** करवा चौथ के बहाने
उनकी स्मृतियों को प्रणाम
मेरी पत्नी का निधन कुछ साल पहले हो गया। उनके जाने का समय तो नहीं था, लेकिन न जाने कैसी जल्दी थी कि उन्होंने अपनी बीमारी को बहाना बनाया और चुपचाप निकल लीं।
मैं आज भी उनकी स्मृतियों के साथ जीता हूँ। जब भी कोई काम अटकता है, तो उनकी बहुत याद आती है, क्योंकि मुश्किलों से निकलने का हौसला उन्हीं के भीतर था।
जो कुछ उनके पास था, वही उनके लिए संतोष का सबसे बड़ा कारण था।
उन्हें हारना नहीं आता था — और जीतने की कोई ज़िद भी नहीं थी।
कल करवा चौथ के अवसर पर पूरे दिन घर में मैं उन्हें तलाश करता रहा।
न जाने कौन-सी प्रेरणा थी कि वे इस पर्व की सभी परंपराएँ बड़े मन से निभाती थीं।
उनका व्रत रखना मुझे कभी पसंद नहीं था; मैं हमेशा उन्हें मना करता था।
मेरा कहना होता — “आप व्रत मत रखिए, उपवास रखिए। पूरे दिन ईश्वर के सान्निध्य में रहिए, उनके शरणागत बनिए।”
लेकिन मेरी पत्नी अपने संकल्प से कभी नहीं डिगीं।
अंततः मैंने यह स्वीकार कर लिया कि जिस चीज़ में उन्हें खुशी मिलती है, उसे करने देना ही सही है।
स्त्रियाँ छोटी-छोटी खुशियों में अपनी बड़ी खुशी तलाश लेती हैं, जबकि पुरुष बड़ी-बड़ी खुशियों में भी संतोष नहीं पा पाते — यही एक बड़ा अंतर है स्त्री और पुरुष की प्रसन्नता में।
बहुत-से घरों में छोटी-छोटी बच्चियाँ गुड़ियों का संसार रच लेती हैं और उसी में मग्न हो जाती हैं।
यह खुशी सबको नहीं मिलती; यह तभी मिलती है जब इंसान संतोष का आनंद लेना सीख ले।
संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं।
सुख भी जब ज़रूरत से ज़्यादा हो जाए, तो दुख देने लगता है।
दुखों से भरे जीवन में अगर संतोष मिल जाए, तो वही सबसे बड़ी समृद्धि है।
मेरी पत्नी अक्सर कहा करती थीं, “मैं आपसे पहले इस संसार से विदा हो जाऊंगी।”
और वे सचमुच विदा हो गईं।
कभी-कभी लगता है कि उन्हें इतना सच नहीं बोलना चाहिए था।
उनकी अनुपस्थिति ने घर में जो खालीपन पैदा किया है, उसे भर पाना मेरे बस में नहीं।
इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति का कोई विकल्प नहीं होता।
हर इंसान अपनी तरह का एक अनोखा सृजन है — ईश्वर ने उसका कोई डुप्लीकेट नहीं बनाया।
मुझे आज भी याद है — हर करवा चौथ की रात जब चाँद निकलता, वे सबसे पहले मेरी आँखों में देखतीं और मुस्कराकर कहतीं, “अब व्रत पूरा हुआ।”
वह क्षण हर बार मेरे लिए किसी नए जीवन की शुरुआत जैसा होता था।
इसीलिए लोग कहते हैं — “केवल जीते ही मत रहो, अपने महत्व को भी समझो।”
किसी का भी जन्म यूँ ही नहीं होता; हर किसी के जीवन का एक उद्देश्य होता है।
जब वह उद्देश्य पूरा हो जाता है, तभी जाने की बेला आती है।
करवा चौथ पति-पत्नी के परस्पर समर्पण और विश्वास का पर्व है।
समाज ने इस प्रेम के रंग को इतना सुंदर बना दिया है कि यह संबंध सारे रंगों में निखर आता है।
शायद यही कारण है कि विवाहित स्त्रियों को यह पर्व इतना प्रिय होता है।
वे बड़े मनोयोग से अपना श्रृंगार करती हैं — क्योंकि प्रकृति में जो कुछ भी है, वह स्वयं को आकर्षक बनाए रखना चाहता है।
श्रृंगार इसी आकर्षण का हिस्सा है।
मनुष्य की खोजों ने चंद्रमा को कितना ही बदसूरत क्यों न साबित कर दिया हो,
पति-पत्नी फिर भी एक-दूसरे में चंद्रमा-सा सौंदर्य निहार लेते हैं — और यही बहुत बड़ी बात है।
दुनिया में कुछ भी बदसूरत नहीं है; बस, हमें सुंदरता को देखने का नजरिया चाहिए।
यह नजरिया हमारी भावनाओं, संवेदना, आस्था और विश्वास से जन्म लेता है।
यह पर्व केवल कर्मकांड के कारण महत्वपूर्ण नहीं है,
बल्कि इसलिए भी कि यह स्त्रियों को निश्चल उड़ान का अवसर देता है।
वे इस दिन वह सब कर पाती हैं, जो सामान्य दिनों में उनके भीतर दबा रह जाता है।
सुंदर दिखने की कोशिश करना और अपने को आकर्षक बनाए रखना स्त्रियों की नैसर्गिक चाह है —
और यही चाह इस सृष्टि की सुंदरता का मूल है।
आज जब मैं उन्हें याद करता हूँ, तो यही सोचता हूँ —
शायद संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा व्रत है,
और मैं अब भी उसी व्रत को निभाने की कोशिश कर रहा हूँ —
उनके संकल्प, उनकी स्मृतियों और उनके प्रेम के साथ।
** अजामिल
आज सुबह-सुबह लिखा

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