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Wednesday, September 16, 2026

बादल सरकार और समानांतर नामा/अजामिल


समानांतरनामा और 
वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक
48 वर्ष पहले देखा गया एक सपना
आज से 48 वर्ष पहले सुपरिचित रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक अनेक सपनों और रंगमंच के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के साथ इलाहाबाद आए थे। उन्होंने बड़ी विनम्रता और समर्पण के साथ अपने रंगकर्म की साधना शुरू की। यह वह समय था जब इलाहाबाद का रंगमंच अपनी नाट्य प्रस्तुतियों के कारण पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना चुका था। यह जानना भी दिलचस्प है कि उस दौर में इलाहाबाद में देश के दूसरे शहरों की तुलना में बड़ी संख्या में नाट्य प्रस्तुतियाँ हुआ करती थीं।
उस समय समर्पित रंगकर्मियों द्वारा आयोजित लघु नाट्य प्रतियोगिताओं में ही लगभग 400 नाटक संगीत समिति के मंच पर देश की विभिन्न नाट्य संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत किए जाते थे। इन आयोजनों में 600 से 800 तक रंगकर्मी शामिल होते थे। इसी रंगमंचीय वातावरण में अनिल रंजन भौमिक ने अपनी नाट्य प्रस्तुतियों की शुरुआत इलाहाबाद से की। कुछ ही प्रस्तुतियों के बाद वे रंगमंच के एक चर्चित नाम बन गए।
रंगमंच से आगे भी थी एक बेचैनी
अनिल रंजन भौमिक केवल रंगकर्म तक सीमित नहीं रहना चाहते थे। साहित्य, कला और संस्कृति की दूसरी विधाओं में भी काम करने की उनकी गहरी रुचि थी। इसी सोच से उनकी संस्था ‘समानांतर’ ने कला की विभिन्न विधाओं को केंद्र में रखकर साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े लोगों को एक साथ लाने का काम शुरू किया। उनकी बहुमुखी प्रतिभा और सक्रियता को साहित्य और कला जगत ने सराहा और स्वीकार किया।
लेकिन समानांतर की यह यात्रा केवल किसी संस्था के विस्तार की कहानी नहीं थी। इसके पीछे एक ऐसा सपना था, जिसमें रंगमंच को केवल मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं माना गया था।
रंगकर्मी परिवार क्यों नहीं बन सके?
अनिल रंजन भौमिक हमेशा एक समर्पित रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी रहे। उनका सपना था कि रंगकर्मी एक परिवार की तरह रहें, मिल-जुलकर श्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ करें और समाज के हित में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें। इसी भावना के कारण अनेक रंगकर्मी उनकी संस्था से परिवार के सदस्यों की तरह जुड़े।
लेकिन दूसरी संस्थाएँ एक मंच और एक छत के नीचे आकर काम करने के लिए तैयार नहीं हो सकीं। सभी अपनी-अपनी संस्थाओं और अपने-अपने ढंग से काम करना चाहते थे। इसमें कोई बुराई नहीं थी, लेकिन एक-दूसरे का सहयोग न करना निश्चित रूप से दुखद था। रंगकर्मियों के बीच सहयोग और सामूहिकता की कमी अनिल रंजन भौमिक को लंबे समय तक कचोटती रही।
अकेले चलने का निर्णय
फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वे अकेले चलने में भी विश्वास रखते रहे। उनके इस लंबे और एकाकी प्रयास का परिणाम आज, 48 वर्ष बाद, ‘समानांतर’ के मंच पर अनेक विधाओं में दिखाई देता है।
देशभर के रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी आज उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। समानांतर ने ऐसी पहचान बनाई है जिसका देश के कला और संस्कृति जगत में सम्मान है और जिसके साथ जुड़कर काम करना अनेक लोगों के लिए अपने आप में एक अनुभव है।
किसी संस्था की असली पहचान शायद उसके नाम से नहीं, बल्कि इस बात से बनती है कि उसने कितने लोगों को अपने साथ जोड़ा और कितने लोगों के लिए संवाद और सृजन की जगह बनाई। समानांतर की यात्रा को इसी संदर्भ में देखना अधिक सार्थक होगा।
और फिर आया ‘समानांतरनामा’
हाल ही में समानांतर ने अपनी चर्चित अनियतकालीन पत्रिका ‘समानांतरनामा’ का चौथा अंक प्रकाशित किया है। यह अंक देश-विदेश में चर्चित नाटककार और निर्देशक बादल सरकार के रंगकर्म पर केंद्रित है। अनिल रंजन भौमिक ने इस विशेषांक को नाम दिया है—‘बादल सरकार शतक विशेषांक’।
समानांतरनामा का यह अंक अपनी विषयवस्तु, गंभीरता और प्रस्तुति के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करता है। बादल सरकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय सामग्री प्रकाशित की गई है।
बादल सरकार को समझने की एक खिड़की
विशेषांक के ‘धरोहर’ स्तंभ में नेमिचंद्र जैन और प्रतिभा अग्रवाल जैसे वरिष्ठ रंगकर्मियों ने बादल सरकार के चर्चित नाटकों ‘बाकी इतिहास’ और ‘एवं इंद्रजीत’ पर महत्वपूर्ण आलेख लिखे हैं। इसके साथ ही विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर बादल सरकार द्वारा दिया गया उनका सार्थक संदेश भी प्रकाशित किया गया है।
इस विशेषांक में बादल सरकार के रंग-जीवन से जुड़े अनेक अनुभवों को पढ़ना अपने आप में एक अलग तरह का अनुभव है। पंडित सत्यदेव दुबे, सुलभा देशपांडे, महेश चंद्र चट्टोपाध्याय, अनामिका हक्सर और सुधीर मिश्रा के महत्वपूर्ण आलेखों और टिप्पणियों को भी इसमें स्थान दिया गया है।
लेकिन बादल सरकार को समझने के लिए केवल उनके नाटकों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। उनके रंगमंच की बुनियादी अवधारणाओं को समझना भी जरूरी है।
‘तीसरा रंगमंच’ और उससे आगे
बादल सरकार की रंग-दृष्टि और उनके ‘तीसरे रंगमंच’ की अवधारणा पर इस विशेषांक में विशेष रूप से विचार किया गया है। यह वह पक्ष है जो बादल सरकार को भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक विशिष्ट रंगकर्मी के रूप में समझने में मदद करता है।
पत्रिका का ‘रंग वैचारिकी’ खंड भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें विजय तेंदुलकर, श्याम बेनेगल, गिरीश कर्नाड, अमोल पालेकर, मोहन आगाशे, देवेंद्र राज अंकुर, प्रो. लाल बहादुर वर्मा, कीर्ति जैन, राकेश वेदा, प्रो. मित्रसेन मजूमदार और राजेश कुमार जैसे महत्वपूर्ण रंगकर्मियों और चिंतकों के विचारों को सामने लाने वाले उपयोगी आलेख शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त भी इस अंक में ऐसी बहुत-सी सामग्री है जो रंगमंच में रुचि रखने वाले पाठकों को लंबे समय तक अपने साथ जोड़े रखती है।
केवल पढ़ने की नहीं, संभालकर रखने की सामग्री
बादल सरकार को केवल उनके नाटकों के माध्यम से नहीं, बल्कि उनकी संपूर्ण रंग-दृष्टि और रंगमंच के प्रति उनके विचारों के संदर्भ में समझना हो, तो समानांतरनामा का यह अंक उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराता है।
विशेषांक में बादल सरकार के कई सुंदर चित्र भी प्रकाशित किए गए हैं, जो इसे केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि संभालकर रखने की सामग्री भी बनाते हैं।
संपादन के पीछे एक सामूहिक श्रम
इस अंक के संपादक मंडल में राजेंद्र कुमार, देवेंद्र राज अंकुर और अनीता गोपेश का सहयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके सहयोग के बिना यह अंक इस रूप में संभव नहीं था।
विशेषांक में बादल सरकार के चर्चित नाटक ‘सीढ़ी’ का अनुवाद अनिल रंजन भौमिक ने किया है, जबकि ‘बीज’ का अनुवाद यामाहा सराफ ने किया है। इन दोनों अनुवादों ने अंक की उपयोगिता को और बढ़ा दिया है।
एक विशेषांक से कहीं अधिक
मेरी दृष्टि में ‘समानांतरनामा’ का यह अंक केवल एक विशेषांक नहीं, बल्कि बादल सरकार के रंगकर्म को समझने की दिशा में एक गंभीर दस्तावेज है। हिंदी रंगमंच की पत्रिकाओं के संदर्भ में यह अंक इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें सामग्री का चयन केवल सूचना देने के लिए नहीं, बल्कि एक बड़े रंगकर्मी की रंग-दृष्टि को समझने के लिए किया गया है।
बादल सरकार को उनके रंगकर्म, उनकी वैचारिकी और उनके ‘तीसरे रंगमंच’ की अवधारणा के माध्यम से समझना चाहने वाले पाठकों के लिए यह अंक लंबे समय तक उपयोगी रहेगा। इसे एक संदर्भ सामग्री की तरह भी देखा जा सकता है।
48 साल की यात्रा का एक पड़ाव
अनिल रंजन भौमिक ने 48 वर्ष पहले जिस सपने के साथ इलाहाबाद में अपने रंगकर्म की शुरुआत की थी, उसकी एक झलक आज समानांतर की ऐसी गतिविधियों में दिखाई देती है। अकेले शुरू की गई एक यात्रा जब इतने वर्षों बाद अनेक लोगों को अपने साथ जोड़ लेती है, तो उसके पीछे केवल किसी संस्था का विस्तार नहीं होता; उसके पीछे लगातार किए गए काम, विश्वास और धैर्य की लंबी कहानी होती है।
‘समानांतरनामा’ का यह विशेषांक उसी लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
— अजामिल

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