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Friday, September 18, 2026

ये कैसा विकास, किसका विकास? अजामिल

विकास किसका, अधिकार किसका?
एक सवाल से शुरू करते हैं—विकास आखिर किसके लिए होता है?
आप कहेंगे—मनुष्य के लिए।
समाज के लिए।
बेहतर जीवन के लिए।
ठीक है। लेकिन फिर एक दूसरा सवाल पूछें—अगर विकास के नाम पर मनुष्य ही अपनी जमीन, जंगल, नदी और जीवन से बेदखल होने लगे, तो वह विकास किसका है?
यहीं से हमारी असली चिंता शुरू होती है।
आज भारी उद्योग, बड़े बाँध, खनन परियोजनाएँ, एक्सप्रेस-वे, स्मार्ट सिटी और वैश्विक बाजार विकास की तस्वीर बनाते हैं। इनके लिए जमीन चाहिए, खनिज चाहिए, पानी चाहिए और जंगल चाहिए। और जब इन संसाधनों पर पहले से कोई समुदाय रह रहा हो, अपनी आजीविका चला रहा हो, तब सवाल केवल अधिग्रहण का नहीं रह जाता।
सवाल अधिकार और संप्रभुता का हो जाता है।
मैं आपसे पूछना चाहता हूँ—जल, जंगल, जमीन और खनिज के असली मालिक कौन हैं?
राज्य?
कंपनियाँ?
या वे लोग जो सदियों से इन संसाधनों के साथ अपना जीवन बनाते आए हैं?
यहाँ एक महत्वपूर्ण अवधारणा सामने आती है—‘एमिनेंट डोमेन’ (Eminent Domain)। सामान्य अर्थ में इसका मतलब है कि राज्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए निजी संपत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण कर सकता है।
लेकिन जरा इसके भीतर छिपे सवाल को देखिए।
राज्य को यह सर्वोच्च अधिकार मिला कहाँ से?
लोकतंत्र में राज्य स्वयं संप्रभु नहीं होता; वह जनता से शक्ति प्राप्त करता है। फिर क्या जनता की संप्रभुता केवल चुनाव के दिन दिखाई देती है? क्या उसके बाद जमीन, जंगल, पानी और प्राकृतिक संसाधनों के बारे में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह राज्य के हाथ में चला जाता है?
यहीं विकास की पूरी बहस एक नए मोड़ पर पहुँच जाती है।
किसी किसान से कहिए कि उसकी जमीन किसी परियोजना के लिए ली जा रही है। उसे मुआवजा दीजिए। लेकिन क्या आपने उसकी जमीन वापस दे दी?
नहीं।
आपने केवल जमीन की आर्थिक कीमत दी है।
लेकिन जमीन की कीमत और जमीन का अर्थ—क्या दोनों एक ही चीज हैं?
जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं होती। वह किसी परिवार की आजीविका हो सकती है, किसी समुदाय की स्मृति हो सकती है, किसी आदिवासी समाज की संस्कृति हो सकती है। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता और नदी केवल पानी की धारा नहीं होती।
फिर हम प्रकृति को केवल आर्थिक संसाधन में बदलकर कैसे देख सकते हैं?
2013 के भूमि अधिग्रहण कानून ने इसी जटिलता को ध्यान में रखते हुए सामाजिक प्रभाव आकलन, सार्वजनिक सुनवाई, ग्रामसभा से जुड़ी प्रक्रियाओं और पुनर्वास-पुनर्स्थापन जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया। इसका उद्देश्य अधिग्रहण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावित लोगों की भागीदारी वाला बनाना था।
लेकिन कानून से बड़ा सवाल लोकतंत्र का है।
फैसला कौन करेगा?
जिसकी जमीन जा रही है, उसकी आवाज कितनी महत्वपूर्ण होगी?
जिस गाँव का जंगल उजड़ रहा है, उसकी ग्रामसभा की भूमिका कितनी निर्णायक होगी?
जिस नदी का रास्ता बदला जा रहा है, क्या उस नदी के किनारे रहने वाले लोगों की चिंता केवल ‘परियोजना की लागत’ का हिस्सा होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या विकास का अर्थ यह है कि कुछ लोगों को लाभ मिले और कुछ लोगों को विस्थापन स्वीकार करना पड़े?
मैं यह नहीं कह रहा कि उद्योग नहीं होने चाहिए। शहर नहीं बढ़ने चाहिए। सड़कें नहीं बननी चाहिए। खनिजों का उपयोग नहीं होना चाहिए।
प्रश्न विकास के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है।
प्रश्न यह है कि विकास की दिशा कौन तय करेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा।
अगर निर्णय लेने की शक्ति कुछ हाथों में केंद्रित होती जाती है और प्राकृतिक संसाधन धीरे-धीरे बाजार की वस्तु बनते जाते हैं, तो हमें ठहरकर सोचना ही होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल विकास की लाभार्थी नहीं है।
वह विकास की स्वामी भी है।
और शायद विकास की सबसे जरूरी कसौटी यही होनी चाहिए—
विकास से क्या बना, यह पूछने से पहले यह पूछा जाए कि विकास के रास्ते में क्या और कौन उजड़ा?
यही सवाल हमें ‘एमिनेंट डोमेन’ से आगे ले जाता है—राज्य की सत्ता से जनता की संप्रभुता तक।
और शायद आज हमें सबसे ज्यादा इसी सवाल पर बातचीत करने की जरूरत है।
विकास किसका?
अधिकार किसका?
और निर्णय लेने का अंतिम हक किसका?
आगे के लेखों में भी मैं इसी सीधी बातचीत, छोटे-छोटे सवालों, क्रमशः खुलती वैचारिक परतों और अंत में पाठक के सामने छोड़े गए बड़े प्रश्न वाली शैली को बनाए रखूँगा।

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