल साहित्य: कल, आज और कल
**अजामिल
विदेश में लगभग सभी लेखक गंभीर लेखन के साथ-साथ बाल साहित्य लिखना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और उनका सूचना यह भी है की कोई लेखक अपनी बात को खाने में कितना समर्थ है यह तब पता चलता है जब वह बाल साहित्य लिखता है लेकिन हमारे देश भारत में पहले तो बाल साहित्यकार ही बहुत कम है दूसरा यह की बड़ों के लिए यानी गंभीर साहित्य लिखने वाले यह महसूस ही नहीं करते कि उन्हें बच्चों के लिए भी लिखना चाहिए भर साहित्य लिखना भारत में दूसरे दर्जे का लेखन माना जाता है जबकि सच यह है कि बाल साहित्य पूरी दुनिया में कहीं भी बचकाना साहित्य नहीं माना जाता यह महसूस किया जाता है की गंभीर साहित्य लेखन से ज्यादा मुश्किल काम है बाल साहित्य का लेखन लोग यह भी मानते हैं कि अच्छा बल सहित सभी लिखा जा सकता है जब लेखकों के भीतर एक बच्चा मौजूद हो जापान चीन रूस ब्रिटेन आदि देशों में बाल साहित्यकारों का बहुत ज्यादा सम्मान है उन्हें पुरस्कार और अवार्ड से नवादा जाता है और उनकी किताबें लाखों की संख्या में प्रकाशित की जाती है यह किताबें इतनी खूबसूरत छापी जाती है कि इन्हें देखकर लगता है जैसे यह कोई खिलौना हो हमारे देश में इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाता है प्रकाशक भी बच्चों का साहित्य छापने में बहुत रुचि नहीं दिखाई उन्हें लगता है कि यह सौदा घाटे का है भारत में इस बात को सोने वाला कोई नहीं है की बच्चों में पढ़ने की रुचि इसीलिए कम होती जा रही है कि उनके पढ़ने के लिए अच्छे बल सहित की बहुत ज्यादा कमी है और जो कुछ लिखा जाता है वह बस काम चलाओ होता है ।बाल साहित्य किसी भी समाज की वह नींव है जिस पर आने वाली पीढ़ियों का मानसिक और चारित्रिक निर्माण टिका होता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहाँ लोककथाओं और मौखिक कहानियों की सदियों पुरानी परंपरा रही है, बाल साहित्य का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। वर्तमान समय में यह विधा एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है, जहाँ इसके सामने असीम संभावनाएँ भी हैं और गंभीर चुनौतियाँ भी।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: पंचतंत्र से 'बालसखा' तक
भारत में बाल साहित्य की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं। 'पंचतंत्र', 'जातक कथाएँ' और 'हितोपदेश' जैसी कृतियाँ न केवल भारत बल्कि विश्व के बाल साहित्य का आधार मानी जाती हैं। आधुनिक काल में, भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग से हिंदी बाल साहित्य ने एक निश्चित आकार लेना शुरू किया। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में 'बालसखा', 'चंदामामा', 'पराग' और 'नंदन' जैसी पत्रिकाओं ने बच्चों के मानसिक विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया।
वर्तमान परिदृश्य: बदलाव और आधुनिकता
आज के दौर में बाल साहित्य केवल नैतिकता और परियों की कहानियों तक सीमित नहीं है। समकालीन लेखक अब बाल मनोविज्ञान, विज्ञान, पर्यावरण, सामाजिक समानता और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर भी सक्रिय रूप से लिख रहे हैं। सुधा मूर्ति, रस्किन बॉन्ड और प्रकाश मनु जैसे लेखकों ने भारतीय परिवेश को ध्यान में रखते हुए वैश्विक स्तर का साहित्य रचा है।
वर्तमान स्थिति की कुछ मुख्य विशेषताएँ:
विषय वैविध्य: अब कहानियों में केवल "राजा-रानी" नहीं, बल्कि रोबोट, जलवायु परिवर्तन और अंतरिक्ष जैसे विषय भी शामिल हैं।
दृश्य प्रस्तुतीकरण: ग्राफिक नोवेल्स और रंगीन चित्रों वाली पुस्तकों (Picture Books) का प्रचलन बढ़ा है, जो बच्चों को आकर्षित करती हैं।
डिजिटल परिवर्तन: ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स के माध्यम से साहित्य अब बच्चों के मोबाइल और टैबलेट तक पहुँच गया है।
चुनौतियाँ और संकट
इतने विकास के बावजूद, भारतीय बाल साहित्य आज भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है:
अंग्रेजी का प्रभुत्व: शहरी क्षेत्रों में अंग्रेजी भाषा के बाल साहित्य का दबदबा है, जिसके कारण क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी का साहित्य पिछड़ रहा है।
तकनीकी प्रतिस्पर्धा: स्मार्टफोन, वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया ने बच्चों की पढ़ने की आदत (Reading Habit) को काफी हद तक कम कर दिया है।
लेखन का स्तर: कई बार बाल साहित्य के नाम पर केवल उपदेशात्मक या अरुचिकर सामग्री परोसी जाती है, जो आज के तार्किक बच्चों को प्रभावित नहीं कर पाती।
विपणन और वितरण: छोटे शहरों और गाँवों तक गुणवत्तापूर्ण बाल साहित्य की पहुँच आज भी एक बड़ी समस्या है।
भविष्य की राह
भारत में बाल साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि लेखकों को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ हो। साहित्य ऐसा होना चाहिए जो बच्चों को डराए या केवल उपदेश न दे, बल्कि उनकी कल्पनाशीलता को पंख दे। प्रकाशकों को भी पुस्तकों के मूल्य और उनकी गुणवत्ता के बीच संतुलन बिठाना होगा।
निष्कर्ष
अंततः, बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बच्चों के संस्कारों की पाठशाला है। यदि हम चाहते हैं कि भविष्य की पीढ़ी संवेदनशील और जिज्ञासु बने, तो हमें उन्हें श्रेष्ठ साहित्य उपलब्ध कराना ही होगा। सरकार, समाज और अभिभावकों के साझा प्रयासों से ही भारतीय बाल साहित्य अपनी खोई हुई चमक वापस पा सकता है।
प्रकाशकों द्वारा बाल साहित्य (विशेषकर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में) में कम रुचि लेने के पीछे कई ठोस व्यावसायिक और सामाजिक कारण हैं। आजकल प्रकाशक जोखिम लेने के बजाय सुरक्षित विकल्पों की ओर अधिक झुक रहे हैं।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. व्यावसायिक लाभ (Profit Margin) की कमी
बाल साहित्य के प्रकाशन में लागत अधिक आती है और मुनाफा कम होता है।
महंगी छपाई: बच्चों की किताबों के लिए अच्छी गुणवत्ता वाला कागज, रंगीन चित्र (Illustrations) और आकर्षक कवर जरूरी होते हैं। इससे उत्पादन लागत (Production Cost) बढ़ जाती है।
कम कीमत: अभिभावक अक्सर बाल साहित्य की अधिक कीमत देने को तैयार नहीं होते। वे एक महंगी कॉमिक्स या कहानी की किताब के बजाय उतने ही पैसों में खिलौना खरीदना बेहतर समझते हैं।
2. वितरण तंत्र और बाजार का अभाव
पुस्तकालयों पर निर्भरता: भारत में बाल साहित्य का बाजार मुख्य रूप से सरकारी और स्कूल पुस्तकालयों (Libraries) की खरीद पर टिका है। सीधे ग्राहकों (Retail Buyers) तक पहुँच बहुत कम है।
प्रदर्शनी और बुक स्टोर्स की कमी: बुक स्टोर्स में बाल साहित्य के लिए बहुत कम जगह आवंटित की जाती है। वहाँ अक्सर विदेशी लेखकों (जैसे जे.के. रॉलिंग या जेफ किन्नी) की किताबों को प्राथमिकता दी जाती है।
3. अंग्रेजी भाषा का बढ़ता प्रभाव
शहरी मध्यम वर्ग के अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषा की किताबें पढ़ाना स्टेटस सिंबल मानते हैं।
प्रकाशक जानते हैं कि Scholastic या Penguin जैसे बड़े वैश्विक ब्रांड्स की अंग्रेजी किताबों से मुकाबला करना मुश्किल है।
हिंदी या आंचलिक भाषाओं के प्रकाशकों को लगता है कि उनके पास इस वर्ग के लिए 'पहुँच' (Reach) नहीं है।
4. सामग्री और लेखकों का संकट
पुराना ढर्रा: आज भी कई लेखक वही पुराने राजा-रानी या उपदेशात्मक कहानियाँ लिख रहे हैं। प्रकाशकों को लगता है कि आज के 'स्मार्टफोन युग' के बच्चों को यह सामग्री बोरिंग लगती है।
प्रोफेशनल राइटिंग की कमी: बाल साहित्य लिखना सबसे कठिन काम है, लेकिन इसे अक्सर उपेक्षित माना जाता है। अच्छे लेखकों की कमी के कारण प्रकाशक निवेश करने से डरते हैं।
5. डिजिटल माध्यमों की चुनौती
यूट्यूब, वीडियो गेम्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने बच्चों का सारा समय छीन लिया है। प्रकाशकों को लगता है कि "स्क्रीन टाइम" के इस दौर में प्रिंट किताबों का भविष्य अनिश्चित है, इसलिए वे बड़े निवेश से बचते हैं।
संक्षिप्त तुलना: चुनौतियाँ बनाम समाधान
व्यवसायिक चुनौतियों और बाजार के दबावों के बावजूद, भारत में कुछ ऐसे समर्पित प्रकाशक और संस्थाएं हैं जो बाल साहित्य को नया जीवन देने का जोखिम उठा रहे हैं। ये प्रकाशक केवल 'मुनाफे' के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की कल्पनाशीलता और भाषाई समझ को बेहतर बनाने के उद्देश्य से काम कर रहे हैं।
यहाँ उन प्रमुख प्रकाशकों के बारे में जानकारी दी गई है जो इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं:
1. एकलव्य (Eklavya) - भोपाल
यह संस्था दशकों से बाल साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर रही है।
विशेषता: एकलव्य की पुस्तकें बहुत सस्ती होती हैं और ग्रामीण परिवेश से जुड़ी होती हैं। ये विज्ञान, पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों को बहुत सरल और मजेदार ढंग से पेश करते हैं।
उल्लेखनीय कार्य: इनकी प्रसिद्ध बाल पत्रिका 'चकमक' आज भी हजारों बच्चों की पसंदीदा है।
2. जुगनू प्रकाशन (Jugnoo Prakashan)
यह 'एकतारा' ट्रस्ट का एक उपक्रम है जो हिंदी बाल साहित्य में 'कलात्मकता' और 'कविता' को प्राथमिकता देता है।
विशेषता: ये विश्व प्रसिद्ध लेखकों (जैसे गुलज़ार, विनोद कुमार शुक्ल) और चित्रकारों के साथ मिलकर ऐसी किताबें निकालते हैं जो देखने में किसी पेंटिंग जैसी सुंदर होती हैं।
जोखिम: जहाँ अन्य प्रकाशक चित्रों पर खर्च करने से डरते हैं, जुगनू प्रकाशन बेहतरीन चित्रों और उच्च गुणवत्ता वाले कागज़ पर निवेश करता है ताकि बच्चों को सौंदर्यबोध (Aesthetics) की समझ हो।
3. प्रथम बुक्स (Pratham Books)
यह एक 'नॉट-फॉर-प्रॉफिट' प्रकाशक है, जिसका लक्ष्य है—"हर बच्चे के हाथ में एक किताब"।
विशेषता: ये एक ही कहानी को 20 से अधिक भारतीय भाषाओं में प्रकाशित करते हैं। इनकी किताबें बहुत रंगीन और सस्ती होती हैं।
नवाचार: इन्होंने 'स्टोरीवीवर' (StoryWeaver) नाम का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया है, जहाँ हजारों कहानियाँ मुफ्त में पढ़ी जा सकती हैं।
4. तूलिका पब्लिशर्स (Tulika Publishers)
चेन्नई स्थित यह स्वतंत्र प्रकाशक बहुभाषी (Multilingual) और द्विभाषी (Bilingual) पुस्तकों के लिए जाना जाता है।
विशेषता: तूलिका अक्सर एक ही पन्ने पर अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा (जैसे हिंदी या तमिल) की कहानी छापता है। इससे बच्चे को दूसरी भाषा सीखने में आसानी होती है।
विषय: ये लोककथाओं और समकालीन सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित पुस्तकें अधिक छापते हैं।
5. नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) - भारत सरकार
सरकारी संस्थान होने के नाते, NBT भारत में बाल साहित्य का सबसे बड़ा आधार है।
विशेषता: इनका 'राष्ट्रीय बाल साहित्य केंद्र' (NCCL) देश भर के बाल लेखकों को मंच देता है।
पहुँच: NBT की मोबाइल वैन (Pustak Parikrama) सुदूर गाँवों तक पहुँचकर बहुत ही कम कीमतों पर किताबें उपलब्ध कराती है।
6. अन्य महत्वपूर्ण नाम:
कराडी टेल्स (Karadi Tales): ये विशेष रूप से ऑडियो-बुक्स और भारतीय लोककथाओं को संगीत के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं।
तारा बुक्स (Tara Books): ये अपनी हस्तनिर्मित (Handmade) और स्क्रीन-प्रिंटेड पुस्तकों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।
ये प्रकाशक जोखिम क्यों ले रहे हैं?
ये सभी प्रकाशक एक बात पर विश्वास करते हैं: "यदि बच्चों को अच्छी सामग्री नहीं दी गई, तो वे कभी अच्छे पाठक नहीं बनेंगे।" इनका उद्देश्य केवल किताबें बेचना नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक आंदोलन' चलाना है।
बाल साहित्यकारों की गंभीरता को लेकर आज दो अलग-अलग धाराएं देखने को मिलती हैं। जहाँ एक ओर कुछ लेखक केवल 'खानापूर्ति' कर रहे हैं, वहीं समर्पित लेखकों का एक बड़ा वर्ग इस विधा को लेकर अत्यंत गंभीर है और इसे वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए नए प्रयोग कर रहा है।
बाल साहित्यकारों की गंभीरता और उनके कार्यों को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:
1. बाल मनोविज्ञान का गहरा अध्ययन
आज के गंभीर लेखक केवल उपदेश देने के लिए नहीं लिख रहे हैं। वे जानते हैं कि आज का बच्चा 'ज्ञान' से ज्यादा 'अनुभव' और 'तर्क' को महत्व देता है।
कार्य: लेखक अब बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, उनके डर, अकेलेपन और जिज्ञासाओं पर लिख रहे हैं। वे बच्चों की आँखों से दुनिया को देखने की कोशिश कर रहे हैं, न कि बड़ों के नजरिए से उन्हें सुधारने की।
2. विषयों का आधुनिकरण (Modernization of Themes)
गंभीर बाल साहित्यकार पुरानी घिसी-पिटी कहानियों से बाहर निकलकर समकालीन विषयों पर काम कर रहे हैं।
विज्ञान और पर्यावरण: प्रकाश मनु, देवेंद्र मेवाड़ी और क्षमा शर्मा जैसे लेखक बच्चों को विज्ञान और प्रकृति से जोड़ने के लिए रोचक कहानियाँ और कविताएँ लिख रहे हैं।
सामाजिक मुद्दे: अब कहानियों में लिंग भेद (Gender Equality), दिव्यांगता (Disability) और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को बहुत संवेदनशीलता के साथ पिरोया जा रहा है।
3. भाषा प्रयोग में नवाचार
लेखक अब ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जो बच्चों की बोलचाल के करीब हो। भारी-भरकम और क्लिष्ट शब्दों के बजाय सहज और प्रवाहमयी भाषा को प्राथमिकता दी जा रही है।
बहुभाषी प्रयोग: कई लेखक अपनी कहानियों में स्थानीय शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं ताकि बच्चा अपनी जड़ों से जुड़ा महसूस करे।
4. सक्रियता और मंचों का निर्माण
साहित्यकार केवल लिखने तक सीमित नहीं हैं, वे साहित्य को बच्चों तक पहुँचाने के लिए नए रास्ते भी खोज रहे हैं:
कार्यशालाएँ (Workshops): लेखक स्कूलों में जाकर कहानी सुनाने (Storytelling) के सत्र आयोजित कर रहे हैं।
सोशल मीडिया और पॉडकास्ट: कई साहित्यकार यूट्यूब और पॉडकास्ट के माध्यम से बच्चों को अपनी कहानियाँ सुना रहे हैं ताकि डिजिटल माध्यम का सही उपयोग हो सके।
बाल पत्रिकाओं का संपादन: 'चकमक', 'प्लूटो' और 'साइकिल' जैसी पत्रिकाओं के पीछे गंभीर लेखकों की ही मेहनत है जो बच्चों के लिए उच्च स्तरीय सामग्री का चयन करते हैं।
गंभीरता में कमी कहाँ है? (चुनौतियां)
गंभीर प्रयासों के बावजूद, कुछ चिंताजनक बातें भी हैं:
दोहराव: कुछ लेखक आज भी 50 साल पुरानी शैली में लिख रहे हैं, जिससे बच्चा जुड़ाव महसूस नहीं करता।
अनुवाद पर निर्भरता: मौलिक लेखन के बजाय अंग्रेजी की प्रसिद्ध किताबों का अनुवाद करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे भारतीय परिवेश की कहानियाँ कम हो रही हैं।
पुरस्कारों की होड़: कभी-कभी लेखक बच्चों के लिए लिखने के बजाय पुरस्कारों और अकादमियों को ध्यान में रखकर लिखते हैं, जिससे लेखन का मूल उद्देश्य (बच्चों का मनोरंजन और विकास) पीछे छूट जाता है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, भारतीय बाल साहित्यकार आज पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। वे जानते हैं कि उनके सामने चुनौती केवल दूसरे लेखकों से नहीं, बल्कि वीडियो गेम्स और इंटरनेट से भी है। इसलिए, वे साहित्य को अधिक दृश्यपरक (Visual), तार्किक और मनोरंजक बनाने में जुटे हैं।
भारतीय बाल साहित्य को समृद्ध करने वाले लेखकों की सूची काफी लंबी है, लेकिन यहाँ कुछ ऐसे चुनिंदा साहित्यकारों के नाम दिए जा रहे हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से बच्चों की दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया है:
1. प्रकाश मनु (Prakash Manu)
इन्हें आधुनिक हिंदी बाल साहित्य का 'स्तंभ' माना जाता है। इन्होंने बाल साहित्य के आलोचनात्मक पक्ष पर भी बहुत काम किया है।
प्रमुख कार्य: 'एक था ठुनठुनिया', 'लालचू और गोलू मोलू', और 'हिंदुस्तानी बाल साहित्य का इतिहास'।
विशेषता: इनकी कहानियों में बच्चों की मासूमियत और भारतीय परिवेश की खुशबू रची-बसी होती है।
2. सुधा मूर्ति (Sudha Murty)
यद्यपि वे मूल रूप से अंग्रेजी में लिखती हैं, लेकिन उनकी पुस्तकों का लगभग सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
प्रमुख कार्य: 'दादी माँ के नुस्खे' (Grandma's Bag of Stories), 'हाउ आई टॉट माय ग्रैंडमदर टू रीड'।
विशेषता: वे बहुत ही सरल भाषा में नैतिक मूल्यों और जीवन के अनुभवों को कहानियों के माध्यम से पिरोती हैं। उनकी कहानियाँ आज के बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।
3. रस्किन बॉन्ड (Ruskin Bond)
भारत के सबसे प्रिय लेखकों में से एक, जो मसूरी की पहाड़ियों में रहकर दशकों से बच्चों के लिए लिख रहे हैं।
प्रमुख कार्य: 'द ब्लू अम्ब्रेला' (नीली छतरी), 'नाइट ट्रेन एट देवली', 'रस्टी' सीरीज।
विशेषता: बॉन्ड की कहानियाँ प्रकृति, मासूमियत और छोटे शहरों के सरल जीवन पर आधारित होती हैं, जो बच्चों में प्रकृति के प्रति प्रेम जगाती हैं।
4. डॉ. देवेंद्र मेवाड़ी (Dr. Devendra Mewari)
इन्होंने बाल साहित्य को 'विज्ञान' से जोड़ने का कठिन कार्य किया है।
प्रमुख कार्य: 'विज्ञान की विभूतियाँ', 'भविष्य', 'जीव जगत की कहानियाँ'।
विशेषता: वे विज्ञान जैसे जटिल विषय को कहानी और किस्सागोई के अंदाज में पेश करते हैं, जिससे बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा होता है।
5. क्षमा शर्मा (Kshama Sharma)
समकालीन बाल साहित्य में क्षमा शर्मा एक बहुत ही सशक्त नाम हैं।
प्रमुख कार्य: 'नीले चश्मे वाला जिन्न', 'बचपन की कहानियाँ'।
विशेषता: वे बाल मनोविज्ञान और खासकर बालिकाओं के जीवन और उनकी चुनौतियों पर बहुत बारीकी से लिखती हैं।
6. विनोद कुमार शुक्ल (Vinod Kumar Shukla)
हिंदी के बहुत बड़े कवि और उपन्यासकार, जिन्होंने बच्चों के लिए बहुत ही मौलिक और जादुई साहित्य रचा है।
प्रमुख कार्य: 'पेड़ पर कमरा', 'घोड़ा और घास'।
विशेषता: इनकी शैली 'मैजिकल रियलिज्म' (जादुई यथार्थवाद) जैसी है, जो बच्चों की कल्पनाशीलता को असीम विस्तार देती है।
7. गुलज़ार (Gulzar)
प्रसिद्ध गीतकार और लेखक गुलज़ार साहब ने बच्चों के लिए बहुत ही प्यारी नज़्में और कहानियाँ लिखी हैं।
प्रमुख कार्य: 'पोटली वाली दादी', 'बोस्की का पंचतंत्र'।
विशेषता: उनकी रचनाओं में लय और संगीत होता है, जो बच्चों को सुनने और याद करने में बहुत आनंद देता है।
इन लेखकों ने सिद्ध किया है कि बाल साहित्य केवल 'चुटकुले' या 'शिक्षा' नहीं है, बल्कि यह एक ज़िम्मेदारी से भरा काम है.
शिक्षा का अधिकार: कितनी बदली सूरत
Thursday, September 24, 2026
आखिर बच्चे जाएँ तों कहाँ जाएँ?/ अजामिल
Friday, September 18, 2026
ये कैसा विकास, किसका विकास? अजामिल
Wednesday, September 16, 2026
हां मैंने फिराक को देखा है
अल फिराके अल फिराके अल फिराके अल फ़िराक
इस तरह इस ज़िन्दगी का एक वरक़ उल्टा गया । - मीना कुमारी
सन् 1972 बैंक रोड इलाहाबाद । सर्दियों की एक दोपहर । कथाकार अनीता गोपेश , शशि शर्मा और मैं यानि अजामिल रोज़ की तरह एशिया के सबसे बड़े शायर रघुपति सहाय फ़िराक जी के सानिध्य का सुख उठा रहे थे । फ़िराक साहब तबियत से साहित्य के अनेक मुद्दों पर बतिया रहे थे । अनीता और शशि जी नोट्स ले रहे थे । मैं अपने 35 mm फार्मेट के जेनिथ कैमरे से फ़िराक साहब के चेहरे पर आ जा रही भाव भंगिमाओं को कैद रहा था । उस दिन 80 से ज़्यादा तस्वीरें उतारी थी मैंने फ़िराक साहब की । उन तस्वीरों में से काफी तस्वीरें धर्मयुग सारिका दिनमान जनसत्ता नव भारत टाइम्स और इंडिया टुडे आदि तमाम पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थी ।
वक़्त गुज़र गया । पर यादें आज भी ताज़ा है । फ़िराक साहब कहाकार्टे थे क़ि लोग नाज़ करेंगे क़ि उन्होंने फ़िराक को देखा है । मैं और मेरी दोनों सहेलियां हम भाग्य शाली हैं कि हमने फ़िराक साहब को देखा ही नहीं है बल्कि उनकी प्यार दुलार से भरी गालियां भी खायीं हैं ।
-अजामिल
छाया : अजामिल
काव्यपाठ क़ि कला /अजामिल
बादल सरकार और समानांतर नामा/अजामिल
Tuesday, September 15, 2026
स्वाद का छलावा या सेहत का खेल /अजामिल
स्वाद का छलावा और सेहत का सत्य:
बदलती खाद्य-संस्कृति का संकट
**अजामिल
आज का मनुष्य एक अजीब द्वंद्व में जी रहा है। उसके सामने थाली में सजे विकल्प जितने आकर्षक हैं, उतने ही खतरनाक भी। एक ओर स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का शोर है—जिम, योग, डाइट प्लान, ऑर्गेनिक फूड—और दूसरी ओर स्वाद के नाम पर फैलता हुआ एक ऐसा बाज़ार, जिसने मनुष्य की भूख को आदत और आदत को लत में बदल दिया है। परिणाम यह है कि मनुष्य यह तय नहीं कर पा रहा कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या छोड़ देना चाहिए।
यह संकट केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का है। आधुनिक जीवनशैली, भागदौड़, बाज़ार की चकाचौंध और सुविधा की अंधी दौड़ ने हमारे भोजन को “पोषण” से हटाकर “मनोरंजन” का साधन बना दिया है। भोजन अब शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि जीभ का उत्सव बन गया है—और यही उत्सव धीरे-धीरे बीमारी का उत्स बनता जा रहा है।
स्वाद बनाम सेहत: एक गहराता द्वंद्व
स्वाद तात्कालिक सुख देता है। वह जीभ को संतुष्ट करता है, मन को क्षणिक आनंद देता है। लेकिन सेहत एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है—जो अनुशासन, संयम और समझ की मांग करती है। आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम अल्पकालिक सुख के लिए दीर्घकालिक स्वास्थ्य को दांव पर लगा रहे हैं।
वैज्ञानिक शोध लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि प्रोसेस्ड फूड, अत्यधिक चीनी, नमक और वसा से भरपूर भोजन—जैसे फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स—शरीर के लिए धीमे जहर की तरह काम करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों में तेजी से वृद्धि का एक बड़ा कारण यही असंतुलित खानपान है।
भारत में स्थिति और चिंताजनक है। पारंपरिक संतुलित भोजन—दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, छाछ—की जगह अब तली-भुनी और बाजारू चीज़ों ने ले ली है। खाने का समय अनियमित हो गया है। “जब मन किया, तब खा लिया”—यह नई जीवनशैली बन चुकी है।
पेट: पोषण का केंद्र या कचरे का डिब्बा?
एक कटु सत्य यह है कि आज अधिकांश लोगों का पेट एक “डस्टबिन” की तरह व्यवहार किया जा रहा है। जो भी सामने आया—चाहे भूख हो या न हो—उसे खा लिया गया। स्वाद के नाम पर हम शरीर की सीमाओं को अनदेखा कर रहे हैं।
हम यह भूल चुके हैं कि भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर के संचालन के लिए ऊर्जा और पोषण देने का माध्यम है। जब हम बिना आवश्यकता, बिना संतुलन और बिना समझ के खाते हैं, तो वही भोजन हमारे लिए विष बन जाता है।
आज एक सामान्य परिवार में यह देखने को मिलता है कि खाने-पीने पर जितना खर्च नहीं होता, उससे अधिक दवाइयों पर खर्च हो रहा है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट का भी संकेत है।
पूर्वजों की परंपरा: भोजन एक साधना
हमारे पूर्वजों ने भोजन को केवल भोग नहीं, बल्कि एक साधना माना था। वे जानते थे कि “जैसा अन्न, वैसा मन।” इसलिए भोजन में सात्विकता, सादगी और संतुलन को प्राथमिकता दी जाती थी।
खाना घर में बनता था, ताज़ा बनता था, और उसमें परिवार के हर सदस्य की सेहत का ध्यान रखा जाता था। भोजन का समय निश्चित होता था। अधिक खाने से बचा जाता था। उपवास और व्रत जैसी परंपराएँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शरीर को विश्राम देने की वैज्ञानिक पद्धतियाँ थीं।
जैन धर्म की शिक्षाएँ: संयम का विज्ञान
यदि हम भारतीय परंपराओं में देखें, तो जैन धर्म ने भोजन के विषय में अत्यंत गहन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। जैन दर्शन में “अहिंसा” के साथ-साथ “संयम” को सर्वोच्च स्थान दिया गया है—और यह संयम भोजन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
जैन अनुयायी कई महत्वपूर्ण नियमों का पालन करते हैं:
सूर्यास्त के बाद भोजन न करना—जिससे पाचन तंत्र को पर्याप्त विश्राम मिले।
सात्विक और सरल भोजन—जिसमें तामसिक और उत्तेजक पदार्थों से बचा जाता है।
मिताहार (कम खाना)—अर्थात आवश्यकता से अधिक न खाना।
उपवास और एकासन—शरीर को डिटॉक्स करने के प्राकृतिक तरीके।
आधुनिक विज्ञान भी अब इन सिद्धांतों की पुष्टि कर रहा है। “इंटरमिटेंट फास्टिंग” जैसी अवधारणाएँ, जो आज पश्चिम में लोकप्रिय हैं, हमारे पारंपरिक ज्ञान का ही आधुनिक रूप हैं।
आधुनिक विज्ञान और बढ़ती चिंताएँ
आज पूरी दुनिया में “लाइफस्टाइल डिज़ीज़” (जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ) सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी हैं।
मोटापा बच्चों तक में तेजी से बढ़ रहा है।
टाइप-2 डायबिटीज़ अब युवाओं में भी आम हो गई है।
हृदय रोग पहले की तुलना में अधिक कम उम्र में हो रहे हैं।
इन सबके पीछे एक बड़ा कारण है—अनियंत्रित और असंतुलित खानपान।
वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर को जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है, उससे अधिक ऊर्जा (कैलोरी) लेने पर वह वसा के रूप में जमा हो जाती है। साथ ही, प्रोसेस्ड फूड में मौजूद केमिकल्स और प्रिज़र्वेटिव्स शरीर के आंतरिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं।
स्वाद का बाजार और हमारी कमजोरियाँ
आज का बाजार हमारी कमजोरियों को भली-भांति समझता है। वह जानता है कि मनुष्य को त्वरित सुख चाहिए। इसलिए वह ऐसे खाद्य पदार्थ तैयार करता है जो स्वाद में अत्यंत आकर्षक हों, लेकिन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों।
विज्ञापन, पैकेजिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से हमें लगातार यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि “स्वाद ही जीवन है।” लेकिन सच्चाई यह है कि यह स्वाद एक भ्रम है—एक ऐसा जाल, जिसमें फंसकर हम अपनी सेहत खो रहे हैं।
समाधान: संतुलन की ओर वापसी
यह स्थिति निराशाजनक जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। यदि हम सचेत हो जाएँ, तो बहुत कुछ बदला जा सकता है।
भोजन को प्राथमिकता दें, स्वाद को नहीं
भोजन का चुनाव इस आधार पर करें कि वह शरीर के लिए कितना लाभकारी है।
नियमित समय पर खाएँ
शरीर को एक लय में रखें। अनियमितता पाचन को बिगाड़ती है।
मिताहार अपनाएँ
जितनी भूख हो, उससे थोड़ा कम खाएँ।
प्राकृतिक और ताज़ा भोजन लें
पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएँ।
उपवास और विराम को अपनाएँ
सप्ताह में एक दिन या समय-समय पर शरीर को विश्राम दें।
परंपराओं से सीखें
जैन धर्म और अन्य भारतीय परंपराओं के सिद्धांतों को आधुनिक जीवन में अपनाएँ।
निष्कर्ष: स्थायी सुख का मार्ग
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमें स्वाद चाहिए या नहीं—प्रश्न यह है कि हम किस कीमत पर उसे चाहते हैं। यदि स्वाद के पीछे भागते-भागते हम अपनी सेहत खो दें, तो वह स्वाद व्यर्थ है।
सेहत वह आधार है, जिस पर जीवन का हर सुख टिका होता है। स्वाद का आनंद क्षणिक है, लेकिन सेहत का सुख स्थायी है।
इसलिए यह समय है कि हम अपने भीतर झांकें और यह तय करें कि हम अपने पेट को पोषण का केंद्र बनाएँगे या कचरे का डिब्बा।
यदि हमने अभी भी नहीं संभला, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी। लेकिन यदि हम संयम और समझ का रास्ता चुनते हैं, तो हम न केवल अपनी सेहत बचा सकते हैं, बल्कि एक स्वस्थ समाज की नींव भी रख सकते हैं।
याद रखिए—स्वाद कुछ क्षणों का उत्सव है, लेकिन सेहत पूरी जिंदगी का उत्सव है।
स्वाद का छलावा और सेहत का सत्य: प्रकृति से दूर होता मनुष्य
आज का मनुष्य केवल स्वाद और सेहत के बीच ही नहीं, बल्कि “प्रकृति और कृत्रिमता” के बीच भी एक गहरे द्वंद्व में फँसा हुआ है। यह द्वंद्व जितना व्यक्तिगत है, उतना ही वैश्विक भी। एक ओर आधुनिक खानपान की चकाचौंध है—तेल, घी, मसालों से लबालब भरे व्यंजन—और दूसरी ओर यह विचार तेजी से उभर रहा है कि क्या वास्तव में यही भोजन हमें स्वस्थ बना रहा है या धीरे-धीरे बीमार?
तेल, घी और मसाले: आवश्यकता या अति?
भारतीय भोजन की पहचान लंबे समय तक संतुलन और विविधता रही है। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। तेल, घी और मसालों का उपयोग अब स्वाद बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह एक प्रकार की अति में बदल गया है।
यह कहना गलत होगा कि तेल या घी अपने आप में हानिकारक हैं। हमारे पारंपरिक भोजन में इनका स्थान हमेशा से रहा है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब इनका उपयोग “आवश्यकता” से बढ़कर “लालसा” बन जाता है। अत्यधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन पाचन तंत्र पर दबाव डालता है, शरीर में सूजन बढ़ाता है और दीर्घकाल में कई बीमारियों का कारण बनता है।
प्रकृति का भोजन: सीधा, सरल और सशक्त
इसके विपरीत, जो भोजन हमें सीधे प्रकृति से प्राप्त होता है—जैसे फल, कच्ची सब्ज़ियाँ, अंकुरित अनाज—वह शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। यह भोजन न केवल पचने में आसान होता है, बल्कि शरीर को आवश्यक पोषक तत्व भी सहज रूप से प्रदान करता है।
आज “नेचुरल डाइट” या “प्लांट-बेस्ड डाइट” की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। वैज्ञानिक शोध यह बताते हैं कि प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त भोजन—विशेषकर फल और सब्ज़ियाँ—शरीर को रोगों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यह विचार भी तेजी से फैल रहा है कि मनुष्य को वही खाना चाहिए, जो पृथ्वी उसे सीधे प्रदान करती है, बिना अधिक प्रसंस्करण (processing) के। अर्थात, जितना कम हम भोजन के साथ छेड़छाड़ करेंगे, उतना ही वह हमारे लिए लाभकारी रहेगा।
मांसाहार पर प्रश्नचिह्न
इसी संदर्भ में मांसाहारी भोजन को लेकर भी वैश्विक स्तर पर बहस तेज़ हुई है। पर्यावरणीय, नैतिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से मांसाहार की आलोचना बढ़ रही है।
कई शोध यह संकेत देते हैं कि अत्यधिक मांसाहार हृदय रोग, मोटापा और अन्य बीमारियों से जुड़ा हुआ है। साथ ही, पशुपालन का पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग अब शाकाहार या प्लांट-बेस्ड आहार की ओर बढ़ रहे हैं।
भारतीय परंपरा, विशेषकर जैन और वैदिक दृष्टिकोण, पहले से ही इस बात पर जोर देता रहा है कि भोजन ऐसा होना चाहिए जो शरीर और प्रकृति—दोनों के लिए हितकारी हो।
हर समय खाना: एक नई बीमारी
आधुनिक जीवनशैली की एक और गंभीर समस्या है—लगातार खाना।
आज “भूख” और “खाने की इच्छा” के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया है।
हम सुबह उठते ही चाय-नाश्ता, फिर कुछ देर बाद स्नैक्स, दोपहर का भोजन, शाम की चाय, फिर रात का खाना—और उसके बाद भी कुछ न कुछ खाते रहते हैं।
यह निरंतर खाने की आदत शरीर को कभी भी पूर्ण विश्राम नहीं देती। पाचन तंत्र लगातार काम करता रहता है, जिससे शरीर की “रिपेयरिंग” प्रक्रिया बाधित होती है।
शाम का भोजन: आवश्यक या आदत?
अब एक महत्वपूर्ण विचार तेजी से सामने आ रहा है—क्या रात का भोजन वास्तव में आवश्यक है?
कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि हम सूर्यास्त के बाद भोजन न करें, या बहुत हल्का भोजन करें, तो यह शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी हो सकता है।
रात का समय शरीर के विश्राम और मरम्मत (repair) का समय होता है। यदि हम उस समय भारी भोजन कर लेते हैं, तो शरीर को पाचन में ही अपनी ऊर्जा लगानी पड़ती है, और वह अपनी अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं—जैसे कोशिकाओं की मरम्मत—को ठीक से नहीं कर पाता।
यह सिद्धांत हमारे पारंपरिक ज्ञान में पहले से मौजूद था। जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन न करने की परंपरा इसी वैज्ञानिक समझ पर आधारित है।
उपवास: शरीर का पुनर्निर्माण
जब हम कुछ समय के लिए भोजन से विराम लेते हैं—चाहे वह उपवास हो या सीमित आहार—तो शरीर को स्वयं को पुनर्संतुलित करने का अवसर मिलता है।
आज “इंटरमिटेंट फास्टिंग” के नाम से जो पद्धति लोकप्रिय हो रही है, वह मूलतः हमारे पारंपरिक उपवास की आधुनिक व्याख्या ही है।
उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है, पाचन तंत्र को आराम देता है और मानसिक स्पष्टता भी बढ़ाता है।
भारत में आवश्यकता: प्रकृति की ओर वापसी
भारत जैसे देश में, जहाँ प्रकृति ने हमें विविध और समृद्ध खाद्य संसाधन दिए हैं, वहाँ सबसे अधिक आवश्यकता है कि हम अपने खानपान में उन्हीं प्राकृतिक तत्वों का अधिकतम उपयोग करें।
हमारे यहाँ फल, सब्ज़ियाँ, अनाज, दालें—सब कुछ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। फिर भी हम बाजारू और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
यह एक विडंबना है कि जो चीज़ें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध हैं, हम उन्हें छोड़कर उन चीज़ों की ओर भाग रहे हैं जो न केवल महंगी हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हैं।
निष्कर्ष: संयम ही समाधान
अंततः समाधान किसी एक चरम में नहीं, बल्कि संतुलन और संयम में है।
तेल, घी और मसालों का उपयोग पूरी तरह बंद करना आवश्यक नहीं, लेकिन उनकी मात्रा पर नियंत्रण जरूरी है।
प्राकृतिक भोजन को प्राथमिकता देना चाहिए।
भोजन के समय और मात्रा को नियंत्रित करना चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—भोजन को “आनंद” के बजाय “आवश्यकता” के रूप में देखना चाहिए।
आज यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि स्वाद का आनंद क्षणिक है, लेकिन सेहत का महत्व जीवनभर का है।
यदि हम स्वाद के पीछे अंधी दौड़ में लगे रहेंगे, तो न केवल अपनी सेहत खो देंगे, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी भी तैयार करेंगे जो बीमारियों से घिरी होगी।
इसलिए यह समय है कि हम अपने भीतर यह संकल्प लें—
हम अपने पेट को डस्टबिन नहीं बनने देंगे,
हम प्रकृति के करीब जाएंगे,
और हम ऐसा भोजन चुनेंगे जो हमें जीवित ही नहीं, बल्कि स्वस्थ भी रखे।
याद रखिए—प्रकृति हमें जीवन देती है, और वही भोजन हमें स्वस्थ जीवन दे सकता है।
**अजामिल


