वैश्विक प्रसार के बावजूद कई चुनौतियां
**अजामिल
यह सही है कि विश्व स्तर पर हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। कई देशों में हिंदी बोलने-जानने वालों की संख्या बढ़ी है। भारतीय सिनेमा, डिजिटल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भी हिंदी को नई पहचान दी है। फिर भी, यह कहना गलत होगा कि हिंदी अपनी सभी बाधाएं पार कर चुकी है। वैश्विक प्रसार के बावजूद इसकी राह में कई चुनौतियां मौजूद हैं।
सबसे बड़ी चुनौती तो उच्च शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनने की है। भारत के अधिकांश प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कानून और वैज्ञानिक शोध की प्रमुख भाषा अब भी अंग्रेजी है। नई शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय भाषाओं में पठन-पाठन पर जोर जरूर दिया है, लेकिन हिंदी में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य-पुस्तकों, शोध-सामग्री व तकनीकी शब्दावली का अभाव आज भी महसूस किया जाता है। परिणामस्वरूप, अनेक विद्यार्थी रोजगार और शोध के लिए अंग्रेजी को अधिक उपयोगी मानते हैं।
दूसरी चुनौती डिजिटल गुणवत्ता की है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की मात्रा तो बढ़ी है, लेकिन उसकी गुणवत्ता समान रूप से विकसित नहीं हुई। अनेक सरकारी वेबसाइटें और तकनीकी सेवाएं हिंदी में अधूरी या कठिन भाषा का प्रयोग करती हैं। मशीनी अनुवाद तो कई बार अर्थ का अनर्थ कर देता है, जिससे प्रशासनिक और कानूनी दस्तावेजों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में उच्च गुणवत्ता वाले हिंदी डेटा और मानकीकृत भाषा संसाधनों की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
तीसरी चुनौती अंतरराष्ट्रीय संस्थागत मान्यता की है। तमाम प्रयासों के बावजूद हिंदी अभी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा नहीं बन सकी है, जिसका अर्थ है कि हिंदी की लोकप्रियता और उसकी संस्थागत स्वीकार्यता में अभी भी खाई बनी हुई है।
एक महत्वपूर्ण सामाजिक चुनौती भाषायी संतुलन की है। गौरतलब है कि भारत एक बहुभाषी देश है, जहां तमिल, बांग्ला, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और अन्य भाषाओं की समृद्ध परंपरा है। कभी-कभी हिंदी के विस्तार को क्षेत्रीय भाषाओं के लिए चुनौती के रूप में देखा जाता है। वैसे, देखा जाए, तो बाजार और रोजगार का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उच्च पदों पर अंग्रेजी का प्रभुत्व बना हुआ है। हिंदी में उत्कृष्ट लेखन, अनुवाद, शोध और तकनीकी विशेषज्ञता रखने वालों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, परंतु उनकी संख्या और संस्थागत समर्थन अभी सीमित है। यदि हिंदी को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था से जोड़ना है, तो उद्योग और शिक्षा के बीच बेहतर समन्वय बनाना होगा।
सुजीत कुमार, टिप्पणीकार
दुनिया के लिए हिंदी अब अनजान नहीं
एक समय हिंदी को केवल भारत के उत्तरी हिस्से की भाषा माना जाता था, लेकिन आज यह देश-विदेश में संवाद, संस्कृति, शिक्षा और डिजिटल माध्यम की प्रमुख भाषाओं में शामिल हो गई है। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी के प्रयोग, विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन या इंटरनेट पर हिंदी की सामग्रियों में तेज वृद्धि इस बात की पुष्टि करती है कि इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह अब केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रभावी माध्यम बन चुकी है। हिंदी दिवस (14 सितंबर) की सार्थकता इसी वजह से लगातार बढ़ रही है।
भारत में हिंदी सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, लगभग 44 प्रतिशत भारतीयों की मातृभाषा हिंदी है, जबकि करोड़ों लोग इसे दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया गया है। आज प्रशासन, न्याय, मीडिया, विज्ञापन और मनोरंजन उद्योग में हिंदी की स्वीकार्यता पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो गई है। हिंदी का दायरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में रह रही भारतीय आबादी हिंदी को जीवंत बनाए हुई है। मॉरीशस और फिजी में यह भाषा वहां की शिक्षा का औपचारिक हिस्सा बन चुकी है, जबकि हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड और टोक्यो विश्वविद्यालय जैसे कई विदेशी शिक्षण संस्थान हिंदी भाषा और भारतीय साहित्य के पाठ्यक्रम संचालित करने लगे हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन का नियमित आयोजन भी हिंदी के वैश्विक प्रचार का महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
हिंदी की लोकप्रियता बढ़ाने में भारतीय सिनेमा और डिजिटल मंचों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। बॉलीवुड की फिल्में और हिंदी गीत दुनिया के अनेक देशों में लोकप्रिय हैं। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और यू-ट्यूब के जरिये हिंदी सामग्री करोड़ों दर्शकों तक पहुंच रही है। इन सबसे हिंदी के शब्द वैश्विक दर्शकों तक पहुंच रहे हैं। हालांकि, हिंदी को ऊर्जा डिजिटल क्रांति से भी मिली है। आज ग्रामीण भारत का बड़ा वर्ग इंटरनेट पर हिंदी में जानकारी प्राप्त करता है।
साफ है, हिंदी का संसार बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी कहा था, राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। आज यह विचार व्यापक अर्थ ले चुका है। आज हिंदी केवल राष्ट्र की आवाज नहीं, बल्कि विश्व मंच पर भारत की पहचान और संवाद का सशक्त माध्यम बन गई है.
**अजामिल

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