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Monday, September 28, 2026

पूर्वजों को स्मरण करने का पर्व : कितनी श्रद्धा कितना विज्ञान?

**श्राद्ध : श्रद्धा, स्मृति और विज्ञान के बीच
**अजामिल 
पितृपक्ष आते ही हमारे घरों में पूर्वजों की स्मृतियाँ फिर जीवित हो उठती हैं। कहीं तर्पण होता है, कहीं पिंडदान, कहीं ब्राह्मण भोजन और कहीं जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र देकर दिवंगत परिजनों को याद किया जाता है। इन कर्मकांडों को लेकर समाज में अलग-अलग धारणाएँ हैं। कुछ लोग इन्हें गहरी श्रद्धा और पारिवारिक कृतज्ञता का माध्यम मानते हैं, तो कुछ इन्हें महज धार्मिक अनुष्ठान या अंधविश्वास मानकर प्रश्न उठाते हैं।
शायद इस प्रश्न को केवल विश्वास और अविश्वास के बीच खड़ा करना उचित नहीं होगा।
श्राद्ध का एक अर्थ ही है—श्रद्धा के साथ स्मरण। हमारे जीवन को बनाने में जिन लोगों का योगदान रहा, वे भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनका दिया हुआ बहुत कुछ हमारे भीतर और हमारे जीवन में मौजूद रहता है। उन्हें याद करना, उनके प्रति कृतज्ञ होना और उनके नाम पर किसी जरूरतमंद की सहायता करना—इन सबका एक स्पष्ट मानवीय अर्थ है।
विज्ञान की कसौटी पर देखें तो अभी हमारे पास ऐसा प्रमाण नहीं है कि किसी धार्मिक अनुष्ठान से उत्पन्न कोई विशेष 'कंपन' भौतिक संसार को पार करके दिवंगत आत्मा तक पहुँचता है। आत्मा, परलोक या सार्वभौमिक चेतना के बारे में धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में अनेक धारणाएँ हैं, लेकिन उन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए जिस प्रकार के परीक्षण योग्य प्रमाण चाहिए, वे उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए आस्था को विज्ञान का प्रमाणपत्र देना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों का कोई अर्थ ही नहीं है।
मनोविज्ञान में हुए शोध बताते हैं कि शोक और मृत्यु से जुड़े अनुष्ठान मनुष्य को अपने दुःख को स्वीकार करने, स्मृतियों को व्यवस्थित करने और जीवन में फिर से अर्थ खोजने में सहायता कर सकते हैं। एक प्रयोगात्मक अध्ययन में पाया गया कि शोक के बाद किए गए अनुष्ठानों से दुःख की तीव्रता कम होने और नियंत्रण की भावना लौटने में मदद मिल सकती है।  दूसरे अध्ययनों में भी स्मरण और शोक-संबंधी अनुष्ठानों का संबंध पारिवारिक जुड़ाव, सामाजिक सहयोग और मृत्यु को स्वीकार करने की प्रक्रिया से पाया गया है।
इसलिए श्राद्ध को देखने का एक रास्ता यह भी हो सकता है कि हम उसके आध्यात्मिक दावों को अपनी आस्था के क्षेत्र में रखें और उसके मानवीय प्रभावों को विज्ञान तथा मनोविज्ञान के क्षेत्र में समझें।
आस्था यह कह सकती है कि पूर्वज हमारी श्रद्धा को किसी सूक्ष्म स्तर पर ग्रहण करते हैं। विज्ञान फिलहाल इसकी पुष्टि नहीं करता। लेकिन विज्ञान यह जरूर समझने लगा है कि किसी प्रिय व्यक्ति को प्रेम और कृतज्ञता के साथ याद करना जीवित व्यक्ति के मन के लिए अर्थपूर्ण हो सकता है।
शायद श्राद्ध का सबसे सुंदर अर्थ यहीं दिखाई देता है—हम मृतकों के लिए कुछ करते हुए वास्तव में अपने भीतर की स्मृति, कृतज्ञता और मानवीयता को जीवित रखते हैं।
और यदि किसी की श्रद्धा उसे यह विश्वास देती है कि उसके पूर्वज उस क्षण उसके पास हैं, तो उस विश्वास का सम्मान किया जाना चाहिए। विश्वास न करने वाले को भी इतना समझना चाहिए कि हर आस्था का खंडन करना विवेक नहीं है, जैसे हर आस्था को वैज्ञानिक सत्य घोषित कर देना भी विज्ञान नहीं है।
श्राद्ध शायद इसी बीच की उस जगह का नाम है—जहाँ स्मृति है, भावना है, संस्कृति है, कृतज्ञता है और कुछ ऐसे प्रश्न भी हैं जिनका अंतिम उत्तर अभी विज्ञान के पास नहीं है।
**अजामिल 
चित्र :अजामिल

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